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नज़रिया: पाकिस्तान के साथ विवाद ख़त्म करने के क़रीब थे अटल?
- Author, सईद नक़वी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
आने वाली नस्लें हम पर
फ़ख्र करेंगी, हम-असरो,
जब उनको ये ख़्याल आएगा
हमने अटल को देखा था
(फ़िराक़ 'गोरखपुरी' के इस लोकप्रिय शेर में एक छोटा सा बदलाव किया है. मैंने 'फ़िराक़' की जगह 'अटल' लिखा है.)
मैं ये दावा कर सकता हूं कि मैं अटल बिहारी वाजपेयी को जानता था. हां लेकिन ये बात मैं बहुत विनम्रता के साथ कहना चाहूंगा क्योंकि बहुत से पत्रकार होंगे जो उन्हें जानते होंगे.
उनसे मिलना हर बार नया सा लगता था. जब आप उनसे सवाल पूछना शुरू करते तो वो बिल्कुल शांत हो जाते. कई बार लगता कि उन्होंने सवाल सुना भी या नहीं. फिर पांच मिनट पहले पूछे गए सवाल का वो अच्छी तरह सोचा-विचारा जवाब देना शुरू करते. वो कभी भी बिना सोचे-समझे सवालों के जवाब नहीं देते थे.
वो किसी भी चीज़ के लिए अति उत्साही नहीं हुआ करते थे लेकिन अगर उन्हें कोई चीज़ या किसी का कोई विचार पसंद आ गया तो वो उसका इज़हार करने में चूकते भी नहीं थे. हैदराबाद हाउस का वो वाकया मुझे आज भी याद है जब उन्होंने मुझे अपने बाहों के घेरे में लिया और कहा, "मैंने आप का लेख पढ़ा, कई बार पढ़ा, मैं आपसे सहमत हूं."
ये बात इसलिए ख़ास नहीं थी कि मेरे किसी लेख पर मुझे देश के प्रधानमंत्री से तारीफ़ मिली लेकिन जिस तरीक़े से उन्होंने उसे ज़ाहिर किया, उससे उनकी आत्मीयता का एहसास हुआ. विदेश नीति और राष्ट्रीय राजनीति पर सीधी और शुष्क रिपोर्टों पर उनसे कभी भी ऐसी प्रतिक्रिया नहीं मिली थी. मेरा ये लेख हिंदू-मुस्लिम मुद्दे पर आधारित था, जिसमें मैंने रूढ़िवादी सोच से इतर एक नज़रिया दिया था.
समाज को जोड़ने वाली संस्कृति
1982 में मुरादाबाद में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी थी. मैं चेन्नई मुख्यालय में 'द इंडियन एक्सप्रेस' का स्थानीय संपादक था. निहाल सिंह उस समय प्रधान संपादक थे, उन्होंने मुझे मुरादाबाद पर एक संपादकीय लिखने को कहा.
सीधी-सपाट ख़बर से शुरू करने के बजाय मैंने अपने गांव और अपनी यादों को बुनते हुए लिखना शुरू किया. गांवो की वो यादें, जिसमें सांस्कृतिक साझेदारी ने सैंकड़ों बरसों तक समाज को जोड़े रखा.
मैंने लिखा कि किस तरह इस नई राजनीति ने अपनी आंखें इससे पूरी तरह हटा ली हैं क्योंकि सद्भावना को वोट में तब्दील होने में काफी समय लगता है. मैंने मोहसिन काकोरवी का जिक्र किया जिन्होंने पैगंबर मोहम्मद का जन्मदिन मनाने के लिए कृष्ण की तस्वीरों का इस्तेमाल किया. कृष्ण और राधा के प्रति मौलाना हसरत मोहानी के लगाव का भी ज़िक्र किया.
"अहिल्या जो एक श्राप के चलते पत्थर की हो गई थीं, वो आपका स्पर्श पाते ही अपने मूल रूप में आ गईं. आपने हनुमान के नेतृत्व में वानर सेना का निर्माण किया. आपने एक दुष्ट चांडाल का उद्धार किया. हे श्री राम, मुझ पर आपकी करुणा दृष्टि कब होगी?"
ये पंक्तियां अक़बर के दरबारियों में से एक अब्दुल रहीम ख़ान ए ख़ाना की संस्कृत में लिखी गई कविता का अंश है. ये सूची अंतहीन हैं, ख़ासकर अगर आप 17वीं शताब्दी से इसी शैली में लिख रहे हिंदू कवियों को देखें.
अटल से मुलाक़ात का न्योता
मोहर्रम के लिए लिखी गई ये पंक्तियां...
"काश हिंदुस्तान में होता जन्म अब्बास का
बारह के हम हिंदु उठा लेते आलम अब्बास का"
अरे...अरे ऐसा नहीं है कि मैं अटल जी की बात करते-करते कहीं और की बात करने लगा. दरअसल, मैं सामाजिक इतिहास का वो छोटा सा हिस्सा आप लोगों से साझा कर रहा हूं जिससे वो ताल्लुक़ रखते थे.
आऱएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइज़र के संपादक रहे स्वर्गीय एच आर मलकानी वो पहले शख़्स थे जिन्होंने मुझे लिखा था "मैं तुम्हें सलाम करता हूं. तुम्हारा लेख पढ़कर मेरी आंखें भर आईं."
आरएसएस के विचारक भाउराव देवरस के साथ एक साक्षात्कार तय हुआ. मलकानी ने मुझे अटल जी के साथ चाय पीने के लिए (दिल्ली के) 10 अशोक रोड आने का न्योता दिया. जो प्रशंसा में सिर हिला रहे थे.
तारीफ़ को लेकर संदेह
इस परिवार की ओर से मिल रहीं तारीफ़ें चिंता की वजह बन रहीं थीं. क्या मैंने एक कॉलम लिखकर अनजाने में अपने प्रगतिशील मित्रों से मुंह मोड़ लिया है?
क्या मैंने उदारवादी रास्ते को छोड़ देने के आरोपों को ख़ुद ही न्योता दे दिया है? लेकिन हर कोई, कांग्रेस से लेकर धुर वामपंथियों तक, हमारी मिलीजुली संस्कृति यानी गंगा-जमनी तहजीब की कसमें खाते हैं. तो क्या वे इस विचार को धुंधली लकीरों के बीच ही पसंद करते हैं? अगर परिवार इसे माकूल मानता है तो क्या ये विचार दाग़दार हो जाता है?
ए मुजीब जैसे लेखकों ने समन्वय का ऐसा कोई पहलू नहीं था, जिसे न छुआ हो. (मुजीब ने इंडियन मुस्लिम नाम की किताब लिखी है.) लेकिन 1982 के पहले ज़्यादातर उदारवादियों, मुस्लिम बुद्धिजीवियों, स्कॉलरों, सेमिनार में हिस्सा लेने वालों, लेखकों, कॉलम लिखने वालों ने सूफ़ीवाद को अनदेखा किया, जहां समन्वय के सबूत चौतरफा बिखरे हैं. जहां माना जाता है कि राम और कृष्ण भारत में भेजे गए ईश्वर के पैगंबर हैं.
उदारवादी मुसलमानों को लगता था कि ऐसा करने से उन पर मजहब से मुंह मोडने का आरोप लगेगा. ऐसी सोच की वजह से बड़े जतन से एजेंडा आगे बढ़ाया गया. उसके नतीजे आज सभी देख रहे हैं.
वाजपेयी के रोल मॉडल
वाजपेयी लखनऊ को बहुत अच्छे से समझते थे, इसलिए भारतीय समन्वयता को भी बखूबी जानते थे. लेकिन उनके भीतर का राजनेता उदार मुसलमानों का हिचकिचाहट को भी भली भांति समझ रहा था. न केवल उनके पास सीमित वोट हैं बल्कि वो बौद्धिक रूप से अनिश्चित भी हैं.
अपने साथियों के मुक़ाबले वाजपेयी जिस इकलौते मोर्चे पर बढ़त बनाए हुए थे वो ये कि वो संघ के सबसे सम्मानित सदस्य थे और इसके साथ आधुनिकता के रास्ते पर भी बढ़ रहे थे.
वो आरएसएस के खोल से जानबूझकर बाहर आते लेकिन उस आवरण को छोड़ते नहीं थे. अपने विश्वसनीयता मापने के लिए मेरी मां के पैमाने को आजमाएं तो वाजपेयी पूरी तरह खरे उतरेंगे.
वो कहती थीं, "उस आदमी पर हमेशा अविश्वास करो, जिसकी कमजोरी जाहिर न हो."
आरएसएस की छाया से बाहर निकलते ही वाजपेयी की रूमानियत सामने आती दिखती. वो ज़िंदगी की उम्दा चीज़ों को पसंद करते थे. ख़ुदा जाने उन्हें तले झींगे का स्वाद कैसे लगा?
साल 2003 के अंत तक उन्होंने 'क्षेत्रीय झगड़ों' को सुलझाने का पूरा मन बना लिया था. यकीनी तौर पर साल 2004 का चुनाव हारना का एक बड़ा झटका था. लेकिन उनकी जो चाहत अधूरी रह गई, वो थी पाकिस्तान, कश्मीर की दिक्कतें. उनके प्रधान सचिव रहे ब्रजेश मिश्रा के मुताबिक नियंत्रण रेखा का समाधान बिल्कुल हाथ में था.
क्या वाजपेयी के पास कोई मॉडल था?
1977 में जब वाजपेयी मोरारजी देसाई की सरकार में विदेश मंत्री बने और साउथ ब्लॉक के ऑफ़िस पहुंचे तो उस पहले दिन द हिंदू के केके कात्याल, मैं और कुछ एक-दो लोग उनके साथ थे.
हमने उनसे पूछा कि साउथ ब्लॉक में अपने पहले कार्यालय की जिम्मेदारी संभालने के बाद उन्हें कैसा लग रहा है? इस सवाल को सुनकर उनके भीतर का कवि जाग उठा.
उनकी आंखें धुंधला सी गईं. वो बोले, उनके लिए अपनी भावनाएं क़ाबू करना मुश्किल हो रहा है.
"मुझे यकीन नहीं हो रहा है कि मैं उस कुर्सी पर बैठने जा रहा हूं जिस पर कभी पंडित जवाहर लाल नेहरू बैठते थे."
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