अटल बिहारी वाजपेयी के निधन पर नरेंद्र मोदी, लालकृष्ण आडवाणी क्या बोले

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अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ब्लॉग पर 'मेरे अटल जी' शीर्षक से एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि दी.
पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न वाजपेयी का लंबी बीमारी के बाद गुरुवार को दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स में निधन हो गया था. उनका अंतिम संस्कार शुक्रवार को शाम चार बजे होगा.
पढ़िए, नरेंद्र मोदी का ब्लॉग
"अटल जी अब नहीं रहे. मन नहीं मानता. अटल जी, मेरी आंखों के सामने हैं, स्थिर हैं. जो हाथ मेरी पीठ पर धौल जमाते थे, जो स्नेह से, मुस्कराते हुए मुझे अंकवार में भर लेते थे, वे स्थिर हैं. अटल जी की ये स्थिरता मुझे झकझोर रही है.
मैं खुद को बार-बार यकीन दिला रहा हूं कि अटल जी अब नहीं हैं. वे पंचतत्व हैं. जब उनसे पहली बार मिला था, उसकी स्मृति ऐसी है जैसे कल की ही बात हो.

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इतने बड़े नेता, इतने बड़े विद्वान. लगता था जैसे शीशे के उस पार की दुनिया से निकलकर कोई सामने आ गया है. जिसका इतना नाम सुना था, जिसको इतना पढ़ा था, जिससे बिना मिले, इतना कुछ सीखा था, वो मेरे सामने था.
जब पहली बार उनके मुंह से मेरा नाम निकला तो लगा, पाने के लिए बस इतना ही बहुत है. बहुत दिनों तक मेरा नाम लेती हुई उनकी वह आवाज़ मेरे कानों से टकराती रही. मैं कैसे मान लूं कि वह आवाज अब चली गई है.
मुझे उनके साथ बरसों तक काम करने का अवसर मिला, बल्कि मेरे जीवन, मेरी सोच, मेरे आदर्शों-मूल्यों पर जो छाप उन्होंने छोड़ी, जो विश्वास उन्होंने मुझ पर किया, उसने मुझे गढ़ा है, हर स्थिति में अटल रहना सिखाया है.
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21वीं सदी के सशक्त, सुरक्षित भारत के लिए अटल जी ने जो किया, वह अभूतपूर्व है.
उनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि था -बाकी सब का कोई महत्त्व नहीं. सिर्फ एक ताकत उनके भीतर काम करती थी- देश प्रथम की जिद.
अटल जी कभी लीक पर नहीं चले. उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक जीवन में नए रास्ते बनाए और तय किए. "आंधियों में भी दीये जलाने" की क्षमता उनमें थी. पूरी बेबाकी से वे जो कुछ भी बोलते थे, सीधा जनमानस के हृदय में उतर जाता था. अपनी बात को कैसे रखना है, कितना कहना है और कितना अनकहा छोड़ देना है, इसमें उन्हें महारत हासिल थी.
जीवन कैसे जीया जाए, राष्ट्र के काम कैसे आया जाए, यह उन्होंने अपने जीवन से दूसरों को सिखाया. वे कहते थे, "हम केवल अपने लिए ना जीएं, औरों के लिए भी जीएं...हम राष्ट्र के लिए अधिकाधिक त्याग करें. अगर भारत की दशा दयनीय है तो दुनिया में हमारा सम्मान नहीं हो सकता. किंतु यदि हम सभी दृष्टियों से सुसंपन्न हैं तो दुनिया हमारा सम्मान करेगी"

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आज भारत जिस टेक्नोलॉजी के शिखर पर खड़ा है उसकी आधारशिला अटल जी ने ही रखी थी. वे अपने समय से बहुत दूर तक देख सकते थे - स्वप्न दृष्टा थे लेकिन कर्म वीर भी थे.
आपातकाल ने हमारे लोकतंत्र पर जो दाग लगाया था उसको मिटाने के लिए अटल जी के प्रयास को देश हमेशा याद रखेगा.
अपनी सफलता को कभी भी उन्होंने अपने मस्तिष्क पर प्रभावी नहीं होने दिया. ये अटल जी ही थे जिन्होंने कहा, "हे प्रभु! मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना. गैरों को गले ना लगा सकूं, इतनी रुखाई कभी मत देना."
नए भारत का यही संकल्प, यही भावना लिए मैं अपनी तरफ से और सवा सौ करोड़ देशवासियों की तरफ से अटल जी को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं, उन्हें नमन करता हूं."

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अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते उप प्रधानमंत्री रहे भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने उनके (वाजपेयी के) साथ अपने जुड़ाव के लम्हों को कुछ इन शब्दों में याद किया.
पढ़िए, आडवाणी ने क्या कहा?
"आज मेरे पास अपने दुख और उदासी को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं हैं. हम सब भारत के एक बड़े राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी के निधन पर शोक व्यक्त कर रहे हैं.
अटलजी मेरे लिए वरिष्ठ साथी से भी बढ़कर थे- वो असल में पिछले 65 साल से भी ज़्यादा वक्त तक मेरे सबसे क़रीबी मित्र रहे.
आरएसएस के लिए प्रचार के दिनों से लेकर, भारतीय जनसंघ की स्थापना, आपातकाल का विरोध और हमारा संघर्ष और बाद में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के गठन तक उनके साथ अपने लंबे सहयोग की यादों की सराहना करता हूं.

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अटलजी को हमेशा केंद्र में पहली स्थिर और गैर-कांग्रेसी गठबंधन सरकार देने वाले नेता के रूप में याद किया जाएगा और मुझे छह साल तक उनके डिप्टी के रूप में काम करने का खास मौका मिला. मेरे वरिष्ठ के तौर पर उन्होंने हमेशा मुझे हर तरीके से प्रोत्साहित किया और गाइड किया.
वाजपेयी की नेतृत्व क्षमता, मंत्रमुग्ध करने वाली भाषण कला, देशभक्ति का जज्बा और सबसे अधिक उनकी मानवीय विशेषताएं जैसे दया, नम्रता और विचारधारा के मतभेदों के बावजूद विरोधियों को जीतने की उनकी शानदार क्षमता के प्रदर्शन ने उनके सार्वजनिक जीवन में सबसे अधिक प्रभाव डाला. मुझे अटलजी बहुत याद आएंगे."

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क्या बोले शरद यादव?
"देश के जितने प्रधानमंत्री हुए, अटल बिहारी वाजपेयी उनके बगल में खड़े रहे. वो कवि, लेखक, संपादक और बेहतरीन वक्ता थे.
जबलपुर में 1974 में उपचुनाव हुआ था. मैं जेल में था. वहीं से चुनाव का फॉर्म भरा था. तब जेपी आंदोलन चल रहा था. मेरे चुनाव के वक्त वो एक दिन के लिए गये थे, जब देखा उन्होंने कि हम जीत रहे हैं तो दो दिन ठहरे थे.
बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ था तो उन्होंने भरी सभा में माफी मांगी. एक संतुलित आदमी थे. ठीक व्याख्या करें तो स्वभाव से तो कांग्रेसी थे और कई बार भाजपा से बाहर छलकते थे.
सच को कहने की ताक़त थी उनमें. आज के प्रधानमंत्री (नरेंद्र मोदी ) को हटाना चाहते थे. उन्होंने राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कहा था कि 'राजधर्म नहीं निभाया.'"
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