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ब्लॉग: उमर ख़ालिद की सुरक्षा गृह मंत्री राजनाथ सिंह की ज़िम्मेदारी
- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, संपादक, बीबीसी हिंदी रेडियो
भारतीय संसद से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर एक आदमी भरी दुपहरी हत्या करने के मक़सद से गोली चलाता है और तमंचा सड़क पर छोड़कर फ़रार होने में कामयाब हो जाता है.
ये सब उस वक़्त होता है जब स्वतंत्रता दिवस के कारण देश की राजधानी में चप्पे-चप्पे पर कड़ी सुरक्षा का इंतज़ाम किया गया है.
दिल्ली मेट्रो के डिब्बों में और प्लेटफ़ॉर्म पर काले पट्टे बाँधे, हाथ में मॉडर्न राइफ़लें लिए पैरा मिलिटरी कमांडो जगह-जगह आम लोगों की तलाशी लेते नज़र आते हैं.
हमलावर के निशाने पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का वो छात्र है, जिसे पिछले तीन साल से देशद्रोही साबित करने की कोशिशें हो रही हैं. उन पर और उनके दूसरे साथियों पर कैम्पस में देशविरोधी नारे लगाने के आरोप लगे, लेकिन राजद्रोह के मुक़दमे में ढाई साल बीतने पर भी पुलिस चार्जशीट तक दाख़िल नहीं कर पाई है.
तमाम सतर्क कमांडो, पुलिस के सिपाही और अफ़सर, जगह-जगह पर सादे कपड़ों में तैनात ख़ुफ़िया पुलिस के लोग उमर ख़ालिद पर गोली चलाने वाले उस अनजान शख़्स को संसद के पास भरी हुई पिस्तौल लाने से नहीं रोक पाए.
चश्मदीदों के मुताबिक़ उमर ख़ालिद को निशाने पर लेकर गोली चलाने वाला वो शख़्स निकल भागने में कामयाब हो गया और अब तक पुलिस उस हमलावर का कोई अता-पता नहीं लगा पाई है.
दो महीने पहले उमर ख़ालिद ने दिल्ली पुलिस को अर्ज़ी दी थी कि उन्हें सुरक्षा दी जाए क्योंकि उनकी जान को ख़तरा है. उमर की वो अर्ज़ी अभी सरकारी फ़ाइलों में ही दबी हुई है. उनकी हिफ़ाज़त की सीधी ज़िम्मेदारी दिल्ली पुलिस और इस वजह से केंद्रीय गृह मंत्रालय की है, क्योंकि दिल्ली में क़ानून-व्यवस्था के लिए केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ज़िम्मेदार हैं अरविंद केजरीवाल की सरकार नहीं.
बीबीसी हिंदी से एक बातचीत में उमर ख़ालिद ने कहा, "क्या मुझे सुरक्षा तब मिलेगी जब मेरी जान ले ली जाएगी."
सेंट्रल दिल्ली में बसने वाले वीआइपियों की सुरक्षा के लिए दिल्ली पुलिस जितनी ज़िम्मेदार है उतनी ही ज़िम्मेदार वो दिल्ली के आम बाशिंदों की सुरक्षा के लिए भी है - वो आम बाशिंदे चाहे काँग्रेसी हों या कम्युनिस्ट, समाजवादी हों या संघी, हिंदू हों या मुसलमान, राजनीतिक हों या राजनीति से दूर रहने वाले.
या फिर वो उमर ख़ालिद या कन्हैया कुमार ही क्यों न हों, जिन्हें सत्ता में बैठे लोग, उनके समर्थक, सोशल मीडिया ट्रोल्स की फ़ौज पिछले तीन साल से देशद्रोही साबित करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाए हुए है.
पुलिस की नैतिक और क़ानूनी ज़िम्मेदारी
यह अकल्पनीय नहीं है कि सोमवार, 13 अगस्त की दोपहर दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब के बाहर सड़क पर उमर ख़ालिद की लाश भी गिर सकती थी. ठीक उसी तरह जैसे बंगलौर में पत्रकार गौरी लंकेश की लाश गिरी. जैसे धारवाड़ में कन्नड़ लेखक एमएम कलबुर्गी की लाश गिरी. जैसे कोल्हापुर में वामपंथी विचारक गोविंद पानसरे की लाश गिरी.
बिना अदालती फ़ैसले या किसी ठोस सबूत के कन्हैया कुमार और उमर ख़ालिद जैसे लोगों को देशद्रोही साबित करने की एक मुहिम लगातार जारी है. इसी प्रचार का नतीजा है कि नवनिर्माण सेना नाम के उग्र हिंदुत्ववादी संगठन के अमित जानी जैसे लोग सोशल मीडिया के ज़रिए कन्हैया कुमार और उमर ख़ालिद की गरदन काटने की धमकी देने में हिचकते नहीं.
वो जेएनयू में हथियार पहुँचाने का एलान करते हैं, पुलिस के साथ लुकाछिपी का खेल खेलते हैं और फिर गिरफ़्तारी की औपचारिकता के बाद वापस कट्टर हिंदुत्व के एजेंडे पर लौट आते हैं.
आधुनिक लोकतंत्र इसी मायने में अन्याय पर आधारित मध्ययुगीन क्रूर व्यवस्थाओं से अलग है कि इसमें सज़ायाफ़्ता अपराधियों को भी अधिकार दिए गए हैं. उनके भी मानवाधिकार तय होते हैं. उनके साथ इनसान और नागरिक की तरह व्यवहार किया जाता है. उमर ख़ालिद और कन्हैया कुमार को किसी अदालत ने सज़ा नहीं दी है, न कोई आरोप साबित हुआ है, मगर उन्हें बार-बार राष्ट्र के अपराधी के तौर पर पेश किया जाता है.
सत्तारूढ़ पार्टी की राजनीति से असहमत इन नौजवानों के अधिकारों की रक्षा करना इस देश की चुनी हुई सरकार, उसके गृह मंत्री और उनकी पुलिस की नैतिक और क़ानूनी ज़िम्मेदारी है. पर उमर ख़ालिद पर हुए हमले की आलोचना में सरकार या उसके किसी नुमाइंदे की आवाज़ कहीं आपको सुनाई दी?
क्या गिलानी जैसा होगा नतीजा
टेलीविज़न, सोशल मीडिया और प्रेस कॉन्फ़्रेंस के ज़रिए हमेशा हमारे और आपके अवचेतन में घुसपैठ करने वाले पार्टी प्रवक्ता इस हमले पर ऐसे ख़ामोश हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो. या फिर जैसे उमर ख़ालिद ने ख़ुद ऐसी परिस्थितियाँ पैदा की हों कि उन पर हमला होना लाजिमी हो गया हो, और अगर उन्हें कुछ हो भी जाता है तो जनमत सरकार के विरुद्ध नहीं जाने वाली इसलिए क्यों चिंता की जाए.
सरकार और पुलिस को पसंद आए या न आए पर उमर ख़ालिद और कन्हैया कुमार ही नहीं, एसएआर गिलानी जैसे लोगों की हिफ़ाज़त करना भी उसी की ज़िम्मेदारी है जिन पर भारतीय संसद पर हमला करने के षडयंत्र में शामिल होने का आरोप लगा था, मगर हाईकोर्ट ने सबूतों के अभाव में उन्हें इस मामले से बरी कर दिया.
तो क्या एसएआर गिलानी के सभी नागरिक अधिकार हमेशा के लिए ख़त्म माने जाएँ?
गिलानी दिल्ली के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज में अरबी भाषा के प्रोफ़ेसर थे और 2001 में संसद पर हुए आत्मघाती हमले के बाद उन्हें गिरफ़्तार किया गया था. हाईकोर्ट से बरी किए जाने के बाद गिलानी को क्या वो शारीरिक और मानसिक सुरक्षा मिल पाई जो किसी भी नागरिक का संवैधानिक अधिकार है? बिल्कुल नहीं, बल्कि उनकी हत्या की कोशिश की गई.
हाईकोर्ट से रिहा किए जाने के कुछ समय बाद 2005 की एक शाम दिल्ली के वसंत कुंज इलाक़े में अज्ञात बंदूक़धारियों ने एक के बाद एक करके पाँच गोलियाँ गिलानी पर दाग़ीं. ज़ाहिर है, अदालत से छूट गए इस आदमी को कुछ लोग जीवित नहीं देखना चाहते थे.
गिलानी अपनी वकील नंदिता हक्सर से मिलने उनके घर गए थे कि उन पर हमला हो गया और आज तक ये पता नहीं चल पाया है कि गिलानी पर हमला किसने किया और उन्हें मारने से किसे फ़ायदा हो सकता था.
एसएआर गिलानी ने बताया, "इतने बरसों में सिर्फ़ एक बार मुझे साकेत कोर्ट में बुलाया गया. इसके बाद न पुलिस ने कुछ पूछताछ की और न मुझे कुछ बताया गया. हालाँकि, मेरे ज़ोर डालने पर ही नामालूम हमलावरों के ख़िलाफ़ एफ़आइआर दर्ज की गई थी."
गिलानी के हमलावरों का पता लगाने की ज़िम्मेदारी भारत सरकार की है और क़ानून, संविधान और नैतिकता की नज़र से देखें तो इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उन पर संसद पर हमले की साज़िश में शामिल होने का आरोप था, लेकिन तथ्य ये है कि अदालत ने उन्हें बेकसूर मानकर रिहा किया. सवाल ये है कि अदालत का फ़ैसला अंतिम और मान्य है या नहीं?
इसी तरह उमर ख़ालिद के हमलावर की शिनाख़्त करके उसे पकड़ने और सज़ा दिलवाने की ज़िम्मेदारी भी दिल्ली पुलिस की है. एसएआर गिलानी की जान लेने की कोशिश की ही तरह क्या इस मामले में भी कोई नहीं पकड़ा जाएगा? अगर ऐसा होता है तो इसे देश के गृह मंत्री की नाकामियों की फ़ेहरिस्त में ही गिना जाएगा.
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