कश्मीर में इसलिए फ्लॉप हो रहा अलक़ायदा

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    • Author, ज़ैनुल आबिद
    • पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग

भारत प्रशासित कश्मीर में जेहादी संगठन अलक़ायदा ने साल भर पहले अपनी मौजूदगी दर्ज कराकर यह संदेश दिया था कि वह कश्मीरी संघर्ष में अपनी जगह तलाशना चाहता है.

लेकिन अलक़ायदा की भारतीय शाखा जैसा समूह अंसार गजवत उल-हिंद (एजीएच) इस क्षेत्र के चरमपंथियों के बीच बेहद कम समर्थन हासिल कर पाया है.

अंसार गजवत उल-हिंद (एजीएच) भारत प्रशासित कश्मीर में अब तक कोई बड़ा हमला करने में अक्षम रहा है. इसके साथ ही दूसरे चरमपंथी समूहों ने अब तक इस समूह के प्रति समर्थन भी ज़ाहिर नहीं किया.

साल 2017 में एजीएच तब दुनिया के सामने आया जब मैसेज़िंग ऐप टेलिग्राम पर एक अलक़ायदा समर्थक चैनल ग्लोबल इस्लामिक मीडिया फ्रंट ने इसके बारे में बात की.

इसके बाद 28 जुलाई 2018 को ग्लोबल इस्लामिक मीडिया फ्रंट ने एजीएच के वादी में एक साल पूरा करने पर इसके संस्थापक सदस्य का बयान जारी किया.

मूसा से थी अलक़ायदा को आस

एजीएच ने ऐलान किया है कि उसने कश्मीर के एक लोकप्रिय चरमपंथी नेता ज़ाकिर मूसा को अपना मुख्य अधिकारी नियुक्त किया है.

एजीएच मूसा को सोशल मीडिया के इस्तेमाल में दक्ष एक आकर्षक चरमपंथी नेता के तौर पर देखता है, क्योंकि ज़ाकिर मूसा ने दूसरे कश्मीरी संगठनों की तरह राष्ट्रवादी मुद्दे पर बात करने के बजाय अलक़ायदा के वैश्विक सिस्टम को प्रसारित किया.

भारत के एक प्रमुख अख़बार में भी मूसा के एजीएच का चीफ़ बनने को एक बुरी ख़बर के रूप में बताया गया. इसके बाद विश्लेषकों और सरकारी अधिकारियों ने भी इसी तरह की प्रतिक्रियाएं दीं.

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एजीएच के सामने आने और मूसा के इसमें शामिल होने से चिंताए इस वजह से भी बढ़ गईं क्योंकि मूसा बुरहान वानी का दोस्त था जिसकी मौत के बाद से वादी में तनाव बढ़ गया है.

ऐसा माना गया कि मूसा का आकर्षक व्यक्तित्व कश्मीर की युवा पीढ़ी को आकर्षित करेगा जो कि भारत सरकार से असंतुष्ट नज़र आती है.

एजीएच की स्थापना के समय ये माना जा रहा था कि मूसा कश्मीर में चरमपंथ का चेहरा बदलकर रख देगा क्योंकि वह पहले से स्थापित स्थानीय संगठनों जैसे हिजबुल मुजाहिद्दीन, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मुहम्मद से चरमपंथियों को अपने संगठन में शामिल करेगा.

लेकिन ये अब तक नहीं हुआ है.

कश्मीरियों के क़रीब जाने में नाकाम

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एजीएच की स्थापना से पहले भी कश्मीर अलक़ायदा की नज़र में था.

साल 2014 में जब इस वैश्विक जिहादी संगठन ने अपनी एक नई शाखा 'भारतीय उप महाद्वीप में अल-क़ायदा' के बारे में बताया तो इस संगठन ने कश्मीर को अपनी इस शाखा के क्षेत्र के रूप में शामिल किया.

इसने टेलिग्राम पर अपनी सोशल मीडिया शाखा अल-साहब के ज़रिये कश्मीरी लोगों को संबोधित करते हुए तमाम संदेश जारी किए जिसमें भारत और पाकिस्तान की नीतियों की आलोचना की गई.

लेकिन इसके बावजूद ये संगठन कश्मीर में अपनी जगह बनाने में सफल नहीं हुआ है.

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शुरुआत में इस समूह को लेकर जेहादी उत्साह दिखाई दिया लेकिन इसने अब तक भारत सरकार और स्थानीय चरमपंथी समूहों को कोई मजबूत चुनौती नहीं दी है.

इसने भारत के सुरक्षा और राजनीतिक प्रतिष्ठानों समेत भारत के साथ काम करने वाली स्थानीय और विदेशी कंपनियों पर हमला करने का आह्वान भी किया है.

इसके साथ ही समूह ने विवश होकर भारत के मुसलमानों में विवादित विषयों पर दुष्प्रचार फैलाने की कोशिश की है.

इसमें साल 2018 में कठुआ गैंगरेप का बदला लेने से जुड़ा आह्वान भी शामिल है.

लेकिन अब तक ये समूह अपनी धमकियों को किसी घटना के रूप में अंजाम देने में सफल नहीं हुआ है.

कश्मीर में इस्लामिक स्टेट

आंकड़ों की बात करें तो इस्लामिक स्टेट संगठन ने कश्मीर में अपनी शाखा न होने और ज़ाकिर मूसा जैसा करिश्माई नेता न होने के बावजूद ज़्यादा चरमपंथी हमलों को अंजाम दिया है.

बीते नौ महीनों में इस्लामिक स्टेट कश्मीर में छह हमले कर चुका है और पांच सुरक्षा कर्मियों समेत एक जज की हत्या कर चुका है.

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आईएस सामान्य तौर पर कश्मीर में अपने हमलों की ज़िम्मेदारी 'खुरासान प्रांत' के रूप में लेता है जिसके बारे में साल 2015 में घोषणा की गई थी.

इस घोषणा में पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान और नज़दीकी क्षेत्रों पर कब्जा करने की बात कही गई थी.

एजीएच की ओर से सिर्फ एक घटना की बात सामने आई है जिसमें उसने मार्च महीने में श्रीनगर से 10 मील दूर बलहामा में भारतीय सुरक्षा बलों के साथ संघर्ष की बात कही थी.

एजीएच के मीडिया ऑपरेशन भी बीते कुछ महीने में प्रभावित हुए.

शुरुआती दिनों में इस संगठन ने अपने आधिकारिक टेलिग्राम चैनल अल-हुर्र पर काफी प्रचार किया लेकिन बीते कुछ महीनों में इसकी ओर से आने वाली सामग्री में काफी कमी आई है.

इस समूह की ओर से मई महीने में आखिरी बार कोई वीडियो प्रकाशित किया गया था जब कठुआ गैंगरेप का बदला लेने का आह्वान किया गया था.

स्थानीय संगठनों की ओर से चुनौती

अगर कश्मीर में वर्षों से सक्रिय स्थानीय चरमपंथी संगठनों हिजबुल मुजाहिद्दीन और लश्कर-ए-तैयबा की बात करें तो एजीएच का प्रभाव काफी सीमित है.

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एजीएच के ख़राब प्रभाव की एक वजह ये हो सकती है कि वह स्थानीय चरमपंथियों और शीर्ष अलगाववादी नेताओं को आकर्षित करने में असफल रहा है जो कि इस्लामी कानून स्थापित करने की जगह राष्ट्रवादी मुद्दे को लेकर समर्पित हैं.

कभी हिज़बुल मुजाहिद्दीन के सदस्य रहे ज़ाकिर मूसा ने ऐलान किया है, "इस्लाम में राष्ट्रवाद के लिए युद्ध प्रतिबंधित है." ये एक विचार है जो कश्मीर के चरमपंथी समूहों के मूल सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है.

इस वजह से ये समूह एजीएच से दूर हट गए जबकि वे अलक़ायदा के प्रति लंबे समय से सहानुभूति रखते हैं.

स्थानीय चरमपंथी समूहों के इस व्यवहार की वजह से एजीएच इन समूहों को "पाखंडी" क़रार देते हैं और वैश्विक इस्लामी आंदोलन से दूरी बनाने के लिए उनकी आलोचना करते हैं.

एजीएच की ओर से पाकिस्तान की लगातार आलोचना की वजह से भी चरमपंथी समूहों ने इस समूह से दूरी बनाई है. इसकी वजह इन समूहों को पाकिस्तानी सेना और इंटिलेजेंस समुदाय का कथित समर्थन है.

एजीएच के उप नेता रेहान ख़ान ने पाकिस्तान द्वारा कश्मीर को आज़ाद कराने के वादे को "भ्रम और धोखा" करार दिया है और पाकिस्तान पर जिहादी चरमपंथियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने और भारत के साथ गठबंधन करने का आरोप लगाया है.

लेकिन अब आगे क्या?

बीते एक साल में एजीएच का अनुभव ये बताता है कि इस संगठन को कश्मीर में अपनी जगह बनाने में अभी समय लग सकता है.

अलक़ायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे संगठनों के लिए कश्मीर के राष्ट्रवादी संघर्ष को शरिया कानून के लिए संघर्ष में तब्दील करना आसान नहीं है.

इसी बीच भारत सरकार ने घोषणा की है कि 87 युवाओं ने इस साल चरमपंथी संगठनों में प्रवेश किया है जो कि बताता है कि एजीएच को कश्मीर के जटिल जेहादी माहौल में अपनी जगह बनाने में वक़्त लग सकता है.

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