You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
असम: पार्टियों की सियासत और NRC पर अटकी 40 लाख सांसें
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
वो तमिलनाडु की थी, शादी असम में हुई. ग़रीब और अनपढ़ परिवार की इस युवती के पास जन्म-प्रमाण पत्र नहीं है, असम में सोमवार को जारी नागरिकता रजिस्टर में उसके पति का नाम तो है, लेकिन उस युवती का नहीं, जबकि वो भारत की नागरिक है.
एआईएडीएमके सांसद विजिला सत्यानंद के इस बयान पर राज्य सभा में 'शेम-शेम' की आवाज़ें गूंजने लगीं.
भारतीय संसद मंगलवार को इस तरह के उदाहरणों से गूंजती रही. इस दौरान असमिया-विदेशी मुद्दे पर आंदोलनकारी संगठन ऑल असम स्टूडेंस यूनियन से समझौता करने वाली कांग्रेस सरकार को सलाह देती नज़र आई, तो भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ताल ठोंककर कहते दिखे, "तुममें करने की हिम्मत नहीं थी, हममें हिम्मत है तो हम ये करने के लिए निकले हैं."
बीजेपी के लिए कथित बांग्लादेशी घुसपैठ एक बड़ा राजनीतिक हथियार रह रहा है. बीजेपी के नेता कैलाश विजयवर्गीय ने भी कहा है कि बंगाल में भी मांग उठ रही है कि एनआरसी की प्रक्रिया वहां भी शुरू की जाए.
बीजेपी पर बाँटने का आरोप
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी को शायद इसका कहीं न कहीं अहसास था.
गुवाहाटी में नागरिकता रजिस्टर की दूसरी और अंतिम लिस्ट जारी होने के कुछ ही देर बाद उन्होंने इस नागरिकता रजिस्टर को बीजेपी की वोट पॉलिटिक्स का हिस्सा बताया, उन्होंने कहा "इसमें उन लोगों को अलग किया गया है जो बीजेपी को वोट नहीं देंगे और वो जो बीजेपी को वोट देंगे."
कोलकाता में सोमवार को बुलाई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि जिन्हें नागरिकता सूची से अलग रखा गया है, उसमें बंगाली, बिहारी, हिंदू, मुसलमान और दूसरे बहुत सारे लोग शामिल हैं.
दिल्ली आईं ममता बनर्जी ने बुधवार को इस मामले पर विपक्षी नेताओं, पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा और बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी से मुलाक़ात की.
उन्होंने ये भी कहा है कि वो केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मिलने की कोशिश करेंगी और उन्हें ये बताएंगी कि इसका सबसे बड़ा ख़ामियाज़ा असम से सटे पश्चिम बंगाल को उठाना होगा.
ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि एनआरसी में उन लोगों के नाम जान-बूझकर शामिल नहीं किए गए हैं जो बांग्ला भाषी हैं.
शिकायतें रही हैं कि एनआरसी तैयार कर रहे लोग सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश के बावजूद इस तरह के हालात पैदा कर रहे हैं जिससे लोगों का नाम सूची में शामिल ही नहीं हो.
ग़ैर-असमिया आंदोलन के समय सूबे में रह चुके रिटायर्ड पुलिस अधिकारी एसआर दारापुरी ने हाल में फिर से असम का दौरा किया है. वो कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा कि अगर ग्राम पंचायत किसी के संबंध में रिहायशी प्रमाण पत्र देता है तो उसे माना जाना चाहिए, लेकिन एनआरसी में काम कर रहे लोग इसे मानने की बजाय इसके साथ दूसरे सर्टिफिकेट की भी मांग करते रहे, जो बहुत सारे लोगों के पास नहीं थे."
उसी तरह फॉरनर्स ट्राइब्यूनल के प्रमुख पहले रिटायर्ड जज हुआ करते थे, अब नियम बदलकर उन वकीलों को भी ये पद दे दिया गया है जिन्होंने कुछ साल ही प्रैक्टिस की है.
सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि ट्राइब्यूनल्स के प्रमुख बनाए गए ये वकील एक ख़ास क़िस्म की विचारधारा से प्रभावित हैं, जिसका असर अब और साफ़ हो रहा है.
'ये नागरिकता सूची फ़ाइनल नहीं'
लोकसभा में बोलते हुए केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि सोमवार को जारी हुई नागरिकता सूची फ़ाइनल नहीं है और जिनके नाम इसमें शामिल नहीं उन्हें सुनवाई का मौक़ा दिया जाएगा और जो इन सबके बाद भी संतुष्ट नहीं होंगे वो अपना मामला फॉरनर्स ट्राइब्यूनल में ले जा सकते हैं.
"उन्हें कहीं न कहीं तो इंसाफ़ मिलेगा," राजनाथ सिंह ने ये बात सदन में फॉरनर्स ट्राइब्यूनल में सुनवाई की बात पर मचे हंगामे के बीच कही.
असम नागरिकता रजिस्टर की सूचियां के दो ड्राफ़्ट अब तक जारी हो चुके हैं जिसके बाद रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया ने कहा है कि उसमें असम में रहने वाले 40 लाख लोगों के नाम शामिल नहीं हैं.
अब सवाल ये भी पूछे जा रहे हैं कि जिन 40 लाख लोगों की नागरिकता पर प्रश्न-चिह्न खड़े किए गए हैं, उनका अब क्या होगा?
वो कहां रहेंगे, अगर बाद में भी उनके सर्टिफिकेट को सही नहीं पाया गया या उन्हें फॉरनर्स ट्राइब्यूनल से भी राहत न मिली तब?
'यथास्थिति बनी रहेगी'
क्या उन्हें बांग्लादेश भेजा जाएगा और अगर वो भारत में ही रहे तो उनके पास क्या कोई अधिकार होंगे या नहीं?
अंग्रेज़ी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस को दिए गए एक इंटरव्यू में बांग्लादेश के सांस्कृतिक मंत्री असदुज्ज़मा नूर ने कहा है कि ये दोनों देशों के बीच का मुद्दा नहीं है इसलिए जिन लोगों के नाम एनआरसी में नहीं है उन्हें वापस लेने का सवाल ही पैदा नहीं होता है.
अमित शाह ने ये सवाल किए जाने पर कहा कि जब वो मौक़ा आएगा तब उसके बारे में सोचेंगे.
हालांकि असम में एनआरसी के संयोजक प्रतीक हजेला ने कहा है कि जब तक फाइन ड्राफ्ट नहीं आ जाता तब तक उन 40 लाख लोगों की यथास्थिति बनी रहेगी.
कांग्रेस नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद ने राज्य सभा में एक बहस के दौरान सुझाव दिया है कि सरकार को चाहिए कि जिन लोगों की नागरिकता पर सवाल उठे हैं उन्हें क़ानूनी सहायता दे और नागरिकता प्रमाणित करने का भार सिर्फ़ नागरिकों पर न छोड़कर सरकार भी इसमें लोगों की मदद करे.
केंद्रीय गृह मंत्री ने आश्वस्त किया है कि जिनके नाम सूची में नहीं है उनके साथ किसी तरह का ज़ालिमाना बर्ताव नहीं किया जाएगा.
दिल्ली से असम के दौरे पर गईं कई स्वयंसेवी संस्थाओं का कहना है कि राज्य में छह डिटेंशन सेंटर काफ़ी दिनों से वहां की जेलों में चल रहे हैं जिसमें कम से कम 1900 लोग हैं.
डिटेंशन सेंटर में 1900 से ज़्यादा लोग
असम विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब के मुताबिक़, इन विदेशी नागरिकों में से 950 से अधिक महिलाएं हैं.
रश्मीनार बेगम का क़िस्सा जिन्हें विदेशी होने के नाम पर तब डिटेंशन सेंटर में डाल दिया गया था जब वो गर्भ से थीं, कई पत्रिकाओं में छप चुका है.
जानी-मानी पत्रिका कारवां ने अपने एक लेख में कहा है: असम में जो हो रहा है वो अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की निष्ठुर प्रवासी नीति जैसा है, जिसमें अल्पसंख्यकों को निशाना और छोटे बच्चों को मां-बाप से अलग कर दिया जाता है.
दिल्ली में पीएचडी कर रहे असम के रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता बीबी चौधरी कहते हैं कि एनआरसी में जो लोग काम पर लगाए हैं उनमें से बड़ी तादाद असमिया लोगों की है.
कार्यकर्ताओं का ये भी कहना है कि लोगों की शिकायतें रही हैं कि या तो उन्हें नोटिस मिले ही नहीं, या वो वक़्त पर नहीं मिले, बहुत से लोग बिना किसी ख़बर के डी वोटर क़रार दे दिए गए, जिसका पता भी उन्हें तब चला जब इस मामले पर उनकी गिरफ़्तारी हो गई.
असम में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ सूबे में 2.4 लाख से अधिक वैसे लोग हैं जो 'संदेहास्पद मतदाता' की श्रेणी में हैं.
राज्य में इस व्यवस्था के अलावा एक बॉर्डर पुलिस भी है जो ऐसे 'संदिग्ध' लोगों पर नज़र रखती है जो भारत के नागरिक न हों. ये ऐसे नागरिकों से सवाल-जवाब कर सकती है, फॉरनर्स ट्राइब्यूनल में बहुत सारे मामले इस माध्यम से भी पहुंचते हैं.
पूर्वोतर राज्य असम में असमिया और ग़ैर-असमिया का मुद्दा दशकों पुराना है और इस पर न सिर्फ़ 70 के दशक में व्यापक आंदोलन हुआ, बल्कि लाखों लोगों की जानें भी गई हैं - 1983 का नेल्ली जनसंहार आज भी बहुतों को याद है जिसमें एक ही ज़िले में कम से कम तीन हज़ार मुसलमानों का क़त्ल कर दिया गया था, जिसमें औरतें और बच्चे भी शामिल थे.
इसी सिलसिले में 1985 में राजीव गांधी की केंद्र सरकार, असम हुकूमत और आंदोलनकारी संगठन ऑल असम स्टूडेंस यूनियन के नेताओं के बीच समझौता हुआ जिसमें गैर-क़ानूनी घुसपैठियों की पहचान करने की शर्त शामिल थी.
नागरिकों की रजिस्टर तैयार करने या यूं कहें कि असम में रहने वाले वो लोग जो भारत के नागिरक नहीं हैं, उनकी पहचान करने और उसकी सूची तैयार करने का काम हालांकि 2010 में शुरू हो पाया - तब राज्य में कांग्रेस की तरुण गोगोई सरकार हुआ करती थी.
हालांकि, पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर दो ज़िले में शुरू किए गए नागिरक रजिस्टर के काम को वहां हुई हिंसा के बाद बंद कर दिया गया, जिसमें छह लोगों की मौत हो गई थी.
एनआरसी का काम फिर से 2015 में शुरू हुआ.
असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने कहा है कि नागरिक रजिस्टर तैयार करने का काम कांग्रेस के काल में शुरू हुआ था, इसलिए पार्टी को अब इस बात से मुकरना नहीं चाहिए.
हालांकि उनका कहना था कि इस पूरे काम को बाद में ठीक तरह से नहीं किया गया और कुछ लोग इसे हिंदू-मुसलमान मुद्दा बनाने पर तुले हैं.
वोट पॉलिटिक्स के आरोप के जबाव में बीजेपी पूरे मामले को देश की सुरक्षा और भारतीयों के मानवधिकारों से जोड़ने की कोशिश कर रही है.
वहीं, स्वंयसेवी संस्था यूनाइटेड अगेंस्ट हेट ने असम दौरे के बाद के अपनी रिपोर्ट में कहा है, बीजेपी और आरएसएस चाहते हैं कि एनआरसी विवाद में आए ताकि असम में हिंदुत्व कार्ड खेला जा सके और बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट अपना मुस्लिम कार्ड खेलेगी.
ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के बारे में कहा जाता है कि उसे मुख्यत: उन वोटरों का समर्थन हासिल हैं जो बांग्ला भाषी हैं.
नरेंद्र मोदी सरकार ने एक नया नागरिकता बिल लाने की कोशिश भी की थी, जिसमें हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने की बात थी, लेकिन असम में इस बात को लेकर विरोध हुआ कि वो किसी भी धर्म-समुदाय के बाहरी लोगों के ख़िलाफ़ हैं.
फ़िलहाल ये क़ानून ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है.
(बीबीसी हिन्दी एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं. हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)