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मॉब लिंचिंग करने वाले वो जिन्हें गोमांस खाने के कारण ठेस पहुँचती है: इंद्रेश कुमार
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हाल ही में राजस्थान के अलवर में रकबर नाम के एक मुस्लिम व्यक्ति की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार का मीडिया में आया बयान विवाद का एक बड़ा मुद्दा बना.
उनके बयान में कहा गया था कि अगर लोग गोमांस खाना छोड़ दें तो 'मॉब लिंचिंग' की वारदातें बंद हो जाएंगी.
रकबर की हत्या से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और केंद्र सरकार को 'मॉब लिंचिंग' रोकने की सलाह दी थी और एक नया क़ानून पारित करने को कहा था.
आरएसएस के वरिष्ठ नेता के इस विवादास्पद बयान की पुष्टि के लिए और उनके विचार को समझने के लिए हमारे संवाददाता ज़ुबैर अहमद ने उनसे मुलाक़ात की.
इंद्रेश कुमार ने दोपहर बाद तीन बजे इंटरव्यू का समय दिया था, लेकिन उनसे मिलने आए लोगों की लंबी क़तार लगी थी.
दो घंटे बाद वो अपने कमरे से बाहर निकले और बीबीसी से रू-ब-रू हुए. पढ़िए, पूरा इंटरव्यू-
आपके बयान पर विवाद है, क्या आपने ये बयान पूरी ज़िम्मेदारी से दिया था?
आपका ये सवाल सच पर आधारित नहीं है. मैंने झारखंड में एक मीटिंग में कहा था कि आज मॉब लिंचिंग और गाय को लेकर तीन पक्ष हैं. पहला पक्ष वो है जो गाय को लेकर लोगों का दिल दुखाते हैं. उनकी भावना को ठेस पहुंचाते हैं और वो ये मानते हैं कि लोगों का दिल दुखाना, ठेस पहुँचाना उनका अधिकार है.
किसी का दिल दुखाना एक प्रकार की बड़ी हिंसा है. दूसरा समूह है वो जो इस दिल दुखाने से बड़े रोष में आता है और वो आक्रामक और हिंसक हो जाता है.
एक तीसरा वर्ग है जिसमें राजनेताओं की भरमार ज़्यादा है. वो वोट बैंक की राजनीति में घी डालकर आग भड़काने का काम करते हैं, समझाने की बजाय भड़काने का काम करते हैं.
ये ठेस पहुँचाने वाले कौन हैं? क्या आपका इशारा मुसलमानों की तरफ़ है?
ये एक सांप्रदायिक सवाल है. मैंने किसी समुदाय का नाम लिया? आप वैसे ज़ुबैर नहीं हो जैसा मैंने समझा था. आप भी सांप्रदायिक लोगों की श्रेणी में आते हैं.
आपके बयान से लगता है कि आप गोरक्षकों की हिंसा को जस्टिफाई कर रहे हैं...?
(सवाल को काटते हुए) तीनों तरह की हिंसा निंदनीय हैं और इसलिए इन तीनों तरह के लोगों से मेरा निवेदन है कि वो अपनी-अपनी हिंसा को छोड़ें."
लेकिन ऐसा लगता है आप बीफ़ खाने के चलते हो रही मॉब लिंचिंग को उचित ठहरा रहे हैं?
(भड़कते हुए) आपका प्रश्न मूर्खतापूर्ण है, अनैतिक है. इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं बढ़ावा दे रहा हूँ. इसका अर्थ है कि आप अपने सवाल से दिल दुखाने वालों को बढ़ावा दे रहे हैं कि दूसरे धर्म का अपमान करो, दूसरों की भावनाओं को कुचलो. इसलिए हिंसा मैं नहीं भड़का रहा हूँ आपका सवाल उस हिंसा को प्रोटेक्शन दे रहा है जो दूसरों का दिल दुखाता है.
ये आप की राय है?
मैं आपको बताता हूँ, क्या आप जानते हैं कि इस्लाम और ईसाई धर्म में गोमांस खाना हराम है. मक्का शरीफ़ और मदीना शरीफ़ में आज तक गाय का वध नहीं हुआ.
वहां वध करना, गोश्त बेचना और ख़रीदना अपराध माना जाता है. पैग़ंबर ईसा एक गोशाला में पैदा हुए थे. दुनिया के सभी धर्मों में गाय का सम्मान किया जाता है
मक्का और मदीना में गोमांस खाना हराम नहीं है. वैसे भी वहां दुम्बा (एक तरह की भेड़) और ऊँट का मीट खाया जाता है.
आपको मालूम नहीं है. कुछ है या नहीं है ये अपराध की श्रेणी में आता है. आपको नहीं मालूम. मुझे कई मौलवियों ने बताया है.
क्या आप यक़ीन के साथ ये कह रहे हैं, ये बात कन्फर्म है?
एक बात पक्की मान कर चलो, मैं ना आपकी तरह मिलावट करता हूँ, ना झूठ बोलता हूँ, ना उकसाता हूँ, ना ग़लत बोलता हूँ. इसलिए जो मेरे से पूछेगा क्या ये कन्फ़र्म है तो मैं उससे कहूंगा आप यहाँ से चले जाएँ, क्योंकि आप इंटरव्यू करने लायक़ नहीं हैं.
मुद्दे पर लौटते हैं, बीफ़ खाने से जिसका दिल अगर टूटा या ठेस पहुंची वो क़ानून का सहारा ले सकता है, हिंसा पर उतारू होना तो सही नहीं है?
आप क़ानून तोड़ेंगे (ठेस पहुंचाकर) वो ठीक है? किसी का दिल नहीं दुखाना भी तो क़ानून है, तो क्यों दिल दुखाया जाता है? जो भड़क कर हिंसा करते हैं वो भी सही नहीं है.
अपने समाज में बीफ़ सभी मज़हब के लोग खा रहे हैं. मैं मुसलमान हूँ बीफ़ नहीं खाता, लेकिन हमारे कई हिन्दू दोस्त खाते हैं. तो गोमांस खाने के इल्ज़ाम पर मुसलमानों की 'मॉब लिंचिंग' क्यों हो रही है?
इसे सांप्रदायिक रूप नहीं दीजिए. इसे संवाद का मुद्दा बनाइए. जो इस बहस में दिल दुखाने वालों का साथ देंगे, वो संविधान के साथ क्रूर मज़ाक कर रहे हैं. यह अनैतिक और अमानवीय है. वो एंटी-हिन्दू हैं, एंटी-मुस्लिम हैं और एंटी-ईसाई हैं.
केरल, गोवा, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के राज्यों में बीजेपी और आरएसएस के कई लोग गोमांस खाते हैं. 2017 में केरल में एक उपचुनाव में बीजेपी के एक उम्मीदवार ने चुनाव जीतने पर बीफ़ की सप्लाई जारी रखने का वादा किया. ये आरएसएस की दोहरी नीति नहीं है?
आप केवल एक ही पार्टी का उदाहरण क्यों दे रहे हैं? आप आज़म ख़ान, असदुद्दीन ओवैसी, राहुल गांधी और कांग्रेस के नाम क्यों नहीं ले रहे हैं, जो गोमांस खाने वालों का प्रोत्साहन करते हैं.
आपकी ये दोहरी नीति है या नहीं? बीफ़ निर्यात करने वाले मुसलमान तो नहीं?
(सवाल काटते हुए, ग़ुस्से में ) "आप सिलेक्टिव हो रहे हैं. डोंट बी कम्युनल (सांप्रदायिक न बनो). बीबीसी में नौकरी करते हो. बीबीसी देश को तोड़ने के लिए कुछ धंधा करती होगी, आप उसकी एजेंसी क्यों बनते हो?
ये आपका इल्ज़ाम है. गोमांस को लेकर बहस सदियों से चली आरही है. इतिहासकार अलबरूनी ने 1017 में, यानी 1000 साल पहले अपनी किताब में लिखा था कि गोमांस को लेकर हिन्दू समाज में विवाद है. ये मुद्दा इतना पुराना है, लेकिन इस पर हिंसा पहले नहीं हुई. आज क्यों हो रही है?
पहले लोग दिल दुखाने वाली हिंसा नहीं करते थे. संवाद करते थे. इसलिए सब धर्मों के लोगों में संवाद की प्रणाली थी. आज नहीं है.
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