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मध्य प्रदेश के चुनावी घमासान में दिग्विजय सिंह कहां हैं?
- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ना तो अहम फ़ैसले लेने वाली वर्किंग कमेटी में शामिल हैं और ना ही उनके पास अपने राज्य मध्य प्रदेश में होने वाले चुनाव के नज़रिए से कोई ख़ास ज़िम्मेदारी है.
लेकिन इसके बावजूद ऐसा लग रहा है कि मध्य प्रदेश चुनाव को दिग्विजय सिंह से अलग रखकर नहीं देखा जा सकता. ख़ुद दिग्विजय सिंह का दावा है कि राज्य में उनसे ज़्यादा सक्रिय नेता ना तो बीजेपी में है और ना ही कांग्रेस में.
बीबीसी को दिए गए विशेष इंटरव्यू में दिग्विजय सिंह ने कहा, "मैं पिछले डेढ़ महीने में 20 ज़िलों में जा चुका हूं. अगस्त तक राज्य के सभी 51 ज़िलों तक घूम लूंगा. आप ये बताइए कि कौन बीजेपी का नेता छह महीने तक राज्य में पैदल चला है. कांग्रेस का भी कौन नेता छह महीने तक राज्य में पैदल चला है. पिछले छह महीने में मुझसे ज़्यादा सक्रिय नेता कौन है? आप बताइए."
1956 से 2018 तक मध्य प्रदेश की राजनीति पर दो खंडों में राजनीतिनामा लिख चुके वरिष्ठ पत्रकार दीपक तिवारी कहते हैं, "आज के दौर में दिग्विजय सिंह अकेले ऐसे कांग्रेसी नेता हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि उनकी पूरे राज्य में पकड़ है. ख़ासकर कांग्रेस के संगठन में हर जगह पर उनके लोग हैं."
दिग्विजय सिंह ने पिछले दिनों मध्य प्रदेश में नर्मदा परिक्रमा के तहत हज़ारों किलोमीटर की पैदल यात्रा ज़रूर की है, लेकिन मौजूदा समय में राज्य में कांग्रेस की कमान कमलनाथ के पास है, जबकि चुनावी अभियान समिति की ज़िम्मेदारी ज्योतिरादित्य सिंधिया को दी गई है.
'गिरफ़्तार करें या माफ़ी मांगें'
लेकिन आए दिन अपनी चुनावी सभाओं में मौजूदा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान दिग्विजय सिंह पर निशाना साध रहे हैं, एक सभा में वे दिग्विजय सिंह पर देशद्रोह का आरोप लगा चुके हैं.
दिग्विजय सिंह इन आरोपों के जवाब में कहते हैं, "मैं 26 जुलाई को टीटी नगर थाने जाकर कहूंगा कि आपके मुख्यमंत्री ने देशद्रोह का आरोप लगाया है, मुझे गिरफ़्तार कर लीजिए, अगर वे गिरफ़्तार नहीं करेंगे तो कहूंगा शिवराज सिंह चौहान माफ़ी मांगे."
शिवराज सिंह अपनी चुनावी सभाओं में दिग्विजय सिंह के 1993 से 2003 तक के शासन को मुद्दा बना रहे हैं, इस बारे में दीपक तिवारी कहते हैं, "शिवराज सिंह चौहान ऐसा रणनीति के तहत कर रहे हैं, क्योंकि मध्य प्रदेश के लोगों में अब भी दिग्विजय सिंह के लिए नाराज़गी बनी हुई है. उनके शासनकाल के दौरान बिजली और सड़क जैसी सुविधाएं बेहद ख़राब स्थिति में थीं. तो शिवराज आम लोगों को उस दौर की याद दिलाकर बीजेपी की वापसी का रणनीति पर काम कर रहे हैं."
राज्य की राजनीति पर नज़र रखने वालों की मानें तो बीजेपी की कोशिश यही है कि वे आने वाले चुनाव को शिवराज बनाम दिग्विजय की लड़ाई बना दें. पिछले दो विधानसभा चुनावों यानी 2008 और 2013 में बीजेपी ने अपनी मीडिया रणनीति में ऐसा दोहराया भी है. दीपक तिवारी बताते हैं, "बीजेपी ने पिछले दोनों विधानसभा चुनाव के दौरान ऐसा मैनेज किया था कि कांग्रेस की कोई भी ख़बर छपती थी, उसमें फोटो दिग्विजय सिंह का ही छपता था."
'कांग्रेस वापसी करेगी'
लेकिन दिग्विजय सिंह का दावा है कि इस बार राज्य में कांग्रेस ही वापसी करेगी. वे कहते हैं, "कमलनाथ जी रणनीति बना रहे हैं, हम लोग मिलकर चुनाव लड़ेंगे और सरकार बनाएंगे. छह महीने की नर्मदा परिक्रमा यात्रा के तहत मुझसे ढेरों लोग मिले, किसान, व्यापारी, ब्यूरोक्रेट्स, हर वर्ग का आदमी बेहद दुखी है, सब नाराज हैं."
राज्य के वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीक्षित भी मानते हैं कि बीजेपी के सामने इस बार कांग्रेस की स्थिति बेहतर दिख रही है. वे कहते हैं, "इस बार कांग्रेस की स्थिति मज़बूत दिख रही है, अगर कांग्रेस ने लगातार ज़मीनी स्तर पर काम जारी रखा तो स्थिति उनके पक्ष में हो सकती है."
हालांकि एक आशंका ये भी जताई जा रही है कि शिवराज सिंह चौहान के सामने कांग्रेस का कोई एक चेहरा नहीं है. कांग्रेस की ओर से राज्य में तीन बड़े नेता हैं- दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया. ऐसे में एक आशंका ये भी है कि इन तीनों में किसी भी खींचतान का असर पार्टी के हितों को प्रभावित कर सकता है.
हालांकि राकेश दीक्षित इससे असहमति जताते हुए कहते हैं, "दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया तीनों की अपनी अपनी ख़ासियत है और इन तीनों में अब तक किसी तरह का कोई विवाद नहीं दिखा है. कमलनाथ जहां संगठन को बेहतर करने में लगे हैं, ज्योतिरादित्य अपनी छवि को प्रदेश स्तर पर मज़बूत कर रहे हैं, जबकि दिग्विजय प्रदेश में एक तरह से कॉर्डिनेटर की भूमिका निभा रहे हैं."
दिग्विजय सिंह कहते हैं, "हम लोग एकजुट होकर चुनाव लड़ेंगे तो बीजेपी किसी भी सूरत में जीत नहीं सकती. पार्टी एकजुट रहे, ये हमारी ज़िम्मेदारी और दायित्व भी है और मैं इसे पूरा करूंगा."
दिग्विजय ये भी दोहराते हैं कि वे दस साल तक राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, उनकी मुख्यमंत्री बनने की कोई महत्वाकांक्षा नहीं है और किसी नए चेहरे को मौका मिलना चाहिए. उनके समर्थक भी कहते हैं जो शख़्स डीआईजी रह चुका हो वो फिर से एसपी क्यों बनना चाहेगा.
लेकिन मुश्किल बनी हुई है
ये बात सही है कि दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच अब तक किसी खींचतान की ख़बर सामने नहीं आई है लेकिन इन तीनों नेताओं की मौजूदगी से स्थानीय कार्यकर्ताओं के सामने एक व्यावहारिक मुश्किल ज़रूर सामने आ गई है.
स्थानीय इकाई को इन नेताओं के अलग-अलग दौरे के दौरान चुनावी सभा की भीड़ जुटानी होती है. एक स्थानीय नेता के मुताबिक अलग-अलग एक सभा का खर्च तीन से चार लाख बैठता है, तो तीनों नेताओं के दौरे में 10 लाख रुपये तो आयोजन का ही ख़र्च बैठ रहा है.
ऐसे में राज्य में 15 साल से सत्ता से बाहर चल रही पार्टी के कार्यकर्ताओं की स्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. केंद्र में भी कांग्रेस की सरकार नहीं है, ऐसे में संसाधनों को जुटाने में माहिर समझे जाने वाले कमलनाथ की सबसे बड़ी चुनौती संसाधनों की व्यवस्था करना बनता जा रहा है.
दूसरी तरफ बीजेपी के पास राज्य से लेकर केंद्र तक में सत्ता है, लिहाजा संसाधनों की कमी नहीं है, और तो और बीजेपी के तमाम बड़े नेता एकजुट होकर चुनावी रैलियां कर रहे हैं.
राज्य में नवंबर में चुनाव होने हैं. 2013 विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 230 में से 165 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस के पास 57 सीटें थीं.
ऐसे में कांग्रेस की राह बहुत आसान नहीं दिख रही है, लेकिन दिग्विजय सिंह को भरोसा है कि 2019 की लड़ाई का शंखनाद उनके अपने ही राज्य में कांग्रेस की जीत के साथ शुरू होगा.
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