पाकिस्तान में मौत की सज़ा भी नहीं रोक पाई बलात्कार

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- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सोमवार को लोकसभा में आपराधिक क़ानून संशोधन विधेयक पर चर्चा के बाद उसे पास कर दिया गया है.
आपराधिक क़ानून में इस बदलाव के बाद 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार के मामलों में दोषियों को मृत्युदंड तक की सज़ा सुनाई जा सकती है.
इससे पहले साल 2012 में दिल्ली में एक चलती बस पर कॉलेज की छात्रा 'निर्भया' के बलात्कार के बाद अगले साल क़ानून में संशोधन कर बलात्कार के लिए अधिकतम मौत की सज़ा का प्रावधान लाया गया था.
पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के बाद भारत, बलात्कार के लिए मौत की सज़ा तय करनेवाला चौथा दक्षिण-एशियाई देश है.
पर क्या ये प्रावधान बलात्कार के मामले कम करने में कारगर है, इसपर एक राय नहीं है.
हमने मौत की सज़ा देनेवाले तीनों दक्षिण-एशियाई देशों का अध्ययन कर यही जानने की कोशिश की.
पाकिस्तान
मौत की सज़ा कब लाई गई?
पाकिस्तान यौन हिंसा के मामलों में मौत की सज़ा लाने वाला पहला दक्षिण एशियाई देश था.
1979 में जनरल ज़िया उल हक़ की सैन्य सरकार 'हुदूद ऑर्डिनेन्स' लेकर आई जिसके तहत बलात्कार और 'अडल्ट्री' यानी शादी के बाहर शारीरिक रिश्ता बनाना, इन दोनों जुर्मों के लिए पत्थरों से मारकर मौत की सज़ा दी जा सकती थी.

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लेकिन इसके प्रावधानों को औरतों और बच्चों के ही ख़िलाफ़ माना गया, मसलन बलात्कार साबित करने के लिए सबूत के तौर पर चार मर्द चश्मदीद की ज़रूरत थी. वर्ना इसे 'अडल्ट्री' माना जाता और उसके लिए औरत को भी सज़ा दी जाती.
आख़िरकार 2006 में 'हुदूद ऑर्डिनेन्स' को संशोधित किया गया और नया क़ानून 'प्रोटेक्शन ऑफ़ वुमेन (क्रिमिनल लॉज़ अमेंडमेंट) ऐक्ट' लाया गया.
इसके तहत 'अडल्ट्री' को बलात्कार से अलग जुर्म माना गया और बलात्कार, सामूहिक बलात्कार और 16 साल से कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार के लिए अधिकतम मौत की सज़ा तय की गई.
क्या मौत की सज़ा के बाद बलात्कार के मामले कम हुए हैं?
मौत की सज़ा लाए जाने के 12 साल बाद पाकिस्तान में बलात्कार के मामलों में 10 गुना बढ़ोतरी हुई है.
तब से पाकिस्तान में नियमित तरीक़े से फांसी दी जाती रही है.
सिर्फ़ 2008 से 2014 के बीच जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों का सम्मान करने का दबाव बना, तब उस समय के राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी ने इस पर रोक लगाई.
हालांकि इस दौरान भी न्यायालय मौत की सज़ा सुनाते रहे.
'ह्यूमन राइट्स कमिशन फॉर पाकिस्तान' के मुताबिक़ साल 2006 से 2017 तक 25 लोगों को बलात्कार या सामूहिक बलात्कार के जुर्म के लिए फांसी दी गई है.

लाहौर स्थित क़ानूनी अधिकारों पर काम करनेवाली संस्था 'जस्टिस प्रोजेक्ट पाकिस्तान' की ज़ैनब मलिक ने बताया, "यहां बलात्कार को आतंकवाद जितना गंभीर माना जाता है फिर भी कुछ नहीं बदला, बलात्कार और सामूहिक बलात्कार के मामले बढ़ रहे हैं जबकि दोष साबित होने की दर बहुत कम है."
अफ़गानिस्तान
मौत की सज़ा कब लाई गई?
साल 2009 में अफ़गानिस्तान में 'एलिमिनेशन ऑफ़ वॉयलेंस अगेन्स्ट वुमेन' क़ानून पारित किया गया. इससे पहले उस देश में क़ानून की नज़र में बलात्कार अपराध ही नहीं था.

पहली बार अफ़गानिस्तान में बलात्कार, मारपीट, बाल विवाह, ज़बरन शादी और आत्महत्या करवाने की कोशिश समेत महिलाओं के ख़िलाफ़ 22 अपराधों के लिए सज़ा तय की गई.
मौत की सज़ा का प्रावधान उन मामलों में लाया गया, जिनमें बलात्कार के बाद महिला या बच्चे की मौत हो जाए.
क्या मौत की सज़ा के बाद बलात्कार के मामले कम हुए हैं?
मौत की सज़ा लाए जाने के बाद अफ़ग़ानिस्तान में बलात्कार के मामले नियमित तौर पर बढ़ते गए हैं.
वहां मौत की सज़ा कम ही दी जाती है. तालिबान के दौर में सार्वजनिक तौर पर लोगों को मारने का चलन था.

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लेकिन साल 2001 में तालिबान के ख़त्म होने के बाद अफ़गान सरकार ने कभी-कभार ही मौत की सज़ा को अंजाम दिया है.
इसके लिए ख़ुद राष्ट्रपति को आदेश पर दस्तख़त करने होते हैं.
साल 2014 में पांच आदमियों को कुछ औरतों के सामूहिक बलात्कार के लिए जब मौत की सज़ा दी गई तो दो घंटे की सुनवाई में लिए गए इस फ़ैसले की आलोचना भी हुई थी.
मौत की सज़ा पर दुनियाभर से आंकड़े जुटानेवाली अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था 'एमनेस्टी इंटरनेशनल' के मुताबिक़ साल 2009 से अब तक 36 मामलों में मौत की सज़ा दी गईं लेकिन इनमें से कितनी बलात्कार के जुर्म के लिए थीं, इसका कोई अनुमान नहीं है.
बांग्लादेश
मौत की सज़ा कब लाई गई?
बांग्लादेश सरकार 1995 में 'ऑपरेशन ऑफ़ वुमेन एंड चिल्ड्रन (स्पेशल प्रोविज़न्स) ऐक्ट' लाई ताकि बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, एसिड से हमलों और बच्चों की तस्करी जैसे अपराधों के लिए मौत की सज़ा जैसे सख़्त प्रावधान बनाए जा सकें.
लेकिन यही सख़्त सज़ा आलोचना की वजह बनी. कई अभियुक्त रिहा हो गए क्योंकि सबूत काफ़ी नहीं थे.
पांच साल बाद क़ानून को निरस्त कर दिया गया और नया क़ानून 'प्रिवेंशन ऑफ़ ऑपरेशन अगेन्स्ट वुमेन एंड चिल्ड्रन ऐक्ट' लाया गया. इसमें मौत की सज़ा के प्रावधान को बरक़रार रखा गया पर साथ ही उम्रक़ैद और जुर्माने जैसे दंड भी लाए गए.

क्या मौत की सज़ा के बाद बलात्कार के मामले कम हुए हैं?
बांग्लादेश में मौत की सज़ा का प्रावधान लाने के 24 साल बाद भी बलात्कार के मामले कम नहीं हुए हैं.
मानवाधिकार कार्यकर्ता सुल्ताना कमल के मुताबिक़, "इसका कोई सबूत नहीं कि मौत की सज़ा बलात्कारियों के मन में ख़ौफ़ पैदा करती है, ना बलात्कार के मामले कम हुए हैं ना कन्विक्शन बढ़ें हैं और इसकी वजह सबूतों को ठीक से इकट्ठा ना किया जाना, शिकायतकर्ता और चश्मदीदों की सुरक्षा की कमी है."

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एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक़ बांग्लादेश में पिछले 10 सालों में 50 से ज़्यादा फांसी दी गईं हैं. लेकिन इनमें से कितनी बलात्कार के जुर्म के लिए थीं, इसका कोई अनुमान नहीं है.
हाल के सालों में वहां मौत की सज़ा के ख़िलाफ़ आवाज़ें बुलंद हुई हैं, जिसकी वजह से साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फ़ैसले में कहा कि बलात्कार के मामलों में 'मौत की सज़ा' को अनिवार्य समझना असंवैधानिक होगा और दंड को सोच समझ कर तय किया जाना चाहिए.
भारत इससे क्या सीख सकता है?
1.बलात्कार के मामलों का कम रिपोर्ट होना
सभी दक्षिण-एशियाई देशों में बलात्कार पीड़ितों को 'कलंक' के तौर पर देखा जाता है जिसके चलते ऐसे मामले कम रिपोर्ट होते हैं.
ह्यूमन राइट्स वॉच की साल 2012 की एक रिपोर्ट बताती है कि बलात्कार की शिकायत करनेवाली औरतों को अक़्सर 'अडल्ट्री' के लिए गिरफ़्तार कर लिया जाता है. जो औरतें जबरन की गई शादियों से या घरेलू हिंसा से निकल पाती हैं उन्हें घर से भागने के जुर्म में गिरफ़्तार कर लिया जाता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, "हिंसा से बचकर निकलने की कोशिश करनेवाली औरतों को पुलिस, न्याय व्यवस्था और सरकारी अधिकारियों से मदद मिलने की जगह उन्हें दुत्कारा जाता है."
भारत ने महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के मामलों में पुलिस और अन्य अधिकारियों की जवाबदेही बढ़ाने के लिए अपने क़ानूनों में संशोधन किया है जिसका सकारात्मक असर हुआ है.

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लेकिन शोध बताते हैं कि ये असर बहुत धीमा है. बलात्कार के कुल मामलों और पुलिस में रिपोर्ट होने वाले मामलों के बीच फ़ासला बहुत ज़्यादा है.
अफ़ग़ानिस्तान स्वायत्त मानवाधिकार आयोग के कार्यकारी निदेशक के मुताबिक़ इस संदर्भ में, सिर्फ़ मौत की सज़ा बलात्कार के मामलों को कम नहीं कर सकती.
2.दोषी सिद्ध होने की दर भी कम
साल 2014 में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सईदा सुग़रा ने आरोप लगाया था कि पिछले पांच साल में पाकिस्तान में बलात्कार के लिए दोषी पाए जाने की दर यानी कन्विक्शन रेट शून्य था.
इसकी एक बड़ी वजह सज़ा का इतना कड़ा होना है. कई मामलों में पुलिस शिकायतकर्ता को धमकी देकर या दबाव बनाकर शिकायत वापस लेने के लिए प्रेरित करती है ताकि समझौता हो जाए और अभियुक्त, 'दोष सिद्ध होने की कम संभावना' होने के चलते रिहा कर दिया जाए.
भारत में काम कर रहे कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भी मौत की सज़ा के बारे में यही चिंता ज़ाहिर की है.
पांच साल पहले क़ानून में लाए गए बदलाव के बावजूद कनविक्शन रेट में कोई बदलाव नहीं आया है.

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जस्टिस प्रोजेक्ट से जुड़ी पाकिस्तान की ज़ैनब मलिक कहती हैं, "औरत की शिकायत के बावजूद अक़्सर पुलिस सामूहिक बलात्कार के मामले दर्ज नहीं करती क्योंकि इसका मतलब कई मर्दों को मौत की सज़ा हो सकती है और इससे बचने के लिए वो एक मर्द के ख़िलाफ़ ही केस दर्ज करती है."
भारत की तरह पाकिस्तान ने भी इस चुनौती से निपटने के लिए पुलिस और सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही तय की और शिकायकर्ता की पहचान छिपाने के लिए क़ानून में बदलाव किए.
लेकिन जैसे भारत का अनुभव बताता है, इन अच्छे क़ानूनों को प्रभावी तरीके से लागू नहीं का जा रहा है.
3.न्याय की धीमी रफ़्तार
बांग्लादेश में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आकलन है कि मुकदमों का ख़र्च, लंबी सुनवाई और टू-फिंगर टेस्ट जैसी शारीरिक जांच, अक़्सर औरतों को समझौता करने के लिए मजबूर करते हैं.
भारत में टू-फ़िंगर टेस्ट पर रोक लग चुकी है, लेकिन असंवेदशील तरीक़े से शारीरिक जांच किया जाना आम है और लंबे मुक़दमे अब भी न्याय के रास्ते का रोड़ा है.

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बांग्लादेश में इसके चलते, गांव की अदालतें लोकप्रिय बनी हुई हैं और कोई क़ानूनी हक़ ना होते हुए भी बलात्कार के मामलों की सुनवाई और उनपर फ़ैसले सुना रही हैं.
इन 'शालिश' अदालतों में रूढ़िवादी विचारधारा वाले मर्दों का प्रभुत्व होता है जिससे मुक़दमे पर असर पड़ता है.
बांग्लादेश में मीडिया में रिपोर्ट होनेवाले बलात्कार के मामलों का लेखा-जोखा रखने वाली संस्था, 'अधिकार फ़ाउंडेशन' के आदिलुर रेहमान खान कहते हैं, "भ्रष्टाचार बहुत है इसीलिए मौत की सज़ा का कोई असर नहीं, रसूख़दार लोग न्याय व्यवस्था से बचकर ज़मानत भी पा लेते हैं, रिहा भी हो जाते हैं, उन्हें सज़ा दिलाने में किसी की रुचि नहीं."
इन अनुभवों से साफ़ हो जाता है कि मौत की सज़ा जैसे कड़े प्रावधान लाने से शिकायतकर्ता के न्याय पाने की राह में अड़चनें भी पैदा हो सकती है.
मज़बूत क़ानून अपराध की दर को सिर्फ़ अपने बल पर कम नहीं कर सकते, उनके साथ पुलिस, न्याय व्यवस्था, सरकारी अफ़सरों और समाज के रवैए में बदलाव बहुत ज़रूरी है.
(शोध: शादाब नज़्मी)
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