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नज़रिया: राहुल की 'गांधीगिरी' में कौन सी रणनीति छिपी है?
- Author, राशिद किदवई
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गले लगाकर जो साहस दिखाया है उसमें कुछ फ़िल्मी गांधीगिरी नज़र आती है.
लेकिन इस झप्पी का उन लोगों पर खासा असर होगा, जिनका झुकाव ना तो बीजेपी की तरफ है और ना ही कांग्रेस की तरफ.
लोकसभा में राहुल गांधी ने बीजेपी से कहा, "आपके लिए मैं पप्पू हूं, लेकिन मेरे मन में आपके ख़िलाफ़ जरा सा भी गुस्सा नहीं".
यह कहकर राहुल गांधी ने अपने विरोधियों और दोस्तों के बीच खुद को एक वरिष्ठ और विश्वसनीय नेता के रूप में पेश किया.
अब जबतक राहुल या उनके परिवार के ख़िलाफ़ कोई बड़ा घोटाला सामने नहीं आता, तबतक सरकार राहुल के इस बयान पर पलटवार नहीं कर सकेगी.
राहुल गांधी जो मौका चाहते थे वो उन्हें मिल गया. उनके निशाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे और उनका भाषण बिल्कुल निशाने पर लगा.
राहुल गांधी के पंच
"जुमला स्ट्राइक", "चौकीदार नहीं भागीदार" और "डरो मत" जैसे शब्दों में पंच था और ये पंच लंबे समय यानी आगामी मध्य प्रदेश, राजस्थान, मिज़ोरम और 2019 के आम चुनाव तक लोगों के बीच रहेंगे.
यहां एक सवाल उठाना ज़रूरी है कि क्या विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव को स्वीकार करना या उन्हें सदन की कार्यवाही को बाधित करने देना बहुमत वाली सरकार की समझदारी है?
इसमें कोई शक नहीं है कि 16वीं लोकसभा में बीजेपी-एनडीए के पास अच्छा-खासा बहुमत है. लेकिन उनकी इस लोकसभा की मियाद एक साल से भी कम बची है और 17वीं लोकसभा बनाने की तैयारी अभी से शुरू हो गई है.
बीजेपी के समर्थकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन राहुल गांधी की बातें अनिश्चित मतदाताओं, असंतुष्ट किसानों और उन लाखों लोगों को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं जो आम चुनाव के करीब आने पर किसी को वोट देने का फैसला करते हैं.
सार्वजनिक मंचों पर विदेश नीति और संवेदनशील मसलों को लेकर खुली चर्चा नहीं की जाती. लेकिन कुछ मामलों में ऐसा किया जा सकता है.
1962 में भारत और चीन के बीच हुए युद्ध के दौरान और बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनके रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन को संसद के अंदर और बाहर बहुत कुछ सुनना और सहन करना पड़ा था.
राजनीतिक मर्यादा
अब अगर विपक्ष और सत्ताधारी पार्टी के बीच राजनीतिक मर्यादा की बात की जाए तो दोनों ने ही समय-समय पर अपनी मर्यादा लांघी है.
2013-14 में चुनाव प्रचार के दौरान सबसे पहले नरेंद्र मोदी ने नेहरू-गांधी परिवार पर निशाना साधा. उस वक्त वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे और बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी.
बीजेपी के नेताओं ने राहुल गांधी और सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ काफी तल्ख शब्दों का इस्तेमाल किया, जिसके जवाब में कांग्रेस ने भी शब्दों की लक्ष्मण रेखा लांघी. इसके लिए कांग्रेस ने खास तौर पर सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया.
आने वाले दिनों में दोनों पक्षों की ओर से आरोप-प्रत्यारोप का दौरा जारी रहेगा.
राहुल की रणनीति
राहुल गांधी की रणनीति एकदम साफ है. भले ही बीजेपी 200 लोकसभा सीटें क्यों ना जीत रही हो लेकिन राहुल गांधी की कोशिश होगी कि वो "न्यूट्रल वोटर्स" को बीजेपी की ओर जाने से रोकें.
इसके अलावा 2018 में ही होने वाले मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिज़ोरम विधानसभा चुनावों के नतीजों का भी काफी अहम असर होगा.
अगर कांग्रेस मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ या राजस्थान का चुनाव जीत जाती है, तो जनता और अधिक आत्मविश्वास से भरे और मुखर राहुल गांधी को देखेगी.
संसद में राहुल गांधी के आज के प्रदर्शन को देखकर तो यही लगता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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