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ब्लॉग: होशियार! ज़िल्लेसुबहानी त्रिवेंद्र सिंह रावत पधार रहे हैं
- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, रेडियो संपादक, बीबीसी हिंदी
जिस तरह 'मुग़ले आज़म' फ़िल्म में बादशाह-ए-हिंदुस्तान ज़िल्लेसुबहानी जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर बने पृथ्वीराज कपूर ने भरे दरबार में अनारकली नाम की क़नीज़ को दीवार में ज़िंदा चुनवा देने का हुक्म फ़रमाया था, उत्तराखंड के ज़िल्लेसुबहानी त्रिवेंद्र रावत ने ठीक उसी अंदाज़ में एक अध्यापिका के लिए भरे दरबार में ऐलान किया — सस्पेंड करो इसे, कस्टडी में लो इसको!!
फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि अनारकली को दीवार में चुनवाने का दृश्य सोलहवीं शताब्दी के अकबरी दरबार का था — और उसकी ऐतिहासिकता पर भी शक है — मगर उत्तराखंड के नए 'मुग़ल' त्रिवेंद्र सिंह रावत का हुक्म 21 वीं शताब्दी के दूसरे दशक में हमारी-आपकी आँखों के सामने जारी किया गया. पर अंदाज़ वही मुग़लिया था — अपने अफ़सरों के साथ अलग आसन पर बैठे मुख्यमंत्री और उनसे काफ़ी सुरक्षित फ़ासले पर खड़े किए गए फ़रियादी.
हुक्मरान और फ़रियादी रियाया के बीच का ये फ़ासला किसी सामंत के दरबार जैसा था. दुनिया भर के खुले और लोकतंत्रिक समाजों में जनता और उसके चुने हुए जन प्रतिनिधियों के बीच की नज़दीकी और खुलापन वहाँ नहीं था. वहाँ हॉल में एक ओर फ़रियादी थे तो दूसरे कोने में उनका भाग्यविधाता. उन्हीं फ़रियादियों में उत्तरा पंत बहुगुणा भी खड़ी थीं.
टीचर की गुहार
वो एक विधवा अध्यापिका हैं जो पिछले 25 बरस से उत्तराखंड के दुर्गम ज़िले उत्तरकाशी के एक प्राइमरी स्कूल में पढ़ाती हैं. उनका कहना है कि पिछले 25 साल से किसी ने उनकी सुध नहीं ली और न ही उनका तबादला सुगम क्षेत्र में किया गया. उन्होंने भी कभी एतराज़ नहीं किया क्योंकि उनके पति जीवित थे और बच्चों की देखभाल अच्छी तरह से हो जाती थी.
पिछले साल उत्तरा पंत के पति की मृत्यु हो गई और उनके सामने अपने बच्चों की परवरिश और पढ़ाई लिखाई की चुनौती पैदा हो गई. राज्य के हज़ारों सरकारी कर्मचारियों की तरह उत्तरा को त्रिवेंद्र रावत की सरकार से उम्मीद थी कि अब तो उनकी सुनवाई होगी और उनका तबादला देहरादून कर दिया जाएगा जहाँ वो अपने बच्चों के साथ रह कर उनकी परवरिश कर सकें. जब ऐसा नहीं हुआ तो वो विद्रोह पर उतारू हो गईं और पिछले लगभग एक साल से काम पर भी नहीं गई हैं.
जैसे जनता दरबार भारतीय गणतंत्र के मंत्री और मुख्यमंत्री लगाते हैं वैसे ही सुलतान और मुग़ल बादशाह भी अपनी प्रजा को दरबार में आकर बादशाह के सामने अपनी फ़रियाद रखने की छूट देते थे. लेकिन तब प्रजा को भी मालूम होता था और दरबारियों को भी कि अगर कोई बात बादशाह को खटक गई तो सीधे तोप से उड़ाने या हाथी के पैर तले कुचलवाने का हुक्म दे दिया जाएगा और फिर सिर्फ़ अल्लाह मियाँ के यहाँ ही फ़रियाद की जा सकती थी.
इसीलिए बादशाह के लाख भरोसा देने के बावजूद फ़रियादी ज़रूर कहता था — ज़िल्लेसुबहानी, जान की अमान पाऊँ तो फ़रियाद करूँ…
लगता है उत्तरा पंत बहुगुणा तबादले की फ़रियाद करने से पहले यही कहना भूल गईं कि - 'ज़िल्लेसुबहानी, जान की अमान पाऊँ तो अर्ज़ करूँ.' वो ग़लतफ़हमी में थीं कि वो सत्तर साल पुराने गणतंत्र की आज़ाद नागरिक है जो वोट देकर अपने रहनुमा चुनती है, उसे किसी मुख्यमंत्री का क्या डर! उन्हें अंदाज़ा नहीं रहा होगा कि कल तक चना-भूँजा खाकर संघ का प्रचार करने वाले त्रिवेंद्र जी के चोले में मुख्यमंत्री बनते ही मुग़ल बादशाहों का साया समा गया है. और किसकी हिम्मत है जो बादशाह के सामने बिना सिर झुकाए फ़रियाद करने की जुर्रत करे.
वीडियो देखिए - अपने अफ़सरों से घिरे बैठे मुग़ल-ए-आज़म रावत की आवाज़ पूरे हॉल में गूँजती है - "बोलिए मत सस्पेंड कर दूँगा अभी यहीं पर… सस्पेंड कर दूँगा अभी बता दिया मैंने तुम्हे. और फिर उनकी आवाज़ ऊँची होती चली जाती है — इसको सस्पेंड कर दीजिए, इसको सस्पेंड करो आज ही. ले जाओ इसको बाहर, बंद करो इसको. कस्टडी में लो इसको."
क्या 25 बरस से एक दुर्गम क्षेत्र में काम कर रहे सरकारी कर्मचारी की ओर से सुगम क्षेत्र में तबादले की माँग करना इतना बड़ा अपराध था कि मुख्यमंत्री को उस महिला की बात सुने बग़ैर उसकी गिरफ़्तारी का आदेश देना पड़ा? पत्रकारिता में जिन लोगों ने कुछ साल भी गुज़ार लिए हैं उनको मालूम होता है कि ट्रांसफ़र-पोस्टिंग के ज़रिए लोग कितना पैसा कमाते हैं. आपको अपने आसपास ही ऐसे कई नमक के दारोग़ा मिल जाएँगे जिनके लिए ट्रांसफ़र-पोस्टिंग ऊपरी कमाई का आसान ज़रिया है.
अगर उत्तरा पंत बहुगुणा ऐसे किसी नमक के दारोग़ा को जानती होतीं तो त्रिवेंद्र-दरबार में जाने की उन्हें शायद ज़रूरत ही नहीं पड़ती. पर उस दरबार में वो चारों ओर से कड़क वर्दीधारी पुलिस वालों से घिरी थीं और सामने बैठे मुख्यमंत्री असीम क्रोध में उबल रहे थे और उत्तरा की मुअत्तली और गिरफ़्तारी के मौखिक आदेश जारी कर रहे थे. ऐसे में अच्छा ख़ासा आदमी हाथ जोड़कर घुटने टेकने को तैयार हो जाए, लेकिन इस स्कूल अध्यापिका ने बिना दबाव में आए, पुलिस वालों का हाथ झटककर मुख्यमंत्री को जवाब दिया कि 'तुम क्या सस्पेंड करोगे मैं ख़ुद को सस्पेंड कर रही हूँ.'
बाहर जाते जाते उसकी आवाज़ फिर सुनाई पड़ती है - चोर, उचक्के कहीं के…
ये स्पष्ट नहीं होता कि "अदना सी" स्कूल अध्यापिका ने ये शब्द मुख्यमंत्री के लिए कहे या फिर उन तमाम नेताओं, अफ़सरों, बाबुओं, शराब के ठेकेदारों और उन मर्दवादी परंपराओं के लिए जो पिछले 25 बरस से एक दुर्गम स्थान में नौकरी कर रही औरत के दुर्भाग्य के ज़िम्मेदार हैं.
कौन है ज़िम्मेदार
त्रिवेंद्र सिंह रावत को दो मिनट के लिए दिमाग़ से निकाल दें. एक दूसरे रावत को याद करें जो त्रिवेंद्र से पहले उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे - हरीश रावत. आउटलुक पत्रिका के मुताबिक़ वो बड़े दुखी हैं कि "पूरी व्यवस्था इतनी असंवेदनशील हो गई है कि एक विधवा अध्यापिका 25 बरसों से दुर्गम इलाक़े में नौकरी कर रही है पर किसी ने उसकी फ़रियाद नहीं सुनी."
हरीश रावत को ब्राह्मी नामक आयुर्वेदिक बूटी का सेवन करना चाहिए ताकि उनकी स्मरणशक्ति समय से पहले जवाब न दे दे. त्रिवेंद्र रावत से पहले वो ख़ुद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री थे और तब भी उत्तरा पंत दुर्गम उत्तरकाशी में ख़ामोशी से नौकरी कर रही थीं. उत्तराओं की न तब कोई सुनता था और न अब. हरीश रावत जब मुख्यमंत्री थे तब ख़ुद उनपर असंवेदनशीन होने के आरोप लगे थे. इंटरनेट पर खोजेंगे तो आपको वो तस्वीरें आसानी से मिल जाएँगी जिसमें एक रोती हुई महिला मुख्यमंत्री हरीश रावत के पैर पकड़कर गिड़गिड़ा रही है और मुख्यमंत्री लगातार खिल्ली उड़ाने वाले अंदाज़ में हँसते चले जा रहे हैं.
त्रिवेंद्र रावत की जगह नारायण दत्त तिवारी होते तो क्या करते? उत्तराखंड से ही भारतीय जनता पार्टी के एक कुशल वक्ता और नेता से बातचीत के दौरान हमने ये सवाल उठाया तो इस बात पर लगभग सबकी सहमति थी कि वो वैसा नहीं करते जैसा त्रिवेंद्र रावत ने किया. जो नारायण दत्त तिवारी और उनके मिज़ाज को जानते हैं वो आपके सामने काल्पनिक ही सही पर पूरी तस्वीर बयाँ कर सकते हैं:
महिला की आवाज़ के ग़ुस्से और शिकायत के तीखेपन को भाँपकर नारायण दत्त तिवारी तुरंत अपने आसपास के अधिकारियों से कहते - 'उत्तरा जी इतने समय से शिकायत कर रही हैं. इनको अलग से समय देकर इनकी समस्या एक हफ़्ते के भीतर सुलझाइए और मुझे बताइए.'
फिर वो उत्तरा पंत से मुख़ातिब होकर उनके पति या पिता से अपनी पुरानी जान पहचान का ज़िक्र करते, दोनों हाथ जोड़कर विनम्रता से उनसे कभी भी आकर मिलने का आग्रह करते. वहाँ मौजूद मीडिया जन नेता और विकास पुरुष की सहृदयता की कहानियाँ छापता और ये जानने की फ़ुरसत फिर किसी को न मिलती कि फ़रियादी की फ़रियाद पूरी हुई भी या नहीं.
पर त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उत्तराखंड के बुज़ुर्ग और अनुभवी नेता नारायण दत्त तिवारी से कुछ नहीं सीखा. उन्हें भरे दरबार में एक प्राइमरी टीचर, वो भी महिला, का इस तरह ज़बान लड़ाना गवारा नहीं हुआ. अपने दायरे से बाहर जाकर राज्य के मुखिया से सवाल करने वाली इस ज़बानदराज़ और मुँहज़ोर महिला से वो कैसे नरमी से पेश आते?
यहाँ ये याद दिलाया जाना ज़रूरी है कि एक मजबूर विधवा को सरेआम गिरफ़्तार करवाने वाले त्रिवेंद्र सिंह रावत ने समाज और राजनीति के संस्कार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में रह कर सीखे. संस्कार एक ऐसा शब्द है जो संघ की प्रचार सामग्री और प्रचार तंत्र में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. यहाँ तक कि संघ ने संस्कार भारती नाम का एक पूरा आनुषांगिक संगठन ही खोल रखा है. मगर संघ के उन संस्कारों से ओतप्रोत स्वयंसेवक जब सत्तारूढ़ होता है तो मुग़ल-ए-आज़म फ़िल्म में दिखाए गए जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर की पैरोडी क्यों बन जाता है?