इन मुख्यमंत्रियों से क्यों नहीं मिल रहे हैं पीएम मोदी?

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
दक्षिण भारत के एक राज्य के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के साथ मुलाक़ात का चार बार समय मांगा लेकिन नहीं मिला. एक केंद्र शासित प्रदेश के मुख्यमंत्री मौखिक और लिखित गुज़ारिश करने के बाद दो महीने से प्रधानमंत्री के साथ मुलाक़ात का इंतज़ार कर रहे हैं.
दोनों ही मुख्यमंत्री अपने प्रांत के लोगों के कल्याण से जुड़े मुद्दों पर प्रधानमंत्री के साथ चर्चा करना चाहते हैं. वहीं केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के साथ प्रधानमंत्री से मिलकर खाद्यान आपूर्ति पर चर्चा करना चाहते हैं.
पुद्दुचेरी के मुख्यमंत्री वी नारायणसामी प्रदेश के केंद्र शासित प्रदेश होने की वजह से आर्थिक मदद हासिल करने में हो रही दिक़्क़तों पर प्रधानमंत्री से बात करना चाहते हैं.
नारायणसामी ने बीबीसी से कहा, "मैंने प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क किया, मुख्यमंत्री के सम्मेलन में भी प्रधानमंत्री के साथ बैठक की मांग की, दो महीने पहले मैंने प्रधानमंत्री को संबोधित करते हुए पत्र भी लिखा लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है."
ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ केरल और पुद्दुचेरी को ही प्रधानमंत्री या प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क करने में समस्या आ रही है. भले ही ये बात अजीब लगे लेकिन केंद्रीय सरकार और दक्षिण भारत के अधिकतर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के संबंधों में तनाव महसूस किया जा रहा है.
क्या कोई तनाव है?
विशेष आर्थिक पैकेज न मिलने की वजह से आंध्र प्रदेश में सत्ताधारी तेलगुदेशम पार्टी ने भाजपा के गठबंधन से अपने आप को अलग कर लिया है. कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारास्वामी को प्रधानमंत्री से मिलने का मौका तो मिला लेकिन राज्य के प्रति केंद्र के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है.

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कावेरी जल प्रबंधन बोर्ड की स्थापना का अध्यादेश कुमारास्वामी और मोदी की मुलाक़ात के अगले दिन ही जारी हो गया था. बोर्ड के तमिलनाडु, केरल और पुद्दीचेरी के लिए पानी की मात्रा तय कर देने के बाद भी केंद्र सरकार ये तय करेगी की कर्नाटक के किसानों के लिए कितना पानी छोड़ा जाए.
तमिलनाडु में, जहां बीजेपी के साथ मधुर संबंधों वाली एआईएडीएमके की सरकार है, राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित ने डीएमके के नेता एमके स्टालिन पर भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत मुक़दमा दर्ज कराने की चेतावनी दी. विपक्ष के नेता स्टालिन राज भवन जा रहे रास्तों को रोक रहे थे.
'मोदी को परवाह नहीं'
दरअसल राज्यपाल ज़िले के अधिकारियों के माध्यम से प्रदेश में हो रहे कार्यों की समीक्षा कर रहे थे. डीएमके इसका ये कहकर विरोध कर रही थी कि चुनी हुई सरकार है तो फिर इसकी ज़रूरत क्या है. पुद्दुचेरी की लेफ़्टीनेंट गवर्नर और पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी पर भी चुनी हुई सरकार के कामकाज में दख़ल देने के आरोप लगे हैं.
केरल की वामपंथी सरकार में वित्त मंत्री डॉ. थॉमस इसाक ने बीबीसी से कहा, "मुझे लगता है कि इस समय प्रधानमंत्री और दिल्ली की सरकार संघीय ढांचे की परवाह नहीं करते हैं. उन्हें लगता है कि केंद्र ही सबकुछ तय करता है."
नोटबंदी के बाद जब को-आपरेटिव क्षेत्र की बैंकों के प्रतिबंधित नोटों को बदलने पर रोक लगी तो पिनाराई विजयन ने पहली बार प्रधानमंत्री से मिलने का समय मांगा था.

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डॉ. इसाक कहते हैं, "बाद में हमें पता चला कि अन्य को-आपरेटिव बैंकों पर प्रतिबंध लगने से पहले अमित शाह के नियंत्रण वाली को-आपरेटिव बैंकों को कई तरह की रियायतें दी गईं थीं. केरल में को-आपरेटिव बैंकें तीस प्रतिशत तक क़र्ज़ देती हैं और लोगों को उनका ही पैसा नहीं निकालने दिया गया था."
डॉ. इसाक कहते हैं, "उसके बाद हमने केरल में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान केंद्र स्थापित करने के लिए चर्चा करनी चाही क्योंकि केरल में सबसे अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं हैं. लेकिन हमारी ये मांग भी ठुकरा दी गई. केरल एकमात्र ऐसा प्रांत है जहां 1960 से खाद्यानों की वैधानिक राशनिंग हैं. लेकिन खाद्य सुरक्षा क़ानून की वजह से हमारे कुछ मुद्दे थे और हम केरल के लिए अधिक आवंटन चाहते थे."
"हम चर्चा करना चाहते थे. केंद्र की राय अलग हो सकती थी. हम प्रधानमंत्री से इस मुद्दे पर बात करना चाहते हैं लेकिन प्रधानमंत्री बात करने को तैयार ही नहीं हो रहे हैं."
बीजेपी की बढ़ती ताक़त का असर
लेकिन केरल विधानसभा में बीजेपी के एकमात्र सदस्य ओ राजागोपाल को नहीं लगता कि मुख्यमंत्री पी विजयन और प्रधानमंत्री मोदी के बीच कोई समस्या है.
वो कहते हैं, "बात ये है कि मुख्यमंत्री राज्य में बीजेपी की बढ़त से ख़ुश नहीं है. उन्हें लगता है कि वो केंद्र सरकार को धमका कर काम करा सकते हैं. वो प्रधानमंत्री से मिलने गए ही नहीं हैं. वो दिल्ली में अपनी पोलित ब्यूरो की बैठक में शामिल होने गए थे. प्रधानमंत्री कार्यालय जानना चाहता था कि मुख्यमंत्री किस मुद्दे पर बात करना चाह रहे हैं. इसलिए प्रधानमंत्री कार्यालय से उन्हें खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्रायल भेज दिया गया. इसमें ग़लत क्या है?"

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राजनीतिक विश्लेषक एमजी राधाकृष्णनन कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि प्रधानमंत्री और विजयन के बीच कोई व्यक्तिगत दुश्मनी है जैसी की आप ममता बनर्जी या केजरीवाल के साथ उनके रिश्तों में देखते हैं. शुरुआती दिनों में प्रधानमंत्री एक स्टेट्समैन के तौर पर आए लेकिन अब केरल और उसके विकास में उनकी कोई रूचि नहीं है. बीजेपी की स्थिति इस मामले में उत्साहवर्धक नहीं है. बीजेपी की हालत राज्य में ख़राब है. अमित शाह भी कई बार यहां आए लेकिन पार्टी को पुनर्जीवित नहीं कर सके."
राधाकृष्णनन कहते हैं, "पहले किसी भी मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री से मिलने में कोई दिक्कत नहीं होती थी. लेकिन यहां तो चार बार उन्हें मिलने नहीं दिया गया. इस क्षेत्र में बीजेपी के पास गंवाने के लिए बहुत कुछ नहीं है और यही वजह है कि उसकी दिलचस्पी यहां कम है."
संविधान का सवाल
सीपीएम के अख़बार देशाभिमानी के संपादक और पूर्व सांसद राजीप पी कहते हैं, "ये संविधान के मूल ढांचे के ख़िलाफ़ जाकर केरल के साथ किया गया सौतेला व्यवहार है."
वहीं अपना नाम न छापने की शर्त पर बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, "ये ऐसा मुद्दा नहीं है जिस पर हम टिप्पणी या प्रतिक्रिया दें."
वहीं डीएमके के प्रवक्ता और विधायक मनुराज शनमुगम ने कहा, "केंद्र सरकार अलग-अलग तरीक़ों से ग़ैर बीजेपी सरकार वाले राज्य को निशाना बना रही है. ये देश के संघीय ढांचे को नुक़सान पहुंचा रहा है. हम राज्यपाल से शिष्टाचार बनाए रखने का आग्रह कर रहे हैं लेकिन इसकी भी एक लक्ष्मण रेखा है."

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लेकिन शनमुगम का ये भी कहना है कि राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित की समस्या सिर्फ़ तमिलनाडु तक सीमित नहीं है. वो कहते हैं, "कुछ समय पहले केरल के राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को बुलाकर स्पष्टीकरण मांगा. पुद्दुचेरी की राज्यपाल का हमेशा ही मुख्यमंत्री से विवाद रहता है. कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला ने बीजेपी को सरकार बनाने का न्यौता दिया जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी ग़लत ठहराया."
बिहार और अरुणाचल प्रदेश का उदाहरण देते हुए शनमुगम कहते हैं कि राज्यपाल केंद्र सरकार के एजेंट बनते जा रहे हैं. वो कहते हैं कि चिंता की बात ये है कि राज्यपाल सिर्फ़ केंद्र सरकार ही नहीं बल्कि एक राजनीतिक दल के एजेंट की तरह काम कर रहे हैं.
वो कहते हैं, यहां स्पष्ट रूप से एक पैटर्न दिखाई दे रहा है और हम किसी भी हद तक जाकर ये बताएंगे कि ये असंवैधानिक है.
वहीं डॉ. इसाक कहते हैं, "हम जल्द ही राज्यों के अधिकारों के मामलों पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाएंगे. ये सब 2019 लोकसभा चुनावों में सामंजस्य स्थापित करने के लिए किया जा रहा है."
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