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मोदी, ट्रंप और ईरान के तेल का खेल
- Author, दिनेश उप्रेती
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ईरान के साथ परमाणु करार तोड़ने के बाद ये भी सुनिश्चित करने में लगे हैं कि तेल के कुओं से संपन्न इस देश की आर्थिक तौर पर कमर तोड़ दी जाए.
जुलाई, 2015 में ईरान और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँच स्थाई सदस्यों के बीच परमाणु समझौता हुआ था. अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने समझौते के तहत ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने के बदले में प्रतिबंधों से राहत दी थी. लेकिन मई, 2018 में ईरान पर ज़्यादा दबाव बनाने के लिए अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ये समझौता तोड़ दिया.
ट्रंप ने ईरान में कारोबार कर रही विदेशी कंपनियों को निवेश बंद करने के लिए कहा है. अमरीका प्रतिबंधों का पालन नहीं करने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माने की भी धमकी दे रहा है.
ईरान के साथ परमाणु करार करने वालों में शामिल यूरोपीय नेताओं ने ट्रंप को इस मुद्दे पर समझाने की भी कोशिशें की, लेकिन ट्रंप ने अपने चुनावी वादे को पूरा किया और ईरान के साथ ओबामा प्रशासन का किया करार ख़त्म करने का ऐलान कर दिया.
अब चूंकि अमरीका के सहयोगी देश इस मुद्दे पर उसके साथ नहीं है, लिहाजा ट्रंप अब ईरान को माली नुकसान पहुंचाने के लिए हर संभव दांव आजमाना चाहते हैं.
ट्रंप का फ़रमान
ट्रंप प्रशासन ने नया फ़रमान जारी कर कहा है कि भारत, चीन और पाकिस्तान समेत एशिया के देश ईरान से तेल आयात बंद कर दें.
यही नहीं, अमरीका ने इसके लिए चार नवंबर की डेडलाइन भी तय कर दी है और कहा है कि इस तारीख़ के बाद ईरान से तेल मंगाने वाले देशों के ख़िलाफ़ आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाएंगे और इन देशों के ख़िलाफ़ रत्तीभर भी नरमी नहीं बरती जाएगी.
भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक इराक़ और सऊदी अरब के बाद भारत को तेल सप्लाई करने के मामले में ईरान का नंबर आता है. भारत और चीन पर अमरीका के कड़े रवैये की एक वजह ये भी है कि ईरान सबसे अधिक तेल निर्यात चीन को करता है और फिर दूसरे नंबर पर भारत है.
भारत के कुल तेल आयात में ईरान का हिस्सा तकरीबन 10.4 प्रतिशत है. वित्त वर्ष 2017-18 के पहले 10 महीनों में यानी अप्रैल 2017 से जनवरी 2018 के बीच भारत ने ईरान से 18.4 मिलियन टन कच्चा तेल ख़रीदा. इस आंकड़े से ज़ाहिर है कि अपनी ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भारत के लिए ईरान कितना अहम रहा है. यही नहीं तेल आयात के लिए ईरान ने भारत के लिए शर्तों में कुछ रियायतें भी दी हैं.
तेल पर सियासत
अमरीका के इस फ़रमान को सियासी पार्टियों ने भी तुरंत लपक लिया. कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से सवाल किया कि क्या वो अमरीका की इस बात को बात मानेंगे और इसका पेट्रोल की कीमतों और देशहित पर क्या असर पड़ेगा?
कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ट्वीट किया, "ईरान, भारत को कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा निर्यातक देश है. प्रधानमंत्री और पेट्रोलियम मंत्री देश को बताएं कि क्या वे ईरान से तेल आयात नहीं करने की अमरीका की बात मानेंगे और पेट्रोल की कीमतों पर राष्ट्रीय हितों पर इसका क्या असर होने वाला है?"
लेकिन जानकारों के मुताबिक भारत जिस तरह से अमरीकी वित्तीय व्यवस्था पर आश्रित है और उसके हित अमरीकी अर्थव्यवस्था से जुड़े हैं, उनका बचाव करने के लिए मोदी सरकार को कार्रवाई करनी ही होगी.
भारत ने ट्रंप प्रशासन के इस फ़ैसले पर कहा कि वह अमरीका के 'एकतरफ़ा प्रतिबंधों' को नहीं मानता और अंतरराष्ट्रीय मसलों पर सिर्फ़ संयुक्त राष्ट्र के निर्देशों के हिसाब से ही चलता है.
तो क्या अमरीकी चेतावनी पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया कूटनीतिक बयानबाज़ी है या वाकई में भारत इसकी अनदेखी कर सकता है?
मोदी सरकार की मुश्किलें
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने पेट्रोलियम मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से कहा है कि मंत्रालय के अधिकारियों ने गुरुवार को रिफाइनरियों के साथ बैठक की और उन्हें ईरान के तेल के विकल्प तलाशने को कहा.
रिफ़ाइनरियों से कहा गया है कि वे बदले हालात के लिए तैयार रहें. रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से कहा, "रिफाइनरियों से मुश्किल हालात के लिए तैयार रहने के लिए कहा गया है. हो सकता है कि ईरान से तेल इंपोर्ट में भारी कटौती हो या फिर इंपोर्ट बिल्कुल ही बंद कर दिया जाए."
ईरान से तेल आयात पर अमरीकी सख़्ती से निपटने के लिए भारत नए विकल्पों की तलाश में है. भारत सरकार ने हाल ही में संकेत दिए हैं है कि वह चीन, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ मिलकर नया संगठन बना सकते हैं ताकि ख़रीदारों का एक ऐसा समूह तैयार कर सकें जो अमरीका ही नहीं, तेल निर्यातक देशों के सामने मजबूती से खड़ा हो सके.
जापान और दक्षिण कोरिया भी ईरान के तेल आयातकों में बड़े हिस्सेदार हैं. ईरान जिन देशों को सबसे ज़्यादा तेल सप्लाई करता है उनमें जापान चौथे और दक्षिण कोरिया पाँचवें स्थान पर है.
क्या हैं विकल्प?
अर्थशास्त्री सुनील सिन्हा कहते हैं, "मुश्किल ये है कि अमरीका के साथ भारत अपने कारोबारी रिश्तों को खराब नहीं करना चाहेगा. अमरीका के साथ भारत का ट्रेड सरप्लस 2800 करोड़ डॉलर है. यानी इंपोर्ट से कहीं ज़्यादा भारत, अमरीका को एक्सपोर्ट करता है."
सुनील सिन्हा का मानना है कि केंद्र की मोदी सरकार के पास विकल्प तो हैं, लेकिन ये बेहद सीमित हैं. उसके पास रूस, सऊदी अरब और दूसरे खाड़ी देशों से तेल आयात बढ़ाने का विकल्प है, लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि ईरान भारत का बहुत पुराना पार्टनर है और उसने भारत को कई रियायतें भी दी हुई हैं.
दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में अनिश्चितिता से भारत के सामने चुनौतियां पहले से ही मुंह बाये खड़ी हैं.
तेल का खेल दुनिया में किस तरह दोस्त और दुश्मन बदलता रहता है इसका उदाहरण सऊदी अरब और रूस का गठजोड़ है.
सीरिया में जहाँ ईरान और रूस आमने-सामने हैं, लेकिन जब तेल की बात आती है तो सऊदी अरब, रूस के साथ खड़ा नज़र आता है. उनके साथ आने की वजह ये भी है वेनेज़ुएला, लीबिया और अंगोला में भी राजनीतिक अस्थिरता है और वहाँ तेल उत्पादन में भारी कमी आई है.
पिछले हफ्ते वियना में हुई तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक की बैठक में भी ये बात साफ़ हो गई कि रूस और सऊदी अरब तेल उत्पादन पर ओपेक की राह पर नहीं चलेंगे.
रूस और सऊदी साथ
रूस ने कहा है कि वह जुलाई से कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ाकर 15 लाख बैरल प्रतिदिन कर देगा. रूस और सऊदी अरब को पता है कि ईरान से तेल इंपोर्ट कम या बंद होने की स्थिति में भारत और चीन को तेल बेचने के उसके पास अच्छे मौके होंगे.
रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन पर घरेलू कंपनियां तेल उत्पादन बढ़ाने के लिए दबाव बना रही हैं. पुतिन इस मांग को ख़ारिज करने की स्थिति में इसलिए भी नहीं हैं कि रूस में पेट्रोल, डीज़ल की कीमतें बढ़ रही हैं और जैसे-जैसे ये कीमतें बढ़ेंगी, पुतिन की लोकप्रियता में कमी आने का ख़तरा उतना ही अधिक होगा.
मौजूदा हालात में तेल कीमतों पर जो गुणा-भाग चल रहा है, उसमें नुक़सान में भारत सरकार का खजाना ही नज़र आता है. पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल यानी पीपीएसी के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2016-17 में भारत ने कच्चा तेल औसतन 47.56 डॉलर प्रति बैरल के भाव पर ख़रीदा, जबकि 2017-18 में ये औसत भाव बढ़कर 56.43 डॉलर प्रति बैरल हो गया.
लेकिन हालात बदल चुके हैं और ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक मई 2018 में भारत ने 75.31 डॉलर प्रति बैरल के भाव से कच्चा तेल आयात किया.
ऐसे में मोदी सरकार से ईरान के तेल का विकल्प खोजना तो मुश्किल है ही, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से वित्तीय घाटे में बढ़ोतरी को संभालना भी किसी चुनौती से कम नहीं है.
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