वरिष्ठ भाजपा नेता ने आपातकाल जैसे हालात बताकर दिया इस्तीफ़ा

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- Author, नारायण बारेठ
- पदनाम, जयपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए
राजस्थान में विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी सत्तारूढ़ भाजपा को अपने वरिष्ठ नेता घनश्याम तिवारी के इस्तीफे से झटका लगा है.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सरपरस्ती में पोषित और पल्लवित तिवारी ने ये कहते हुए भाजपा से अपना वर्षों पुराना नाता तोड़ लिया कि देश और प्रदेश अघोषित आपातकाल में जी रहा है.
सत्तारूढ़ भाजपा ने तिवारी के इस्तीफ़े की ये कहकर महत्ता कम करने की कोशिश की है कि इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा.
राज्य में छह बार विधायक और दो बार मंत्री रहे तिवारी ने राजस्थान में भाजपा के पितृ पुरुष रहे भैरोंसिंह शेखावत के सानिध्य में सियासत की सीढ़ियां चढ़ीं और फिर सत्तारूढ़ भाजपा में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के मुखर विरोधी होकर उभरे.
देश में आपातकाल लगा तो तिवारी ये नारा बुलंद करते रहे- 'संघ पर प्रतिबंध लगाया है, सोता शेर जगाया है.'
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'भारत में हालात आपातकाल से कम नहीं'
वह इमरजेंसी में जेल में रहे लेकिन अब संघ के ये स्वंयसेवक ये कहकर भाजपा से अलग हो गए कि भारत में हालात आपातकाल से कम नहीं हैं.
वह कहते हैं, "आपातकाल घोषित था, अब एक अघोषित इमर्जेंसी है. मीडिया की ज़बान बंद है और न्यायपालिका पर भी दबाव है."
कभी पूर्व मंत्री तिवारी ने भाजपा का ब्राह्मण चेहरा बनने की कोशिश की और सवर्ण वर्ग के ग़रीब समुदाय के लिए आरक्षण की पैरवी की. अब वे भारत वाहिनी पार्टी नाम से नया दल बनाकर सत्तारूढ़ बीजेपी और विपक्षी कांग्रेस को चुनौती दे रहे हैं.
इस लंबे सियासी सफर में उनके सहयात्री रहे गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया ने मीडिया से कहा, "तिवारी के जाने से पार्टी में कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा."
बीजेपी सरकार में मंत्री अनीता भदेल ने कहा, "तिवारी एहसान फ़रामोश हैं."
लेकिन तिवारी कहते हैं, "मुख्य मंत्री राजे के सम्मुख बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने घुटने टेक दिए. राजस्थान को बहुत लूटा गया है और विपक्ष की भूमिका में कांग्रेस विफल साबित हुई है. ऐसे में मैं राज्य के सामने एक सार्थक विकल्प लेकर आया हूं."

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भाजपा से अलग होने पर दुख भी जताया
राजस्थान में भाजपा सरकार गठित होने के साथ ही तिवारी की गिनती उन गिने-चुने नेताओं में होने लगी जो मुख्यमंत्री राजे के विरुद्ध मोर्चा खोले हुए मिले.
हाल में जब अदालत ने पूर्व मुख्यमंत्रियों से बंगले खाली कराने का आदेश जारी किया तो तिवारी ने इसे मुद्दा बनाया और मुख्यमंत्री राजे को निशाने पर लिया. उनका कहना था कि राजे को मुख्यमंत्री के लिए नामित आवास में जाना चाहिए.
तिवारी से पूछा गया कि वे बीजेपी हाई कमांड से क्यों बात नहीं करते?
इसपर वे कहने लगे, "हाई कमांड ने सुना और माना कि राजस्थान में भारी भ्रष्टाचार है, मगर आखिर में पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व राजस्थान के मामले में निर्बल और बेबस साबित हुआ."
तिवारी कहते हैं कि उनकी नई पार्टी राज्य के सभी 200 विधान सभा क्षेत्रों में चुनाव लड़ेगी.
राज्य की राजनीति के जानकार एक प्रेक्षक कहते हैं, "तिवारी की ये पहल ब्राह्मण वोटों पर असर डाल सकती है. यह कांग्रेस के लिए भी नुकसान कर सकता है और भाजपा के लिए भी. लेकिन इतना तय है कि इससे भाजपा की फ़िज़ा खराब हुई है."
भाजपा से वर्षों पुराना नाता तोड़ते हुए तिवारी ने पार्टी प्रमुख अमित शाह को एक भावपूर्ण चिट्ठी लिखी और कहा, "छह-सात साल की उम्र में मैं संघ से जुड़ा और फिर तृतीय वर्ष तक दीक्षित हुआ. मैं विद्यार्थी परिषद से लेकर अनेक अनुसांगिक संगठनों के साथ रहा. इतना लंबा वक्त साथ गुज़ारने के बाद अब अलग होने का मुझे गहरा दुख है."

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तिवारी ने अपने इस्तीफ़े के लिए सांकेतिक रूप से 25 जून का दिन चुना. कहा इसी दिन 1975 में देश में आपातकाल लगा था. तिवारी कहते है हालात अब फिर वैसे ही हो गए है.
तिवारी कहते हैं, "पहले केंद्रीय नेतृत्व के एक हिस्से ने राजस्थान में हो रहे भ्रष्टाचार से समझौता किया और अब पार्टी हाई कमांड ने घुटने टेक दिए हैं."
सियासी प्रेक्षक कहते हैं, "यह हैरानी की बात है कि तिवारी लंबे समय से राज्य की भाजपा सरकार के खिलाफ मुखर रहे हैं, मगर पार्टी ने उन्हें बाहर का रास्ता नहीं दिखाया. इसकी बजाय पार्टी ने तिवारी को ख़ुद इस्तीफ़ा देने का मौका दिया."
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