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नज़रिया: 'कश्मीर को चुनावी चालबाज़ियों की वस्तु बनाने की कोशिश'
- Author, अनुराधा भसीन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
जम्मू-कश्मीर में भाजपा और पीडीपी का अचानक हुआ अलगाव न सिर्फ़ हैरान करने वाला है बल्कि इसमें अपशकुन के संकेत भी छिपे हैं.
गठबंधन से अलग होने का फैसला भाजपा ने लिया, वह भी कश्मीर में महीने भर चला सीज़फायर ख़त्म करने की घोषणा के ठीक बाद. इससे ऐसा लगता है कि भाजपा इसकी योजना पहले से बना रही थी.
यह गठबंधन तोड़ना उतना ही नामसझी भरा है, जितना तीन साल पहले इसे बनाना था. अलग विचारधाराओं वाली बीजेपी और पीडीपी का साथ आना एक विषम गठबंधन था.
2014 में भाजपा से गठबंधन करते वक़्त पीडीपी के संस्थापक और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने इसे उत्तर और दक्षिण ध्रुव का मिलन बताया था. गठबंधन का मकसद दो अलग विचारधाराओं और आकांक्षाओं को समायोजित करना था.
कभी एकमत न हो सके दोनों दल
लेकिन जैसा प्रकृति का नियम कहता है, उत्तर और दक्षिण ध्रुव का मिलन असाध्य था. पहले साझा एजेंडा की बात कही गई थी, लेकिन दोनों घटक दल काम करने का कोई साझा धरातल नहीं खोज सके.
यह सरकार साझे एजेंडा से संचालित होनी थी, लेकिन वह दीवार पर फ्रेम में टंगा एक दस्तावेज़ बनकर रह गया.
सरकार के तीन सालों में दोनों पार्टियां कई विवादित और अहम मुद्दों पर बंटी हुई नज़र आईं. मामला अनुच्छेद 370 और 35A का हो या जीएसटी और विकास के मुद्दे, भाजपा और पीडीपी कभी एकमत नहीं हो सके.
यह गठबंधन शुरू से ही एक ढकोसला था, लेकिन सत्ता और उसके लाभ के लिए अब तक ज़िंदा रहा.
भाजपा का यह तर्क अजीब है कि उसने गठबंधन तोड़ते हुए उसने सीज़फायर की मियाद बढ़ाने पर मतभेद का हवाला दिया. ईद के बाद केंद्र की भाजपा सरकार ने सीज़फायर ख़त्म करने का ऐलान किया था, जिसका पीडीपी ने विरोध किया. लेकिन सीज़फायर पर कोई फैसला लेने का हक़ पीडीपी के पास नहीं था. ऐसे में सीज़फायर के मुद्दे पर गठबंधन तोड़ने का तर्क बेदम लगता है.
2019 चुनाव का पैंतरा
भाजपा गठबंधन तोड़ने वाली है, पीडीपी को इसकी बिल्कुल भनक नहीं लगी. वहीं भाजपा की प्रदेश इकाई के लिए भी कुछ हद तक यह फैसला चौंकाने वाला था.
कश्मीर के बिगड़ते सुरक्षा हालात, मुख्यधारा के दलों और कश्मीरियों बीच बढ़ती दूरी और राज्य में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ने का एक अहम कारण यह गठबंधन भी रहा है.
इसलिए कश्मीर विवाद के राजनीतिक समाधान की ओर कुछ कमज़ोर कदम बढ़ाने के बाद पीछे हट जाना और ठीक उसी वक़्त गठबंधन तोड़ देना, इस सबके पीछे कोई रणनीति छिपी नज़र आती है.
भाजपा अपने विकास और आर्थिक तरक्की के वादे को पूरा करने में नाकाम रही है, इसलिए अब वो गठबंधन तोड़ने के इस पैंतरे को 2019 के लोकसभा चुनाव में इस्तेमाल करेगी.
प्रदेश में कुछ महीनों में चुनाव होने के आसार हैं. लिहाज़ा कश्मीर के बिगड़ते हालात, जम्मू क्षेत्र का सांप्रदायिकीकरण और राज्य की मुस्लिम आबादी की ख़राब छवि पेश करके भाजपा इसका फायदा चुनावों में उठा सकती है.
ये बहुत हैरान करने वाला है कि इतने संवेदनशील प्रदेश को चुनाव की सस्ती चालबाज़ियों की विषयवस्तु बनाने की कोशिश हो रही है.
कश्मीर के लिए और सख़्त नीति बना सकता है केंद्र
राज्य में सरकार गिरने के साथ ही राज्यपाल शासन लगा दिया गया है. इससे भाजपा की केंद्र सरकार को जम्मू-कश्मीर पर सीधा शासन करने की सुविधा मिल रही है और इस दौरान कोई क्षेत्रीय पार्टी उसके कट्टर हिंदुत्व के नैरेटिव का सशक्त विरोध करने की स्थिति में नहीं है.
राज्यपाल एन एन वोहरा का कार्यकाल इस महीने के आख़िर में ख़त्म होने वाला है. ऐसे में बहुत कुछ अगले राज्यपाल पर भी निर्भर करेगा.
हालांकि बहुत संभव है कि एनएन वोहरा का कार्यकाल कुछ महीनों के लिए बढ़ा दिया जाए. वोहरा अनुभवी व्यक्ति हैं लेकिन राज्यपाल की कुर्सी अंत में किसी ना किसी दूसरे के पास तो जाएगी ही.
ज़्यादा आसार यही हैं कि केंद्र सरकार कश्मीर पर और ज़्यादा सख़्त नीति बनाएगी. जबकि आरएसएस और दूसरे हिंदुत्ववादी संगठन जम्मू में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को हवा देने की कोशिश करेंगे.
जम्मू-कश्मीर में 1989 से जारी सशस्त्र संघर्ष का इतिहास बताता है कि राज्यपालों के कार्यकाल में प्रदेश की सुरक्षा स्थिति और मानव अधिकारों का ट्रैक रिकॉर्ड बिगड़ा ही अधिक है.
केंद्र में संघ-प्रेरित भाजपा की अगुवाई में प्रदेश संभवत: अपने सबसे अंधकारमय और ख़तरनाक दौर की ओर बढ़ रहा है.
( ये लेखिका के निजी विचार हैं)
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