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ब्लॉग: संघ के मुख्यालय में नेहरूवादी नेशनलिज़्म की क्लास लगाई 'दादा' ने
- Author, राजेश प्रियदर्शी
- पदनाम, डिजिटल एडिटर, बीबीसी हिंदी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मुख्यालय में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने भाषण में नेहरू का नाम सिर्फ़ एक बार लिया, लेकिन यह आरएसएस के लिए किसी तरह से राहत की बात नहीं है.
तरह-तरह की अटकलों के बावजूद उन्होंने वही सब कहा जो नेहरू की विरासत है, उनका पूरा भाषण उसी नेता के राजनीतिक दर्शन का निचोड़ था जिसके सामने आरएसएस और बीजेपी कभी पटेल, तो कभी बोस को खड़ा करने की कोशिश करते रहे हैं.
अँग्रेज़ी में दिए गए ज़ोरदार भाषण में प्रणब मुखर्जी ने जिस देश के इतिहास, संस्कृति और उसकी पहचान पर रोशनी डाली वह नेहरू की मशहूर किताब 'डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' वाला भारत है, यहाँ तक कि उनके भाषण का प्रवाह भी वही था जो नेहरू की किताब में है.
भाषण की शुरुआत बहुत सटीक थी. उन्होंने कहा, "मैं यहाँ आपसे तीन चीज़ों के बारे में अपनी समझ साझा करने आया हूँ, राष्ट्र, राष्ट्रवाद और देशभक्ति. ये तीनों सब एक दूसरे से जुड़े हैं, इन्हें अलग नहीं किया जा सकता".
भाषण का एजेंडा और टोन
इसके बाद उन्होंने शब्दकोश से 'नेशन' की परिभाषा पढ़कर बताई, यहीं से उनके पूरे भाषण का एजेंडा और टोन तय हो गया कि कुछ बुनियादी बातों के बारे में क्लास लेने के मूड में हैं. उन्होंने भाषण की शुरुआत महाजनपदों के दौर से यानी ईसा पूर्व छठी सदी से की, ये भारत का ठोस, तथ्यों पर आधारित और तार्किक इतिहास है.
यह उस इतिहास का एंटी-थीसिस है जो संघ पढ़ाता है- हिंदू मिथकों से भरा काल्पनिक इतिहास जिसमें जब तक सब हिंदू हैं, सब ठीक है जैसे ही 'बाहरी' लोग आते हैं सब ख़राब हो जाता है, उस इतिहास में संसार का समस्त ज्ञान, वैभव और विज्ञान है. उसमें पुष्पक विमान उड़ते हैं, प्लास्टिक सर्जरी होती है, महाभारत काल में इंटरनेट होता है.
प्रणब मुखर्जी ने बताया कि ईसा से 400 साल पहले ग्रीक यात्री मेगास्थनीज़ आया तो उसने महाजनपदों वाला भारत देखा, उसके बाद उन्होंने चीनी यात्री ह्वेन सांग का ज़िक्र किया जिसने बताया कि सातवीं सदी का भारत कैसा था, उन्होंने बताया कि तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय पूरी दुनिया से प्रतिभा को आकर्षित कर रहे थे.
इन सबका ज़िक्र नेहरू ने ठीक इसी तरह अपनी किताब में किया है, जिन लोगों में नेहरू की किताब पढ़ने का धैर्य नहीं है, उन्हें यूट्यूब पर मौजूद श्याम बेनेगल का धारावाहिक 'भारत एक खोज' देखना चाहिए जो उसी किताब पर आधारित है.
उसके बाद मुखर्जी ने बताया कि किस तरह 'उदारता' से भरे वातावरण में रचनात्मकता पली-बढ़ी, कला-संस्कृति का विकास हुआ और ये भी बताया कि भारत में राष्ट्र की अवधारणा यूरोप से बहुत पुरानी और उससे कितनी अलग है.
ये बहुत अहम बात है जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए, उन्होंने बताया कि राष्ट्र के दो मॉडल हैं, यूरोपीय और भारतीय. उन्होंने कहा कि यूरोप का राष्ट्र एक धर्म, एक भाषा, एक नस्ल और एक साझा शत्रु की अवधारणा पर टिका है, जबकि भारत राष्ट्र की पहचान सदियों से विविधता और सहिष्णुता से रही है.
वे ये कहना भी नहीं भूले कि "धर्म, नफ़रत और भेदभाव के आधार पर राष्ट्र की पहचान गढ़ने की कोशिश से हमारे राष्ट्र की मूल भावना ही कमज़ोर होगी." ये सब बातें वे जहाँ से कह रहे थे, जिन लोगों को संबोधित करते हुए कह रहे थे, वह अपने-आप में बहुत महत्व रखता है.
भाषण को लेकर शंकाएं
मुखर्जी के भाषण को लेकर कई तरह की शंकाएँ रही थीं, लेकिन वे इस बेहद अहम भाषण के लिए उस व्यक्ति नेहरू की शरण में गए जिसने तय किया था कि सम्राट अशोक इस देश का सबसे महान राजा था जिससे लोकतांत्रिक भारत की पहचान जोड़नी चाहिए और राष्ट्रीय चिन्ह अशोक की विरासत से लेना चाहिए.
पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि "चंद्रगुप्त मौर्य वंश का अशोक वह महान राजा था जिसने जीत के शोर में, विजय के नगाड़ों की गूंज के बीच शांति और प्रेम की आवाज़ को सुना, संसार को बंधुत्व का संदेश दिया."
संघ का हमेशा से कहना रहा है कि भारत महान सनानत धर्म का मंदिर है, दूसरे लोग बाहर से आए लेकिन भारत का मूल आधार हिंदू धर्म है और इस देश को हिंदू शास्त्रों, रीतियों और नीतियों से चलाया जाना चाहिए, लेकिन इसके बरअक्स मुखर्जी ने कहा कि "एक भाषा, एक धर्म, एक पहचान नहीं है हमारा राष्ट्रवाद".
उन्होंने गांधी को भी याद किया और उनका हवाला देते हुए कहा कि राष्ट्रपिता ने कहा था कि भारत का "राष्ट्रवाद आक्रामक और विभेदकारी नहीं हो सकता, वह समन्वय पर ही चल सकता है."
संघ के लिए नागवार बातें
जो दो और बातें संघ और उससे जुड़े लोगों को सबसे ज़्यादा नागवार गुज़रेंगी वो ये कि उन्होंने 'सेकुलरिज्म को आस्था' बताया और ये भी कहा कि भारत में "संविधान के अनुरूप देशभक्ति ही सच्ची देशभक्ति है."
उन्होंने हिंदुत्व की संस्कृति की पुरज़ोर वकालत करने वालों के बीच 'कम्पोज़िट कल्चर' यानी मिली-जुली संस्कृति की बात की. ये भी कहा कि "बहस में हिंसा ख़त्म होनी चाहिए, देश में ग़ुस्सा और नफ़रत कम हो, प्रेम और सहिष्णुता बढ़े."
कुल मिलाकर, उनका पूरा भाषण उदार, लोकतांत्रिक, प्रोग्रेसिव, संविधान सम्मत, मानवतावादी भारत की बात करता है जो गांधी-नेहरू का मिला-जुला राजनीतिक दर्शन है. संघ के 'प्रशिक्षित, अनुशासित और राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित नेताओं और कार्यकर्ताओं' ने उसका क्या अर्थ निकाला, ये तो वे ही जानें.
क्लास तो सही लगाई दादा ने, उनके संघ के मंच पर जाने से चिंतित-आशंकित कांग्रेसी अब तालियाँ बजा रहे हैं. प्रणब मुखर्जी ने साबित किया कि वे पिछली पीढ़ी के पढ़े-लिखे समझदार नेता हैं, उन जैसे लोगों की बातों को आजकल कम ही सुना जा रहा है, संघ समर्थक हों या कांग्रेसी.
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