अमित शाह की इन मुलाक़ातों के मायने क्या हैं?

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता दिल्ली
बुधवार को भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह सहयोगी दल शिव सेना से मिलने मुंबई पहुँचे. वो अभिनेत्री माधुरी दीक्षित समेत अन्य लोगों से मिले.
इससे पहले दिल्ली में वो बाबा रामदेव से मिले जिनके लाखों प्रशंसक हैं. वो आगे अकाली दल के नेता प्रकाश सिंह बादल से भी मिलने वाले हैं. इन मुलाक़ातों का क्या मतलब निकाला जा रहा है?
क्या ये अगले साल होने वाले आम चुनाव की तैयारी है? क्या पिछले हाल के उपचुनावों में शिकस्त से पार्टी के खेमे में खलबली की झलक है?
अमित शाह शिव सेना के नाराज़ नेता उद्धव ठाकरे से जब मिलने गए तो शिव सेना ने उनका स्वागत अपनी पत्रिका सामना में ये कह कर किया: "जनता और बीजेपी के बीच संबंध टूट चुका है."
शिव सेना बीजेपी की सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी है. शिव सेना केंद्र और राज्य दोनों में एनडीए का हिस्सा है, लेकिन इसके बावजूद उद्धव ठाकरे बीजेपी और मोदी के ख़िलाफ़ सख्त टिप्पणी करते दिख रहे हैं.

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मुलाक़ातों का दौर
शाह की मुलाक़ातें ऐसे समय में हो रही हैं, जब बीजेपी को हाल के चुनावों में झटके लगे हैं और कर्नाटक में सरकार बनाने में नाकामी हाथ लगी.
बीजेपी के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन में शामिल कई सहयोगी पार्टियां नाराज़ चल रही हैं. मार्च में चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देसम पार्टी ने गठबंधन से नाता तोड़ दिया.
कुछ विशेषज्ञों की राय में बीजेपी एक संकट से गुज़र रही है ठीक उसी तरह जैसे वो 2004 में हुए आम चुनाव से पहले गुज़र रही थी.
राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप सिंह के अनुसार शाह की मुलाक़ातें पुराने साथियों को मनाने और नए साथियों की तलाश की एक कड़ी है
पत्रकार सबा नक़वी बीजेपी को क़रीब से जानती हैं. उनका कहना है कि अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीजेपी वाजपेयी और अडवाणी वाली बीजेपी से बहुत अलग है.
नक़वी कहती हैं कि आज की बीजेपी में किसी को खुल कर बोलने की आज़ादी नहीं है. उनके अनुसार "सहयोगी पार्टियों की नाराज़गी तो छोड़िए ख़ुद की पार्टी के अंदर नाराज़गी है, लेकिन कोई कुछ बोल नहीं सकता."

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इन मुलाक़ातों के बारे में उन्होंने कहा, "बीजेपी एनडीए में बड़े भाई की तरह है. ये मुलाक़ातें बीजेपी के थोड़ा झुकने की तरह हैं. एनडीए में शामिल पार्टियों को अब तक कोई लाभ नहीं मिला है."
क्या बीजेपी 2003 वाली स्तिथि में है जब सहयोगी पार्टियां नाराज़ थीं? प्रदीप सिंह इससे सहमत नहीं हैं. "नहीं, बल्कि मुझे लगता है कि ये कि ये 2019 के चुनाव की एक साल पहले तैयारी है. जिस तरह से सियासी और ग़ैर सियासी लोगों से मुलाक़ातें की जा रही हैं वो पार्टी की एक रणनीति लगती है".

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प्रदीप सिंह का कहना है कि इन मुलाक़ातों को मीडिया में काफ़ी जगह दी जा रही है, जिससे अगले साल चुनाव से पहले पार्टी को मीडिया में भरपूर जगह मिल रही है
गुजरात के व्यापारी ज़फर सरेशवाला प्रधानमंत्री नरेंद्र के क़रीबी माने जाते हैं, वो कहते हैं 2003 की तुलना में बीजेपी बेहतर स्थिति में है. उनका कहना है कि बीजेपी में कोई बौखलाहट नहीं है. वो कहते हैं कि अमित शाह की मुलाक़ातें पार्टी को चुनाव में मज़बूत करेंगी.
जफ़र कहते हैं, "सहयोगी पार्टियों की नाराज़गी का आधार विचारधारा में असहमति नहीं है. ये पार्टियां देखती हैं कि कहाँ पर लड्डू है. आप कहते हैं कि शिव सेना पार्टी से नाराज़ है, लेकिन फिर भी वो सरकार में है, राज्य में भी और केंद्र में भी. अगर नाराज़ होती तो सरकार से अलग हो जाती."
लेकिन सबा नक़वी कहती हैं, ''एनडीए में रहकर सहयोगी पार्टियों को कुछ मिला नहीं है. वो बीजेपी की हेकड़ी से परेशान हैं, लेकिन ये पार्टियां अधिक तोलमोल की स्थिति में नहीं हैं. सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी ही है.''

प्रदीप सिंह मानते हैं कि बीजेपी को अपनी सहयोगी पार्टियों की नाराज़गी और पहले दूर करनी चाहिए थी, लेकिन उनके अनुसार अमित शाह की पहल अच्छी है.
ज़फर सरेशवाला इस बात को मानते हैं कि कांग्रेस पार्टी पहले से मज़बूत हुई है और गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी नेता राहुल गाँधी का कद ऊंचा हुआ है. लेकिन उनका दावा है कि प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है और ये कि अगले साल चुनाव में पार्टी उनके नेतृत्व में एक बार फिर चुनाव जीतेगी.
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सबा नक़वी कहती हैं कि अब देर हो चुकी है. उनका कहना है कि अमित शाह की मुलाक़ातों से कोई चुनावी फ़ायदा होगा या नहीं इस पर अभी कुछ कहा नहीं जा सकता.
प्रदीप सिंह का कहना है कि सियासत में एक दूसरे पर कीचड़ उछालने का कोई ख़ास मतलब नहीं है. उन्होंने कहा, ''भागीदार पार्टियों को केवल ये चाहिए कि चुनाव के पहले बीजेपी उन्हें कितनी सीटों पर चुनाव लड़ने देगी और चुनाव में जीत के बाद सरकार में उनके कितने मंत्री होंगे."
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