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ब्लॉग- मोदी सरकार की चार साल की 54 कामयाबियों की पड़ताल
- Author, राजेश प्रियदर्शी
- पदनाम, डिजिटल एडिटर, बीबीसी हिंदी
सरकार को कितना काम करना चाहिए और कितना प्रचार, इसका अनुपात संविधान में तो लिखा नहीं है, यह सरकार के विवेक पर है.
मौजूदा सरकार ने विज्ञापन पर ख़र्च के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले हैं, मई 2014 में सत्ता में आने के बाद से दिसंबर 2017 के बीच मोदी सरकार ने प्रचार पर पौने चार हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च किए हैं जो सफल मिशन 'मंगलयान' के कुल ख़र्च से सात गुना अधिक है.
2019 के चुनाव के मद्देनज़र मोदी सरकार का प्रचार का ख़र्च बेतहाशा बढ़ेगा ही, सरकार कुछ बुरा या नया नहीं कर रही है लेकिन वो उस हद तक पहुँचने लगी है जहाँ 'प्रचार पहले, काम बाद में का एहसास होने लगा है.
प्रचार पर खर्च के सभी रिकॉर्ड टूटे
यह बताना ज़रूरी है कि पिछले आम चुनाव से पहले यूपीए सरकार ने भी प्रचार पर धुआँधार ख़र्च किया था, 2013-14 में पहली बार देश में सरकारी प्रचार का ख़र्च एक हज़ार करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर गया था जिसके बाद से मोदी सरकार उसे सालाना डेढ़ हज़ार करोड़ रुपये की तरफ़ ले जाती दिख रही है.
अरविंद केजरीवाल ने भी यही रास्ता अपनाया, उन्होंने प्रचार पर पिछली कांग्रेस सरकार से चार गुना ज़्यादा पैसे ख़र्च किए.
यह आप ही के खर्चे पर आपको लुभाने की कोशिश है, यानी करदाता के पैसों से मोदी या सोनिया को किसी शानदार प्रोडक्ट ब्रैंड की तरह चमकाने का अभियान. ये सिर्फ़ केंद्र सरकार का ख़र्च है, राज्यों या पार्टी के प्रचार का आँकड़ा इसमें शामिल नहीं है.
बुनियादी सुविधाओं पर ख़र्च करने की जगह जनता को भरमाने के लिए उसी का पैसा पानी की तरह बहाना इसे रोकने के लिए संसद की लोक लेखा समिति है, लेकिन जब संसद और उसके विभाग अपना काम ठीक से करते तो कहना ही क्या था. विकसित कहे जाने वाले देशों में सरकारी प्रचार का शोर सुनाई नहीं देता, सरकारी योजनाओं के साथ नेताओं के फ़ोटो के इस्तेमाल का तो सवाल ही नहीं है.
मोदी सरकार के चार साल पूरे होने के जश्न में, लगभग सभी अख़बारों के पहले पन्ने पर रंग-बिरंगे विज्ञापन हैं जिसमें बीजेपी के झंडे के रंगों के साथ नारा लिखा है—'देश का बढ़ता जाता विश्वास, साफ़ नीयत, सही विकास.'
ये विज्ञापन कितना सरकारी है और कितना राजनीतिक, इसका अंतर पूरी तरह ख़त्म हो चुका है. सरकार, देश, सत्ताधारी बीजेपी और नरेंद्र मोदी पूरी तरह एकाकार हो चुके हैं.
बहरहाल, इस विज्ञापन को ग़ौर से देखें तो ये 11 उप-शीर्षकों के तहत, 54 दावों के साथ ये साबित करने की कोशिश की गई है कि मोदी जी के नेतृत्व में देश नई बुलंदियाँ छू रहा है, लेकिन जब आप इसे ग़ौर से पढ़ना शुरू करेंगे तो कई बातों पर आपका ध्यान जाएगा जिन्हें सरकार चाहती है कि आप नज़रअंदाज़ कर दें.
'दुनिया देख रही है एक न्यू इंडिया'
सबसे दिलचस्प बात ये है कि इस विज्ञापन में, या दूसरे विज्ञापनों में सरकार ऐसे दावों को अपनी कामयाबी का सबूत बता रही है जिन्हें मापने का कोई तरीक़ा मौजूद नहीं है या फिर वे सरकार की उपलब्धियाँ हैं ही नहीं.
देखिए कुछ मिसालें, 'युवा ऊर्जा से बदलता देश', 'युवाओं को आगे बढ़ने के मज़बूत अवसर', 'भारत बना विकास का वैश्विक केंद्र' और 'पूरे विश्व ने योग को उत्साह के साथ अपनाया.'
पहले तीन तो नारे हैं उपलब्धियाँ नहीं, और योग का अरबों डॉलर का ग्लोबल बाज़ार दशकों से वैसे ही है, योगियों के पीछे दुनिया 60-70 के दशक से पागल रही है लेकिन योग की इस ग्लोबल कामयाबी को सरकार की उपलब्धि बना लेना सियासी बाज़ीगरी है.
पाँच साल में करोड़ों के हिसाब से रोज़गार के अवसर पैदा करने का वादा था, अब सरकार इसी मामले में क्या दावा कर रही है, वो देखिए-'पब्लिक, प्राइवेट और पर्सनल सेक्टर में विभिन्न तरीक़ों से युवाओं को आगे बढ़ने के मज़बूत अवसर.' मानो अवसर तो मज़बूत हैं, कमी शायद युवाओं में है.
सरकार ने रोज़गार का एक नया सेक्टर जोड़ा है—पर्सनल. ये वही है जिसे मोदी विरोधी मज़ाक में 'प्रधानमंत्री पकौड़ा रोज़गार योजना' कहते हैं, मज़ाक की बात अलग है लेकिन सरकार पकौड़े बेचने वाले के उद्यम का क्रेडिट कैसे ले सकती है?
सरकार अब रोज़गार के आंकड़ों को गोल कर रही है और 'विकास के मजबूत अवसर' जैसे मुहावरों से काम चला रही है क्योंकि सरकार के अपने ही श्रम मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि हालात बेहद खराब हैं.
दावे तो दावे हैं दावों का क्या?
कुल 54 दावों में से कई ऐसे हैं जिनके बारे में बेशक कहा जा सकता है कि थोड़ी सी जाँच के बाद वे खोखले या मिथ्या साबित होते हैं.
इसकी मिसाल है, हर गाँव तक बिजली पहुँचाने का दावा. देश का शायद ही कोई टीवी चैनल होगा जिसने आपको देश के हर कोने में मौजूद बिजली रहित गाँवों के दर्शन नहीं कराए. आज भी भारत में लगभग सवा तीन करोड़ घर ऐसे हैं जहाँ बिजली का कनेक्शन नहीं है, एक करोड़ से ज़्यादा ऐसे घर तो अकेले यूपी में हैं.
इसी तरह, स्वच्छ भारत मिशन के तहत देश भर में सवा सात करोड़ टॉयलेट बनाने का दावा. ये टॉयलेट ज़मीन पर कहाँ हैं, इनमें से कितने इस्तेमाल के लायक हैं, कितनों में पानी की व्यवस्था है ये सारे सवाल बेमानी हैं, बात मुख़्तसर ये है कि सवा सात करोड़ टॉयलेट बन चुके हैं, जिसको मानना हो माने, जिसको न मानना हो न माने.
मोदी सरकार को एक बात का क्रेडिट ज़रूर मिलना चाहिए कि उसने स्वच्छता को राष्ट्रीय एजेंडा पर ला दिया, रात-दिन के प्रचार से लोगों के रवैए में ज़रूर बदलाव आया होगा जिसके लिए सरकार की तारीफ़ वाजिब है.
सरकार की एक और कामयाब योजना उज्ज्वला स्कीम है जिसके तहत सरकार ने करीब पौने चार करोड़ गरीब महिलाओं को गैस का कनेक्शन दिया है और अब इसका लक्ष्य बढ़ाकर आठ करोड़ कर दिया गया है जो तारीफ़ के काबिल बात है.
इन 54 दावों में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत दिए गए एक करोड़ मकानों को तीन बार गिना गया है, सवा सात करोड़ टॉयलेट को दो बार और उज्ज्वला स्कीम की सफलता को भी दो बार गिनाया गया है.
अब एक मज़ेदार दावा ये देखिए
ज़रा कामयाबी का ये दावा पढ़िए—'भारत में पहली बार एसी ट्रेनों की तुलना में हवाई जहाज़ से सफ़र करने वालों की संख्या बढ़ी'. है न कमाल की कामयाबी, रेल सरकार चलाती है, हवाई जहाज़ एयर इंडिया को छोड़कर प्राइवेट कंपनियाँ उड़ाती हैं.
ये दावा भी किया गया है कि '2017-18 रेल सुरक्षा की दृष्टि से सबसे अच्छा साल' रहा, रेलवे की हालत ये है कि जब तक व्यक्ति मजबूर न हो, वो रेल से यात्रा करने से बचता है, एसी रेल यात्रा इतनी महंगी हो चुकी है कि जो उसका खर्च उठा सकता है वह हवाई यात्रा करने में भलाई देखता है.
ये वैसा ही दावा है कि स्वास्थ्य सेवाएँ इतनी अच्छी हो गई हैं कि अब ज़्यादा लोग प्राइवेट अस्पतालों में जाने लगे हैं.
चार साल की 54 उपलब्धियाँ गिनाने में सरकार का दम फूलता दिख रहा है, कई ऐसे दावे किए गए हैं जो मौजूदा हकीकत के ठीक उलट हैं, मिसाल के तौर पर ये कुछ दावे देखिए—'नोटबंदी से अब तक के सबसे ज़्यादा काले धन का पर्दाफ़ाश', सच ये है कि रिज़र्व बैंक में तकरीबन सारे पैसे लौट आए हैं और आज तक उनकी गिनती ही पूरी नहीं हो सकी है.
इसी तरह 'पिछड़े वर्गों की अपनी सरकार' उप-शीर्षक के तहत एक दावा ये भी किया गया है कि 'एससी-एसटी एक्ट को मज़बूत बनाया गया है.' भाजपा के दलित सांसद क्या झूठ बोल रहे हैं कि उनकी अवस्था बद से बदतर हुई है?
इसी सिलसिले में, 'किसान की संपन्नता हमारी प्राथमिकता' के तहत दावा किया गया है कि 'किसानों की आय दोगुनी करने के लिए बहुआयामी प्रयास' किए जा रहे हैं, यानी प्रयास भी उपलब्धि है. सच ये है कि कृषि की वृद्धि दर 5.6 प्रतिशत से घटकर चार साल में तीन प्रतिशत पर आ गई है.
और उन वादों का क्या हुआ?
आपको याद है, कल-पुर्जों से बना शेर जो भारत को नई पहचान देने वाला था, 'मेक इन इंडिया' कामयाबी के 54 दावों में बेचारा शेर कहीं जगह नहीं बना पाया, पिछले चार सालों में औद्योगिक उत्पादन और निर्यात दोनों में कोई पॉजिटिव ट्रेंड देखने को नहीं मिला है.
'गंगा मइया के बेटे' ने नमामि गंगे अभियान में क्या हासिल किया उसका ज़िक्र भी इस विज्ञापन में कहीं नहीं है, 'गंगा को साफ़ नहीं कर पाई तो जान दे दूँगी' कहने वाली कैबिनेट मंत्री उमा भारती अक्तूबर 2018 तक गंगा साफ़ कर देने वाली थीं लेकिन ये काम अब उनसे ले लिया गया है.
'डिजिटल इंडिया' की धूम ठंडी पड़ चुकी है, उसका भी कोई ज़िक्र नहीं है इन दावों की सूची में, 'स्किल्ड इंडिया' का उल्लेख एक बार है कि उसके तहत एक करोड़ लोगों को प्रशिक्षण दिया गया है लेकिन उनके लिए नौकरियाँ कहाँ हैं?
'स्मार्ट सिटी' का एक उल्लेख एक कामयाबी के तौर पर है लेकिन सिर्फ़ यही बताया गया है कि दो लाख करोड़ रुपये ख़र्च होंगे जो बजट प्रावधान है, उपलब्धि नहीं.
ऐसा नहीं हो सकता कि कोई भी सरकार चार साल में कुछ काम ही न करे, और इस सरकार ने भी अनेक काम किए हैं जिनमें से कई का ज़िक्र ऊपर किया गया है, इसके अलावा तेज़ी से सड़कें बनाना, स्टेंट लगवाने और घुटनों की सर्जरी की लागत कम करना और जन सुरक्षा बीमा इसकी कुछ मिसालें हैं.
सरकार का एक दावा पुख़्ता है कि उसने तुष्टीकरण की राजनीति बंद कर दी है, उपलब्धियों के पुलिंदे में अल्पसंख्यक और आदिवासी ये दो शब्द कहीं नहीं हैं, अलबत्ता महिलाओं का ज़िक्र अनेक बार है, पाँच में से तीन तस्वीरें महिलाओं की हैं.
राजनीतिक दल वादा करते हैं, सरकारें दावा करती हैं, जागरूक नागरिकों का काम है प्रचार के सम्मोहन में आए बिना, उन्हें ग़ौर से देखना-समझना.
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