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ब्लॉगः गगनदीप सिंह, तुस्सी ग्रेट हो!
- Author, शिवप्रसाद जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
गगनदीप सिंह न दीवार हैं न लोहा. वह एक आम इंसान हैं. उनकी मनुष्यता ही उनकी पहचान है. वैसे वो उत्तराखंड पुलिस में सब इंस्पेक्टर हैं. जाबांज़ी और साहस की मिसाल.
एक मुसलमान लड़के को उपद्रवियों और हमलावरों से बचाते हुए उनकी तस्वीर एक झुलसे हुए समय में राहत के झोंके की तरह आई है.
विडंबना के तौर पर ही पढ़िए कि अव्वल तो ये नौबत न रहती लेकिन आज के हालात में इस देश को ऐसी और तस्वीरों की ज़रूरत है.
ये भी सच है कि ऐसी तस्वीरें ऐसे ही नहीं बनतीं. बुरे वक़्त की ये एक दुर्लभ तस्वीर है जिसे एक ठोस मानवीय सामर्थ्य ने निर्मित किया है. इस पर धूल नहीं गिराई जा सकती, इसे धुंधला या विकृत भी नहीं किया जा सकता है.
छोटी छोटी तस्वीरें बन रही हैं. रोज़ा तोड़ ब्लड डोनेट कर जानें बचाने वाले गोपालगंज के आलम जावेद और देहरादून के आरिफ़ ने मनुष्यता, दया और करुणा की ऐसी ही तस्वीरें हमें दी हैं.
भावुक करती है तस्वीर
नैनीताल ज़िले के रामनगर में जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के पास एक मंदिर है. एक नदी है जिसके किनारों पर अक़्सर प्रेमी जोड़े बैठते हैं. लड़का अपनी हिंदू दोस्त के साथ एक किनारे बैठा था कि लव जेहाद के बलवाई पहुंच गए.
वो उसे मार ही डालते लेकिन गगनदीप अपने दोस्तों के साथ समय पर पहुंच गए. धौंस, गालियां, मुक्के और धमकियां अपनी पीठ पर सह लीं और लड़के को अपने सीने से चिपका लिया.
यह तस्वीर भावुक करती है लेकिन उससे ज़्यादा हमारे दुबके हुए विवेक को झिंझोड़ने का काम करती है. हमें साम्प्रदायिकों और दंगाइयों से न डरने के लिए प्रेरित करती है.
गगनदीप का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है. संयोग से वो घटनास्थल के पास ड्यूटी पर तैनात थे. उनका कहना है कि वो अपना फ़र्ज़ अदा कर रहे थे. उनका पहला मक़सद था लड़के को भीड़ से बचाना और उन्होंने वही किया.
वो लड़का ख़ुशनसीब है कि उसे गगनदीप मिल गए. वरना उसका क्या हश्र होता सोचकर दिल हिल जाता है और देह लड़खड़ाने लगती है. भीड़ आपका पीछा कर रही है. दृश्य- अदृश्य. भीड़ ड्रोन बन चुकी है.
अरुंधति रॉय ने अपने उपन्यास "द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैपीनेस" में ज़िक्र किया हैः भगवा पैराकीट. आसमान को अपनी चीखों से फाड़ते ये पैराकीट ख़ौफ़ में डालना चाहते हैं कि नागरिक डरें और झुकें और बेदम हो जाएं.
'गगनदीप जैसे अधिकारियों की ज़रूरत'
उत्तराखंड में पुलिस ने हाल के दिनों में एक के बाद एक वारदातें टाली हैं. उधमसिंहनगर, कोटद्वार, सतपुली, मसूरी आदि. अशांति और हिंसा को बेताब ताकतें लपलपा रही हैं. बहुत कठिन घड़ी है.
गगनदीप जैसे पुलिस अधिकारियों की शिद्दत से ज़रूरत महसूस होती है. लेकिन ये भी देखिए कि कानून की रखवाली करना और मुस्तैद ड्यूटी करना आसान नहीं है. राजस्थान, हरियाणा और तमिलनाडु की घटनाएं देखिए.
परिवर्तन की आहटें और हलचलें भी इन्हीं बुरे वक़्तों में नई अंगड़ाई लेती हैं जैसे बुरे वक़्तों में सबसे अच्छी कविता आती है.
कारोबारी लिबरलों या इनऑर्गेनिक बौद्धिकों या राजनीतिक षडयंत्रकारियों की पलटनें, इंसाफ़ की पुकारों को घास की तरह रौंदते हुए तो गुज़र सकती हैं लेकिन उन्हें मिटा नहीं सकतीं. पीछे से आती हवाएं और धूप की तहें और मिट्टी की नमी उन्हें फिर बुलंद कर देती हैं.