You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
जेएनयू में ‘इस्लामी चरमपंथ’ कोर्स की क्या है हक़ीक़त?
- Author, शकील अख़्तर
- पदनाम, संवाददाता, बीबीसी उर्दू
दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में 'इस्लामी चरमपंथ' नाम का एक नया कोर्स शुरू करने के प्रस्ताव पर विवाद पैदा हो गया है.
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने इसे चरमपंथ को इस्लाम से जोड़ने की कोशिश क़रार दिय है और इसकी आलोचना की है जबकि दिल्ली के अल्पसंख्यक आयोग ने जेएनयू के कुलपति से इस कोर्स के बारे में विस्तार से बताने को कहा है.
हालांकि, जेएनयू के एक प्रोफ़ेसर का कहना है कि ऐसे किसी कोर्स का प्रस्ताव पेश नहीं किया गया है.
यूनिवर्सिटी की अकेडमिक काउंसिल ने बीते शुक्रवार को राष्ट्रीय सुरक्षा के एक नए अध्ययन केंद्र को अनुमति दी. इस केंद्र के तहत साइबर सुरक्षा, बायोलॉजिकल वारफ़ेयर और सिक्यॉरिटी से जुड़े इस तरह के कई दूसरे कोर्स शुरू करने का प्रस्ताव रखा गया था.
ऐसी रिपोर्टें हैं कि इसी बैठक में 'इस्लामी चरमपंथ' नाम के कोर्स का भी प्रस्ताव पेश किया गया था.
एक प्रोफ़ेसर ने बीबीसी को बताया कि अकेडमिक काउंसिल के कुछ सदस्यों ने इस कोर्स के नाम की निंदा की और इसका नाम बदलकर सिर्फ़ 'चरमपंथ' करने का प्रस्ताव रखा. कई ने इसे 'इस्लामी चरमपंथ' करने की भी सलाह दी.
लेकिन मीडिया में इसकी ख़बर आते ही इस कोर्स के नाम और इस पर विवाद पैदा हो गया है.
अकेडमिक काउंसिल की जिस कमिटी ने राष्ट्रीय सुरक्षा के अध्ययन केंद्र का ख़ाका तैयार किया है, उसके प्रमुख प्रोफ़ेसर एजी दुबे का कहना है कि ये विवाद बेबुनियाद है.
उन्होंने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि अकेडमिक काउंसिल की बैठक में 'इस्लामी चरमपंथ' नाम के किसी कोर्स का कोई प्रस्ताव नहीं पेश किया गया था, ये सिर्फ़ मीडिया की बनाई हुई एक झूठी ख़बर है.
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मौलाना महमूद मदनी ने जेएनयू से इसकी निंदा की है. मौलाना मदनी ने जेएनयू के कुलपति को लिखे ख़त में कहा है, "ये बहुत दर्दनाक और हास्यास्पद बात है कि जेएनयू जैसा शैक्षणिक संस्थान चरमपंथ के बारे में एक कोर्स शुरू कर रहा है और इसे इस्लाम से जोड़ रहा है. हमारा विचार है कि यूनिवर्सिटी पर गंदी मानसिकता के लोगों का कब्ज़ा हो चुका है."
उन्होंने कुलपति से इस बात पर ज़ोर दिया है कि वह इस्लाम को चरमपंथ से जोड़ने वाले इस कोर्स को संशोधित करें. उन्होंने कहा, "अगर आपने ऐसा न किया तो हम क़ानूनी कार्रवाई करने का रास्ता लेने को मजबूर होंगे."
वही, दिल्ली के अल्पसंख्यक आयोग ने भी जेएनयू को नोटिस भेजकर पूछा है कि क्या इस कोर्स को शुरू करने से पहले इसके संभावित प्रभावों की समीक्षा की गई है. आयोग के प्रमुख डॉक्टर ज़फ़रुल इस्लाम ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि ये फ़ैसला अकेडमिक नहीं राजनीतिक है.
उन्होंने कहा कि अगर इस्लाम को चरमपंथ से जोड़ेंगे तो 'इस तरह के कोर्स से जेएनयू से बच्चे क्या सीखकर निकलेंगे. इससे ज़रूर अल्पसंख्यकों के हितों को चोट पहुंचेगी.'
आयोग ने यूनिवर्सिटी से ये भी पूछा है कि अगर ऐसा कोई कोर्स शुरू करने का फ़ैसला किया गया है तो इस बारे में बताए कि इसके तहत क्या सिलेबस पढ़ाया जाएगा. इसे कौन लोग पढ़ाएंगे और इसके विशेषज्ञ कौन होंगे?
आयोग ने अपने नोटिस में जानना चाहा है कि 'क्या जेएनयू के वर्तमान प्रशासन ने इसकी समीक्षा की है कि कैंपस के छात्र और कैंपस से बाहर समाज पर इस कोर्स का क्या असर पड़ेगा?'
पांच जून तक यूनिवर्सिटी को अपना जवाब देना है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)