कर्नाटक में 'ऑपरेशन कमल' से खिलेगा 'कमल'?

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

कर्नाटक की त्रिशंकु विधानसभा में कौन सी पार्टी सत्ता पक्ष की कुर्सियों पर बैठेगी और कौन विपक्ष में रहेगा, इस सवाल जवाब अब भी खोजा जा रहा है.

लेकिन तमाम संभावनाओं के बीच भारतीय जनता पार्टी के लिए अपने ही ईजाद किए 'ऑपरेशन कमल' के ज़रिए सत्ता प्राप्त करने की रास्ते अभी भी बने हुए हैं.

साथ ही उसके पास जेडीएस या कांग्रेस के कुछ विधायकों को तोड़ कर सत्ता में आने का रास्ता भी मौजूद है.

इस सिलसिले में अब विधायकों के खरीद-फरोख्त की बातें भी सामने आ रही हैं.

जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन की तरफ़ से मुख्यमंत्री पद के दावेदार एचडी कुमारस्वामी ने बुधवार को कहा कि वो फिर से राज्यपाल से मुलाक़ात करने की कोशिश करेंगे.

कुमारस्वामी का सवाल

कुमारस्वामी ने ये भी कहा कि राज्य में अपनी सरकार बनाने के लिए "भाजपा हमारे विधायकों को तोड़ना चाहती है और इसके लिए पैसों की पेशकश कर रही है."

उन्होंने सवाल किया कि क्या भाजपा के पास काला धन है?

कुमारस्वामी का कहना है, "ऑपरेशन कमल की तो भूल ही जाइए. भाजपा में भी ऐसे लोग हैं जो हमारे साथ आने के लिए तैयार हैं. अगर वो हमारे विधायक तोड़ने की कोशिश करेंगे तो हम उनके दोगुने विधायक तोड़ेंगे."

साथ ही उन्होंने कहा, "साल 2004 में जब राज्य में भाजपा की सरकार बनी थी तब मैं भाजपा के साथ गया था और ये मेरे पिता के करियर में धब्बे की तरह था. भगवान ने मुझे इस ग़लती को सुधारने का मौक़ा दिया है और मैं कांग्रेस के साथ रहूंगा."

'ऑपरेशन कमल' की फिर से चर्चा

कांग्रेस ने अपने ट्विटर हैंटल के जडरिए आरोप लगाया है कि "भाजपा के पास खनन मफिया का समर्थन है और इसकी मदद से वो कर्नाटक में ऑपरेशन कमल को अंजाम देना चाहती है. सत्ता पाने के लिए इस तरह की कवाय़द गणतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है."

कर्नाटक के राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर से 'ऑपरेशन कमल' पर चर्चा हो रही है.

जबकि राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने 2018 के चुनावों में जीते हुए उम्मीदवारों की सूची तैयार कर उसे राज्यपाल वजुभाई वाला को सौंपने की तैयारी भी कर ली है.

बीजेपी इस समय ठीक उसी हाल में जैसी वो साल 2008 में थी. उस वक्त बीजेपी ने कुल 110 सीटें जीती थीं.

इस बार बीजेपी को 104 सीटें मिली हैं लेकिन सत्ता की चाभी तब तक उसकी पहुंच से दूर है जब तक वो जेडीएस या कांग्रेस के जीते हुए उम्मीदवारों को तोड़कर अपनी तरफ ना कर ले.

बीजेपी और जेडीएस का प्रयोग

इस बीच कांग्रेस ने गोवा और मणिपुर के राजनीतिक अनुभव से सबक लेते हुए जबर्दस्त तेज़ी दिखाई और जेडीएस के नेता एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव देकर बिना शर्त अपना समर्थन दे दिया.

गोवा और मणिपुर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी लेकिन बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब रही.

साल 2008 में जब बीजेपी को 110 सीटें प्राप्त हुई थीं और वह सत्ता से महज तीन कदम पीछे रह गई थी. तब खनन घोटाले की जद में आए जनार्दन रेड्डी 'ऑपरेशन कमल' को अमल में लाए थे.

कर्नाटक में बीजेपी ने पहली बार सत्ता का स्वाद तब चखा जब बीजेपी-जेडीएस गठबंधन में एचडी कुमारस्वामी ने खुद को मुख्यमंत्री बनाने की शर्त रखी और तब बीएस येदियुरप्पा ने सहानुभूति बटोरते हुए मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया.

क्या था 'ऑपरेशनकमल'?

'ऑपरेशन कमल' का मतलब था कि जेडीएस या कांग्रेस का कोई सदस्य विधानसभा में अपनी सदस्यता से इस्तीफ़ा दे और फिर उसे बीजेपी के टिकट से चुनाव लड़वाकर अपने दल में शामिल कर लिया जाए.

बीजेपी का यह ऑपरेशन कामयाब भी रहा था और सात में से पांच सदस्य चुनाव जीतकर बीजेपी सदस्य के रूप में विधानसभा पहुंचने में सफल रहे थे.

बीजेपी के एक नेता ने नाम न छापने करने की शर्त पर बीबीसी से कहा, "हां, यह विकल्प तो अभी भी हमारे पास मौजूद है लेकिन हमें नहीं लगता कि इस बार जेडीएस का साथ यह काम कर पाएगा क्योंकि इस समय वोक्कालिगा का मुद्दा बहुत ज्यादा गर्म है."

हालांकि जेडीएस ने इस बार साल 2013 से कमतर प्रदर्शन किया है, उस समय उसने 40 सीटें जीती थीं जबकि इस बार वह 38 सीटें ही जीत पाई है.

क्या जेडीएस को तोड़ना आसान है?

वहीं, जेडीएस के कई नेता इस बात से भी अवगत हैं कि वोक्कालिगा समुदाय की भावनाओं के साथ नहीं खेला जा सकता क्योंकि इस बार के चुनाव में जो सात विधायक जेडीएस से निकलकर कांग्रेस में गए उनमें से सिर्फ दो ही जीत सके हैं.

इस बार कुमारस्वामी ने चतुराई भरा कदम उठाते हुए सिद्धारमैया के ख़िलाफ़ वोक्कालिगा समुदाय को एकजुट किया.

वहीं, जब सिद्धारमैया ने एचडी देवगौड़ा पर हमला किया तो उसे वोक्कालिगा समुदाय पर हमले के रूप में पेश किया.

जेडीएस के एक नेता ने कहा, "इस वक्त तो कोई भी पार्टी छोड़ने के बारे में नहीं सोच रहा है क्योंकि इस बार का चुनाव बहुत कड़ा रहा है, उम्मीदवारों ने बहुत मेहनत कर सीटें जीती हैं और कोई भी इतनी आसानी से इस्तीफा देने के लिए तैयार नहीं होगा."

राज्यपाल का रास्ता

ऐसा कहा जा सकता है कि अगर बीजेपी को 'ऑपरेशन कमल' दोबारा कामयाबी से लागू करना है तो उसे उत्तरी कर्नाटक से जीते कांग्रेसी विधायकों पर ध्यान लगाना होगा. इस बात पर बीजेपी के एक नेता भी सहमति दर्ज़ करवाते हैं.

एक और विकल्प जो बीजेपी के पास बचता है, वह राज्यपाल वजुभाई वाला के राजभवन से हो कर गुज़रता है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में भले ही कहा हो कि अगर सबसे बड़े दल के पास बहुमत नहीं है तो ऐसी स्थिति में राज्यपाल उस गठबंधन को भी पहले सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं जिसके पास बहुमत साबित करने के लिए पर्याप्त सीटें हों.

फिर भी कर्नाटक के राज्यपाल के पास वे तमाम पुराने विकल्प मौजूद हैं जो उनके पूर्ववर्ती राज्यपालों ने अपनाए हैं.

जैसे एसआर बोम्मई वाले मामले में राज्यपाल ने सबसे बड़े दल को विधानसभा में बहुमत साबित करने का मौका दिया था.

गठबंधन सरकार

अगर मौजूदा राज्यपाल भी ऐसा करते हैं तो बीजेपी के पास कांग्रेस के विधायकों को तोड़ने के लिए एक हफ्ते का समय और मिल जाएगा.

बीजेपी के एक नेता ने कहा, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह हर हाल में कर्नाटक में बीजेपी की सरकार बनाना चाहते हैं."

हालांकि इस बीच बीजेपी नेतृत्व के भीतर एक और विकल्प पर विचार किया जा रहा है और वह यह है कि जेडीएस के नेतृत्व में सरकार बनने दी जाए और फिर अगले 6 महीने तक इंतज़ार किया जाए क्योंकि येदियुरप्पा जैसे नेताओं को उम्मीद है कि ऐसी गठबंधन सरकार लंबे वक्त तक नहीं चल पाएगी.

कुल मिलाकर कहें तो कर्नाटक में सत्ता के दरवाज़े अभी सभी के लिए खुले हुए हैं.

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