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आपसी रिश्तों में दीवार बना बंगाल का पंचायत चुनाव
- Author, प्रभाकर एम.
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
किसी चुनाव में एक परिवार के सदस्यों के अलग-अलग राजनीतिक दलों के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरना कोई नई बात नहीं है. लेकिन पश्चिम बंगाल में सोमवार को हो रहे पंचायत चुनावों के लिए प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों की ओर से मैदान में उतरने वाले उम्मीदवारों के आपसी पारिवारिक रिश्ते दरकने लगे हैं.
इन चुनावों में खासकर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और उसे चुनौती देती भाजपा के बीच जारी कड़वी और हिंसक प्रतिद्वंद्विता ने इन उम्मीदवारों को आपसी पारिवारिक रिश्ते तोड़ने पर मजबूर कर दिया है.
अलग-अलग पार्टी से मैदान में उतरे हैं पति-पत्नी
पूर्व मेदिनीपुर ज़िले का एक मामला है जिसमें पति तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर लड़ रहे है तो पत्नी भाजपा के टिकट पर. अब इससे उपजी कड़वाहट से निपटने के लिए दोनों पति-पत्नी अलग-अलग रहने लगे हैं. चुनावों तक पत्नी मायके रहने चली गई है. इन दोनों में बातचीत भी बंद हो गई है.
अलीपुरद्वार ज़िले में एक पिता ने बेटे को इसलिए घर से निकाल दिया कि वह भाजपा के टिकट पर चुनावी मैदान में था और पिता के बार-बार कहने के बावजूद उसने नाम वापस नहीं लिया.
कांग्रेसी पिता ने भाजपाई बेटे को घर से निकाला
अलीपुरद्वार ज़िले में पूर्व चिकलीगुड़ी गांव के 68 साल के रिटायर्ड स्कूल टीचर भोगनारायण दास तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. लेकिन भाजपा ने उसी सीट पर उनके पुत्र अमल को अपना उम्मीदवार बना दिया है.
पिता के बार-बार कहने के बावजूद अमल ने जब चुनाव से नाम वापस नहीं लिया तो उन्होंने उसे घर से ही निकाल दिया. यही नहीं, उसे मिठाई की पारिवारिक दुकान पर आने से भी मना कर दिया गया है.
वह दुकान ही अमल की रोजी-रोटी का जरिया थी. मजबूरन वह अब अपनी ससुराल में रह रहे हैं.
अब पूरे इलाके में यह चर्चा का विषय बन गया है कि राजनीति ने दास परिवार में किस तरह एक दीवार खड़ी कर दी है. बीते दो दशकों से पहले कांग्रेस और फिर तृणमूल के टिकट पर चुनाव लड़ने और जीतने वाले भोगनारायण कहते हैं, "भाजपा ने हमारे परिवार को दो-फाड़ कर दिया है. मैंने अमल से बार-बार नाम वापस लेने को कहा था. लेकिन वह नहीं माना. इसलिए मैंने उसे घर और दुकान से बाहर कर दिया."
दूसरी ओर, अमल का कहना है, "किसी पार्टी को पसंद करना या नहीं करना किसी व्यक्ति की निजी पसंद और लोकतांत्रिक अधिकार है. लेकिन मेरे पिता ने इस लड़ाई को नाक का सवाल बना लिया है."
दिलचस्प बात यह है कि पिता के ख़िलाफ़ मुकाबले में उतरने के बावजूद अमल अपने चुनाव अभियान के दौरान उनके ख़िलाफ़ एक भी शब्द नहीं बोल रहे हैं.
वो कहते हैं, "मैंने तृणमूल कांग्रेस के भ्रष्टाचार और भाजपा की विकास योजनाओं को ही चुनाव प्रचार का मुद्दा बनाया है."
डॉक्टर मियां-बीबी की भी यही कहानी
इसी तरह की एक दूसरी घटना में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता ने सात जन्मों तक साथ निभाने का वादा करने वाले एक दंपति के आपसी रिश्तों के बीच दीवार खड़ी कर दी है.
पूर्व मेदिनीपुर ज़िले में पेशे से डॉक्टर पति तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर मैदान में है तो पत्नी भाजपा के. पत्नी के मायके वाले भाजपा के समर्थक हैं. डॉक्टर पार्थ दास की पत्नी लिपिका घर छोड़ कर मायके चली गई हैं.
वो कहती हैं, "मैंने गुस्से में भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरने का फ़ैसला किया. उसने अपने पति को राजनीति छोड़ कर अपने पेशे पर ध्यान देने को कहा था. लेकिन वो नहीं माने तो मैंने भी भाजपा का दामन थाम लिया."
उधर पार्थ कहते हैं, "मैं शुरू से ही तृणमूल कांग्रेस का सदस्य रहा हूं. मेरी पत्नी मुझे बताए बिना भाजपा उम्मीदवार बन गई."
लिपिका ने तृणमूल कांग्रेस को विश्वासघाती करार दिया है. वो कहती हैं कि वर्ष 2011 में नंदीग्राम आंदोलन के सिलसिले में एक झूठे मामले में उनके पति को गिरफ़्तार किया गया था. तब तृणमूल के किसी भी नेता ने उनकी मदद नहीं की. पार्टी ने साल 2016 के विधानसभा चुनावों में मेरे पति को टिकट देने का वादा किया था, लेकिन नहीं दिया."
इसी वजह से लिपिका ने पति से राजनीति छोड़ कर डॉक्टरी के अपने पेशे पर ध्यान देने को कहा. लेकिन जब वह नहीं माने तो लिपिका भी गुस्से में भाजपा उम्मीदवार बन गई.
सुर्खियों में बना हुआ है यहां का पंचायत चुनाव
आपसी रिश्तों के दरकने की इन कहानियों के अलावा भी अबकी पंचायत चुनाव विभिन्न वजहों से काफी अहम हो गए हैं. बीते महीने नामांकन प्रक्रिया की शुरुआत से ही राज्य के विभिन्न हिस्सों में जारी हिंसा में एक दर्जन से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.
चुनाव पहले तीन चरणों में होना था. लेकिन राज्य चुनाव आयोग ने बाद में इसे एक ही चरण में कराने का फ़ैसला किया.
इससे विपक्षी राजनीतिक दलों ने राज्य चुनाव आयुक्त अमरेंद्र कुमार सिंह के तृणमूल कांग्रेस के दबाव में आने और आयोग के सरकार और तृणमूल की कठपुतली बनने के आरोप लगाए.
इन आरोपों में कलकत्ता हाईकोर्ट के अलावा सुप्रीम कोर्ट तक कम से कम एक दर्जन याचिकाएं दायर की गईं. आखिरकार मतदान की तारीख़ से चार दिन पहले सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के फ़ैसलों ने चुनाव का रास्ता साफ़ किया.
तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवारों की एक-तिहाई से ज़्यादा सीटों पर निर्विरोध जीत ने भी अबकी नया रिकॉर्ड बनाते हुए काफी सुर्खियां बटोरी हैं.