ब्रिटिश सरकार की आंख की किरकिरी था बंगाल गजट

    • Author, सर्वप्रिया सांगवान
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

ज़्यादा दिन नहीं हुए जब 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' संस्था ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना की थी क्योंकि वे पत्रकारों के ख़िलाफ़ नकारात्मक प्रचार को रोकने में नाकामयाब रहे हैं.

दरअसल, ये अंतरराष्ट्रीय संस्था हर साल अलग-अलग देशों में प्रेस की आज़ादी पर रिपोर्ट और रैकिंग निकालती है. इस साल संस्था ने बताया है कि जब भी भारतीय जनता पार्टी या इसकी हिंदुत्ववादी नीति के ख़िलाफ़ कोई रिपोर्ट आती है तो प्रधानमंत्री के समर्थक या ट्रोल सोशल मीडिया पर गालियां या जान से मारने की धमकी देने लगते हैं.

इस साल प्रेस फ़्रीडम के मामले में भारत की रैंकिग पिछले साल के मुकाबले दो पायदान घट गई है.

180 देशों में भारत इस साल 138वें नंबर पर है. इस रिपोर्ट में भारतीय पत्रकारों के साथ हुई हिंसा का भी ज़िक्र किया गया है जिसकी वजह से भारत की रैंकिग इतनी नीचे है. मसलन पिछले साल पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या.

अगर प्रेस की आज़ादी की बात की जाए तो ब्रिटिश राज में सरकार का दखल बहुत ज़्यादा था जिसके चलते भारत का पहला अख़बार 'बंगाल गजट' बंद हो गया.

आपको बताते हैं भारत के पहले अख़बार की कहानी.

जनवरी 29, 1780 को जेम्स आगस्टस हिकी ने भारत का पहला अख़बार कलकत्ता में शुरू किया था.

जब 400 लोगों ने हिकी के घर पर हमला किया

हालांकि ये अख़बार सिर्फ़ 2 साल ही चल पाया और आख़िरकार ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसकी प्रिंटिग प्रेस को ज़ब्त कर लिया.

जे नटराजन की लिखी हुई और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से प्रकाशित किताब 'भारत में पत्रकारिता की शुरूआत' में इसका ज़िक्र मिलता है.

किताब में लिखा है, "हिकी के दो पन्नों के अख़बार में खुद गवर्नर-जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स सहित ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारियों के निजी जीवन पर फूहड़ और उपहासजनक टिप्पणियों को जगह दी जाती थी."

इसी किताब में उन पर हुए मानहानि के मुकदमों का भी ज़िक्र है जो सरकार और सरकार के लोगों ने किए थे.

एक स्वीडिश मिशनरी जौन कियरनांडर पर हिकी ने अपने अख़बार में आरोप लगाया कि वह मुख्य चर्च को बेचने का इरादा बना रहे हैं.

कियरनांडर ने गर्वनर-जनरल से आरोप मुक्त होने का पत्र हासिल कर लिया और फिर हिकी पर मानहानि का मुकदमा कर दिया.

हिकी को 4 महीने की क़ैद और 500 रुपए के जुर्माने की सज़ा दी गई. जुर्माना चुकाने तक उन्हें जेल में ही रखने का आदेश सुनाया गया.

लेकिन ये सज़ा उन्हें आक्रामक लेखन से नहीं रोक पाई. उन्होंने और कड़े शब्दों में गवर्नर-जनरल और मुख्य न्यायाधीश सर इलिजा एम्पी पर निशाना साधा.

इसके बाद काफ़ी तादाद में हथियारबंद लोगों ने हिकी प्रेस पर हमला बोल दिया. हिकी की गिरफ़्तारी के आदेश निकाले गए.

आख़िर टूट गए हिकी

एंड्रयू ऑटिस की किताब 'हिकी बंगाल गजट: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ इंडियाज़ फ़र्स्ट न्यूज़पेपर' भी एशिया के पहले अख़बार पर हुए इस हमले की घटना दर्ज है.

किताब के मुताबिक 'जून 16, 1781 में हथियारबंद यूरोपीय और भारतीय सिपाहियों ने हिकी के घर को घेर लिया और गेट तोड़ अंदर घुसे. हिकी की गिरफ़्तारी का वारंट उनके हाथ में था.'

उन पर आरोप था कि उन्होंने कलकत्ता सरकार के ख़िलाफ़ अपने अख़बार में आपत्तिजनक टिप्पणियां की हैं.

इस बार ज़मानत के 80 हज़ार का बाण्ड भरना था. ये रकम ना चुकाने के एवज में उन्हें हिरासत में रखा गया. लेकिन हिकी ने जेल से ही अख़बार का संपादन जारी रखा.

उनके तेवर फिर भी वही थे. एक और मुकदमे में 1 साल की क़ैद और 200 रुपए जुर्माना हुआ. दूसरे मुकदमे में मुख्य न्यायाधीश ने गवर्नर जनरल को पांच हज़ार रुपए जुर्माना वसूलने का अधिकार दिया.

इतना सब होने पर भी हिकी ने अपना काम जारी रखा, लेकिन धीरे-धीरे वह ग़रीबी से परेशान होने लगे.

सरकार की आंख की किरकिरी थे अख़बार

किताब में लिखा गया है कि कंपनी अपने ख़िलाफ़ लोगों के प्रति इतनी निष्ठुर और शक्तिशाली थी कि इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब कंपनी के 16,800 पन्नों के काम के एवज में हिकी ने 35 हज़ार रुपए का मेहनताना और ब्याज मांगा तो उसे महज़ 6,711 रुपए में मामला निपटाने को कहा गया.

हिकी उस वक्त इस हालात में आ चुके थे कि इस प्रस्ताव पर सहमत हो गए. ये रकम भी काम हाथ में लेने के 16 साल बाद मिली और वो भी तय रकम का पांचवां हिस्सा.

आख़िरकार ये अख़बार अपने शुरू होने के दो साल में ही बंद हो गया. लेकिन हिकी ने कई लोगों को राह दिखा दी और भारत में 'इंडिया गजट', 'मद्रास कूरियर', 'बंबई हेराल्ड' अख़बारों की शुरुआत हुई, लेकिन इन्हें भी ब्रिटिश सरकार की नाराज़गी झेलनी पड़ी.

जे नटराजन लिखते हैं, "अठाहरवीं शताब्दी पूरी होते-होते कई मायनों में भारत में पत्रकारिता के एक दौर की समाप्ति हो चुकी थी. कोई व्यक्ति अख़बार शुरू करता तो वो सरकार या प्रभावशाली अधिकारियों की नज़रों का कांटा बन जाता था."

"कोई अख़बार उसके आदेश का उल्लंघन करता और माफ़ी नहीं मांगता तो सबसे पहले उसकी डाक सुविधाएं बंद कर दी जाती थी. उसके बाद भी वह अगर सरकार को नाराज़ करने पर अड़ा रहता तो उसे अपना अख़बार छापने से पहले सेंसरशिप के लिए सरकार को सामने रखना होता था."

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