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यूपी बोर्ड में नकल विहीन परीक्षा के बावजूद ऐसा परिणाम?
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
उत्तर प्रदेश में रविवार को हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की बोर्ड परीक्षा के परिणाम आए. सरकार ने परीक्षा से पहले और उसके बाद भी जिस प्रकार नकल विहीन परीक्षा कराने का दावा किया उसके हिसाब से माना जा रहा था कि परिणाम काफी कम आएंगे. लेकिन दोनों परीक्षाओं का औसत प्रतिशत 75 के क़रीब है जो कम नहीं कहा जा सकता.
बोर्ड परीक्षाओं के पहले नकल विहीन परीक्षा कराने संबंधी राज्य सरकार की कोशिशों को देखते हुए लोगों को 1992 की कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार याद आ गई जब हाईस्कूल की परीक्षा में क़रीब 86 फ़ीसद बच्चे फ़ेल हो गए थे और इंटरमीडिएट में भी महज़ तीस प्रतिशत बच्चे पास हो सके थे. लेकिन इस बार नकल विहीन परीक्षा के दावे के बावजूद हाईस्कूल का रिज़ल्ट 75 प्रतिशत और इंटरमीडिएट का रिज़ल्ट 72 प्रतिशत से ज़्यादा रहा.
रिज़ल्ट निकलने के तुरंत बाद शिक्षा मंत्री डॉक्टर दिनेश शर्मा ने इसे सरकार की उपलब्धि बताया तो मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी भी नकल विहीन परीक्षा का श्रेय लेने से नहीं चूके. लेकिन जानकारों का कहना है नकल विहीन परीक्षा और इतनी बड़ी संख्या में छात्रों का पास होना कुछ विरोधाभासी सा लगता है.
हालांकि परीक्षा से पहले ही 11 लाख से ज़्यादा छात्रों ने परीक्षा छोड़ दी थी. इसके पीछे भी परीक्षा में सख़्ती का डर बताया जा रहा है. उपमुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री डॉक्टर दिनेश शर्मा इस बात को कई बार ज़ोर देकर कह चुके हैं. वहीं, शिक्षक विधायक ओम प्रकाश शर्मा कहते हैं कि सख़्ती की वजह से परिणाम में कमी ज़रूर आई है, लेकिन नकल विहीन परीक्षा पर वो भी संदेह जताते हैं.
छात्रों ने छोड़ी परीक्षाएं
ओम प्रकाश शर्मा कहते हैं, "ये परिणाम उन छात्रों के आधार पर आए हैं जो परीक्षा में शामिल हुए. बड़ी संख्या में तो छात्रों ने परीक्षा ही नहीं दी. ठेके पर नकल कराने वाले इस बार परेशान रहे. लेकिन एक बात कहने में मुझे कोई एतराज़ नहीं है कि इसे नकल विहीन कहना ठीक नहीं होगा. ठेके पर नकल कराने वाले लोगों का इस बार भी बोल-बाला था, फ़र्क इतना ही था कि ये लोग या तो सत्तारूढ़ दल के थे या क़रीबी थे या फिर उन्हें ऐसे लोगों का आशीर्वाद मिला हुआ था."
ओम प्रकाश शर्मा ये भी कहते हैं कि लाखों छात्र पिछले सालों में भी बोर्ड परीक्षा छोड़ते रहे हैं, ये ज़रूर है कि इस साल उनकी संख्या कुछ ज़्यादा थी. यहां तक कि 2017 में भी छह लाख से ज़्यादा छात्रों ने बोर्ड परीक्षा छोड़ी थी.
जहां तक परिणाम के प्रतिशत की बात है तो साल 2008 को छोड़कर ये पिछले क़रीब एक दशक से अस्सी प्रतिशत के ऊपर ही रहा है. 2008 में इंटरमीडिएट में सिर्फ़ 65 प्रतिशत छात्र ही उत्तीर्ण हुए थे. जहां तक इस बार यानी 2018 के परिणाम की बात है तो साल 2017 के मुक़ाबले इंटरमीडिएट के परिणाम में दस प्रतिशत और हाईस्कूल के परिणाम में तो महज़ छह प्रतिशत की ही गिरावट आई है.
जानकारों के मुताबिक उत्तीर्ण छात्रों के प्रतिशत में यह गिरावट उस लिहाज़ से बहुत मामूली है जिस तरह से इसे प्रचारित किया गया. लखनऊ में एक इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि 'नकल विहीन परीक्षा' का भय तो छात्रों में ज़रूर था, लेकिन ये भय सिर्फ़ उन छात्रों में था जो आंशिक रूप से नकल करते हैं.
इस बात को समझाते हुए वो कहते हैं, "देखिए, यूपी बोर्ड की नकल के लिए जो बदनामी हुई है, उसकी वजह स्कूलों-कॉलेजों में रेगुलर पढ़ने वाले छात्र नहीं हैं बल्कि कुकुरमुत्ते की तरह उग आए वित्त विहीन कॉलेज हैं. इन कॉलेजों में ठेके पर नकल कराने की प्रथा है जहां छात्र सिर्फ़ नकल के ही भरोसे परीक्षा पास करने की और अधिक अंक लाने की उम्मीद रखते हैं. इनमें कुछ डर गए तो परीक्षा छोड़ गए, जो नहीं डरे वो बैठे और पास हुए."
राजनीतिक डर?
बोर्ड परीक्षा परिणाम को लेकर सोशल मीडिया पर भी काफ़ी चर्चाएं हो रही हैं. कई लोग इससे संबंधित तमाम पोस्ट फ़ेसबुक और ट्विटर पर डाल रहे हैं. गोरखपुर के एक व्यवसायी गौरव दुबे इस परीक्षा परिणाम और राजनीति के बीच संबंध की एक दिलचस्प आशंका जताते हैं, "बोर्ड परीक्षा के दौरान फूलपुर और गोरखपुर के चुनाव हुए थे और बीजेपी हार गई थी. ऐसा लगता है कि कैराना और नूरपुर के उपचुनाव को देखते हुए बच्चों को ज़्यादा संख्या में पास करा दिया गया."
दरअसल, 1992 में यूपी बोर्ड की विवादित नकल अध्यादेश के साथ 'बेहद सख़्त' परीक्षा कराने के बाद 1993 के विधान सभा चुनाव में बीजेपी की हार के तमाम कारणों में से एक ये भी था और ख़ुद शिक्षा मंत्री रहे राजनाथ सिंह भी विधान सभा का चुनाव हार गए थे.
इसलिए जानकारों के मुताबिक, गौरव दुबे जैसे लोगों की बातों को यूं ही ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता. लेकिन सबसे अहम सवाल ये है कि क्या जो भी परीक्षार्थी इस बार पास हुए हैं, वो पिछले सालों की तुलना में इसके असली हक़दार थे या फिर दाल में कुछ काला अब भी है.
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