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क्या एनआईए भी सीबीआई की तरह 'पिंजरे में बंद तोता' है?
- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पांच साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को 'पिंजरे में बंद तोता' और 'मालिक की आवाज़' बताया था.
सवाल है कि चरमपंथी घटनाओं की जांच के लिए बनी राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) भी क्या उसी राह पर है?
मालेगांव, अजमेर दरगाह धमाके जैसी चरमपंथी घटनाओं में दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों से जुड़े अभियुक्तों की "अपर्याप्त सुबूतों की कमी" के कारण ज़मानत, रिहाई, गवाहों के मुकरने के कारण ऐसे सवाल पूछे जा रहे हैं.
2008 मुंबई धमाकों के बाद चरमपंथी घटनाओं की जांच के लिए एनआईए का गठन हुआ था.
एनआईए वेबसाइट के मुताबिक़ अब तक 196 मामलों की जांच या तो जारी है या पूरी कर ली गई है.
'स्टेट क्राइम ब्रांच बन गया है एनआईए'
वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने बीबीसी से कहा, "साल 2008 के अंत में मैंने एनआईए की कल्पना ऐसी एजेंसी के तौर पर की थी जिसकी प्रतिष्ठा स्कॉटलैंड यार्ड, एफ़बीआई जैसी हो लेकिन आज एनआईए और किसी स्टेट क्राइम ब्रांच में कोई फ़र्क नहीं है. मैं बेहद निराश हूँ."
एनआईए की इस तीखी आलोचना के केंद्र में हिंदू चरमपंथियों से जुड़े मामलों का अदालत में हाल और रिहा होते अभियुक्त रहे हैं. ये भी उस दौर में जब केंद्र में हिंदू राष्ट्रवादिता की बात करने वाली नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में है.
हाल ही में एनआईए अदालत ने मक्का मस्जिद धमाके के मामले में स्वामी असीमानंद समेत सभी अभियुक्तों को सुबूतों के अभाव में रिहा कर दिया था.
हिंदू चरमपंथियों से जुड़े मामलों का हाल
हिंदू चरमपंथी संगठनों से जुड़े जिन मामलों की जांच की ज़िम्मेदारी एनआईए को सौंपी गई थी वो थे 2006 में हुए मालेगाँव, 2007 में हुए समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट धमाके, मक्का मस्जिद और अजमेर शरीफ़ धमाके, 2008 में हुए मालेगांव और मोदासा धमाके और आरएसएस प्रचारक सुनील जोशी की हत्या का मामला.
सुनील जोशी की हत्या, मोडासा और अजमेर शरीफ़ और अब मक्का मस्जिद धमाकों पर ट्रायल के बाद फ़ैसले आ चुके हैं.
2006 मालेगांव धमाके के मामले में ट्रायल अभी शुरू नहीं हुआ है. समझौता एक्सप्रेस धमाके में अभी भी ट्रायल जारी है. मक्का मस्जिद धमाकों में सुबूतों के अभाव में स्वामी असीमानंद सहित पांच अभियुक्त निर्दोष पाए गए.
इससे पहले अजमेर दरगाह मामले में असीमानंद को रिहा कर दिया गया था. आरएसएस नेता सुनील जोशी की हत्या मामले में प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत दूसरे अभियुक्तों को रिहा कर दिया गया.
'ये कैसी जांच है?'
याद रहे कि असीमानंद, प्रज्ञा सिंह ठाकुर को पूर्व में जांच एजेंसियों ने ऐसे गुट का सदस्य बताया था जिन्होंने इस्लामी चरमपंथियों के हमलों के जवाब में कार्रवाई की योजना बनाई और उसे अंजाम दिया.
पी चिदंबरम कहते हैं, "अगर आप मक्का मस्जिद मामला देखें तो मुझे बताया गया है कि 64 चश्मदीद अपने बयान से मुकर गए. मुख्य संदिग्ध (स्वामी असीमानंद) ने अपना अपराध स्वीकारा और बयान वापस ले लिया. मुझे बताया गया है कि पुलिस और अदालत के रिकॉर्ड से उसका बयान गायब है. अब पता चल रहा है कि वारदात की जगह से मिली एक लाल शर्ट एनआईए के पास पहुंची ही नहीं. ये कैसी जांच है? ये कैसा अभियोजन पक्ष है?
सवाल ये भी कि एनआईए ने ऊंची अदालत में इन फ़ैसलों या अभियुक्तों की रिहाई का विरोध क्यों नहीं किया?
राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को सालों कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण स्वामी कहते हैं, "अगर एनआईए सुबूतों को लेकर आश्वस्त थी तो वो मामलों को आगे हाईकोर्ट लेकर क्यों नहीं गई. (अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ ऊंची अदालत में जाने के लिए) एजेंसी के पास 90 दिनों का वक़्त होता है."
क्यों मुकर जाते हैं गवाह?
अदालत में अभियोजन पक्ष की हार के पीछे गवाहों का मुकर जाना बड़ा कारण रहा है.
रिपोर्ट्स के मुताबिक़ मक्का मस्जिद मामले में 226 गवाहों में 66 गवाह मुकर गए जबकि अजमेर शरीफ़ में 149 में से 26 गवाह मुकर गए. समझौता एक्सप्रेस धमाका मामले में भी गवाहों का मुकर जाना अभियोग पक्ष की परेशानी का कारण है.
आखिर गवाह क्यों मुकर रहे हैं? और एनआईए क्यों गवाहों को मुकरने से नहीं रोक पा रही है? क्या उन पर कोई दबाव है?
प्रवीण स्वामी कहते हैं, "अभियुक्तों की रिहाई में गवाहों के मुकरने का बहुत बड़ा रोल है. पिछली सरकार के दौरान गवाहों ने मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिए और इस सरकार के दौरान वो मुकर रहे हैं. हम आरोप नहीं लगा सकते लेकिन शक़ तो होगा कि कहीं (उन पर) दबाव तो नहीं था या फिर कोई और बात तो नहीं थी. और अगर उन पर दबाव पड़ रहा है तो एनआईए इस बारे में क्या कर रही है?"
राजनीतिक दखल के आरोप
भारत में जांच एजेंसियों पर राजनीतिक प्रभाव के आरोप नए नहीं हैं. एनआईए पर भी ऐसे आरोप लगते रहे है. कारण रहा है एनआईए के उच्च पदों पर अफ़सरों की नियुक्ति.
पत्रकार प्रवीण स्वामी कहते हैं, "भारत में उच्च अधिकारियों के चुनाव और नियुक्ति की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं है. इस पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश आए हैं लेकिन सरकार ने सिफ़ारिशों पर अमल नहीं किया."
यहां चार नाम महत्वपूर्ण हैं.,यूपीए दौर में बनी एनआईए के प्रमुख रहे राधा विनोद राजू और एससी सिन्हा.
उनके अलावा 2013 में एनआईए प्रमुख बने शरद कुमार और उनके बाद पद संभालने वाले वाईसी मोदी.
जहां राधा विनोद राजू और एससी सिन्हा पर कांग्रेस से नज़दीकी के आरोप लगे, वहीं शरद कुमार और वाईसी मोदी को भाजपा के नज़दीक बताया गया.
प्रवीण स्वामी कहते हैं, "राधा विनोद राजू के बारे में कहा जाता था कि वो गांधी परिवार के करीबी थे. वो राजीव गांधी हत्याकांड मामले की जांच से जुड़े रहे थे जबकि वो अव्वल दर्जे के अफ़सर थे जिन्होंने इस संस्था को खड़ा करने में बढ़िया काम किया. इन दो अफ़सरों (शरद कुमार और वर्तमान एनआईए प्रमुख वाईसी मोदी) के बारे में कहा जाता है कि वो सरकार के नज़दीकी थे लेकिन जब तक इसके सुबूत न मिलें तब तक कुछ कहना ठीक न होगा."
क्यों बनाई गई थी राष्ट्रीय जांच एजेंसी?
मोदी सरकार ने जब एनआईए प्रमुख के तौर पर शरद कुमार का कार्यकाल बढ़ाया तो विपक्ष ने आरोप लगाया था कि इसका कारण हिंदू चरमपंथी संगठनों के ख़िलाफ़ मामलों को कमज़ोर करना था. सरकार ने कहा कि कार्यकाल बढ़ाने के पीछे कारण था कि पठानकोट, उरी हमले आदि की जांच पर असर न पड़े.
आईपीएस अफ़सर वाईसी मोदी उस एसआईटी के सदस्य थे जिसने 2002 गुजरात दंगों की जांच की थी.
शरद कुमार और एससी सिन्हा ने बीबीसी से बात करने से मना कर दिया.
प्रवीण स्वामी कहते हैं, "जब किसी अफ़सर का कार्यकाल बढ़ाया जाता है, या फिर विवादास्पद अफ़सर को वहां लाया जाता है जहां गैर-विवादास्पद उम्मीदवार उपलब्ध हों तो शक़ तो ज़रूर पैदा होता है. एजेंसी के लिए ज़रूरी है नियुक्ति में वक़्त की पाबंदी. सीबीआई का नाम इसलिए खराब हुआ क्योंकि उसमें राजनेता घुसे जा रहे थे. अगर एनआई के साथ ऐसा हुआ तो दुखद होगा."
लेकिन कहानी की गहराई में जाने के लिए हमें एनआईए की स्थापना के दूसरे कारणों को भी समझना होगा. एनआईए की स्थापना से पहले चरमपंथ या आतंकी मामलों की जांच के लिए सीबीआई को राज्य सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी.
राजनीतिक या गैर-राजनीतिक कारणों से अनुमति मिलने में देर हो तो स्थानीय पुलिस जांच को आगे बढ़ाती है.
क्या बाक़ी मामलों में भी रिहा हो जाएंगे अभियुक्त?
एक रिटायर्ड एनआईए अफ़सर के मुताबिक़, "पुलिस की जांच ठीक नहीं होने के कारण जब तक मामला सीबीआई तक पहुंचता, महत्वपूर्ण सुबूतों के साथ पेशेवर व्यवहार नहीं होने के कारण अभियोजन पक्ष के लिए केस जीतना मुश्किल हो जाता था."
एनआईए कानून के अनुसार एजेंसी को किसी मामले को हाथ में लेने के लिए राज्य सरकार की अनुमति की ज़रूरत नहीं होती. उसे ज़रूरत होती है सिर्फ़ केंद्र सरकार की अधिसूचना की.
लेकिन हमसे बात करने वाले रिटायर्ड अधिकारी के मुताबिक़ एनआईए में राजनीतिक प्रभाव से बड़ी समस्या है अच्छे जांच अफ़सरों की कमी और हिंदू चरमपंथी संगठनों से जुड़े मामलों की एनआईए तक पहुंचने में देरी.
वे बताते हैं कि एनआईए में ज़्यादातर अफ़सर डेप्युटेशन पर राज्य पुलिस या केंद्रीय पैरामिलिट्री फ़ोर्सेज़ से लिए जाते हैं जिन्हें बड़े मामलों की जांच की बहुत समझ नहीं होती.
उनके मुताबिक़, "अब आप मक्का मस्जिद धमाकों को ही लें. एनआईए के पास मामला 2011 तक पहुंचा. तब तक धमाकों में चार साल बीत चुके थे. देरी के कारण अब सुबूत जमा नहीं किए जा सकते थे या नहीं किए गए. एनआईए ने सुबूतों की कमी के बावजूद चार्जशीट फ़ाइल कर दी. इसका कारण दबाव, इज़्ज़त बचाना या फिर कुछ भी हो सकता है. मीडिया एनआईए पर राजनीतिक प्रभाव को सबसे बड़ी बात बनाकर पेश करती है लेकिन एनआईए के लिए सबसे बड़ी चुनौती है, खराब जांच."
वे आगे कहते हैं, "मामलों के लंबा खिंचने के कारण गवाह बयानों से मुकर जाते हैं. इसका कारण धन का लालच या कुछ और भी हो सकता है. मुझसे कोई पूछे तो मैं कहूंगा कि अदालत के फ़ैसलों को हाईकोर्ट में चैलेंज करने का कोई फायदा नहीं."
एनआईए में काम कर चुके इस अधिकारी का मानना है कि 'खराब जांच के कारण बाक़ी मामलों में भी अभियुक्त रिहा हो जाएंगे.'
खड़ा रहेगा या ढह जाएगा ये ढांचा?
प्रवीण स्वामी कहते हैं एनआईए ने अभी तक उत्तर पूर्व सहित कई जगहों पर अच्छा काम किया, इसका कन्विक्शन रेट (मामले में फ़ैसला आना) 60 प्रतिशत रहा जो बहुत अच्छा है.
वो कहते हैं, "एनआईए ने जांच में सुबूत आधारित जांच की, फ़ोरेंसिक्स के इस्तेमाल का नया स्टैंडर्ड सेट किया है. आने वाले दिनों में देखना होगा कि ये जो ढांचा खड़ा हुआ है वो क्या सियासी दबावों के चलते खड़ा रह पाएगा या ढह जाएगा."
इस बारे में बीबीसी ने एनआईए डीजी वाईसी मोदी के दफ़्तर को सवाल भेजे लेकिन कोई जवाब नहीं मिल पाया. वाईसी मोदी ने मैसेज कर कहा कि वे देश से बाहर गए हैं.