हम सेक्स नहीं बेचते हैं ये तो बस एक कला है: राकेश

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बिना ओढ़नी के लहंगा-चोली पहने, होंठों पर लिप्सटिक लगाए, आंखों में काजल, माथे पर बिंदी और लंबे बालों में सिर्फ़ एक रबरबैंड लगाए एक शख़्स दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के जेन्ट्स टॉइलट में घुसने की कोशिश कर रहा था.

उस वक़्त रात के तक़रीबन आठ बजे थे. इसी अप्रैल का महीना था.

पीछे से गार्ड की आवाज़ आई, ''सर, आप इसमें नहीं जा सकते.''

वो तुरंत जवाब देता है, "भइया हम हैं, राकेश... पहचाने नहीं क्या? थर्ड इयर स्टूडेंट. अभी हमारा परफ़ॉर्मेंस है. लौंडा नाच कर रहे हैं थिएटर ओलंपिक में.

थिएटर फ़ेस्टिवल

दिल्ली में इस साल पहली बार थिएटर ओलंपिक फेस्टिवल होस्ट किए गए.

इसमें दुनिया के 30 देशों के तक़रीबन 25000 कलाकारों ने हिस्सा लिया.

इसके समापन समारोह में राकेश कुमार के लौंडा नाच के एक परफ़ॉर्मेंस ने सबका दिल जीत लिया.

राकेश दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के छात्र हैं. बिहार के सिवान के रहने वाले हैं. वही एनएसडी जहां से अनुपम खेर, पंकज कपूर, ओम पूरी जैसी नामी हस्तियां पढ़ कर निकली हैं.

जुनून

यहां आने के लिए राकेश को पांच बार लगातार इम्तिहान से गुज़रना पड़ा. लिखित परीक्षा के बाद आखिरी राउंड में वो हमेशा बाहर हो जाते थे. मगर जुनून के आगे भला हार कहीं टिकती है! राकेश का जुनून भी आख़िर उन्हें एनएसडी ले ही आया.

लड़की की वेशभूषा मे राकेश ने दमदार लौंडा नाच किया.

बिहार के ग्रामीण अंचलों में लौंडा नाच बहुत लोकप्रिय है. इसमें स्त्री की वेशभूषा में पुरुष नाचते हैं. ये कलाकार भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर को अपना आदर्श मानते हैं.

उनके नाटक 'बिदेसिया' को राकेश ने अपने गुरु संजय उपाध्याय के साथ कई मंचों पर प्रसारित किया है.

लेकिन ये कला अब धीरे धीरे मरती जा रही है.

एनएसडी और लौंडा नाच

आखिर एनएसडी के मंच पर इस तरह की परफ़ॉर्मेंस की बात राकेश को कैसे सूझी?

इस पर राकेश ने बीबीसी से कहा, "प्रोफेशनली लौंडा नाच करूंगा, ये मैंने खुद भी कभी नहीं सोचा था. जब मैं छोटा था, तो शादी में जाता था वहीं डांस करने वाली लड़कियों के साथ में भी डांस करने से ख़ुद को रोक नहीं पाता था. घर आता, तो बहुत मार पड़ती थी. लेकिन फिर भी मैं नहीं मानता था."

राकेश की मानें तो उनका शौक बस वहीं से शुरू हुआ.

बचपन की एक घटना याद करते हुए वो कहते हैं, "छठीं क्लास में था तो एक बार मैडम ने पूछा कौन कौन नाटक में भाग लेगा हाथ उठाओ. मैंने भाग लिया और लड़की का रोल किया. मेरी परफॉर्मेंस को लोगों ने ख़ूब सराहा. उसके बाद तो मानो मुझे इसकी लत लग गई."

लोकप्रियता

बिहार के ग्रामीण इलाकों में लौंडा नाच की धमक आज भी है. इसमें पुरुष, महिला की तरह सज-धज कर नाचते हैं. लेकिन इसे अश्लील संवाद और इशारों के लिए भी जाना जाता है.

हालांकि लौंडा नाच का एक स्याह पहलू भी है. इसे परफ़ॉर्म करने वाले लड़कों को बुरी नज़र से भी देखा जाता है.

"लौंडा जा ता, माल ठीक बा, चल खोपचा में चल" ऐसे कई कॉमेंट्स ख़ुद राकेश ने ख़ुद भी सुने हैं.

बतौर राकेश इन कॉमेंट्स को सुन कर लगता है मानो लोग सेक्स वर्कर से बात रहे हों.

वो कहते हैं, "हम देह व्यापार थोड़े ही करते हैं! ये तो एक कला है."

लेकिन क्या समाज की तरह परिवार ने भी उनकी इस कला का तिरस्कार किया ?

इस सवाल के जवाब देते समय राकेश के चेहरे की पहली शिकन तुरंत गायब हो जाती है. हंस कर पुराना बचपन का किस्सा सुनाते हैं.

"मेरे परिवार में कभी किसी ने नहीं रोका. मेरे पापा ने तो पहली बार मुझे स्टेज पर आकर इनाम दिया था, वो भी पांच सौ रुपए का. बहुत अच्छा लगा था. मेरे पापा सेना में हैं. दिखने में बहुत सख़्त लगते हैं. लेकिन उन्होंने जब मुझे प्रोत्साहित किया तो मुझे बहुत अच्छा लगा."

लौंडा नाच आख़िर है क्या?

लौंडा नाच दूसरे डांस से अलग कैसे है?

इस सवाल के जवाब में राकेश कहते हैं, "ढोलक बजा के, हार्मोनियम बजा कर, झाल बजा के जब लौंडा कूद कूद के चौकी पर डांस करता है उसमें अलग ही मज़ा होता है."

बचपन से ही मेरा गला सुरीला था, कमर में लचक थी, और मेककप कर नकली ब्रेस्ट लगा कर तो मैं ख़ुद पूरे परफार्मेंस में डूब जाता हूं.

वो मानते हैं कि ये कला अब ख़त्म होने की कगार पर है. अब इस तरह के नाच करने वाले बहुत कम बचे हैं. इसलिए वो चाहते हैं कि ये कला अब न मरे.

वो कहते हैं, "एनएसडी के स्टेज पर इस कला को लाकर मैं एक पहचान दिलाना चाहता हूं ताकि इसे जिंदा रख सकें."

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