You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
अपने बच्चे को पत्थर से क्यों रगड़ती रही एक मां?
- Author, कमलेश और गुरप्रीत कौर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
एक पांच साल का बच्चा जिसके हाथ-पैर पर लगे काले गहरे घाव ऐसे लगते हैं जैसे किसी ने बड़ी बेरहमी से उसके शरीर की खाल उतार दी हो. मानो उसके ज़ख्मों को भरने से पहले ही बार-बार उन्हें खरोंच दिया हो.
उस बच्चे के हाथों की छिली हुई खाल को जब उसकी मौसेरी बहन शोभना ने पहली बार देखा तो वो हैरान रह गई. ये घाव न गिरने के थे न मारने के, फिर ये कहां से आए शोभना सोचती रह गई.
शोभना ने बच्चे से पूछा तो कुछ जवाब नहीं मिला लेकिन उसकी मासूम आंखें कुछ छुपाते हुए झुक गईं. तभी मां ने तुरंत बताया कि वो खेलते हुए गिर गया था. शोभना को यक़ीन तो नहीं हुआ पर बच्चे से ज़्यादा पूछते हुए भी उसे झिझक हुई.
लेकिन, जब बच्चे के घाव बढ़ते गए और शोभना को हर बार वो ताज़े और गहरे दिखे तो वो खुद को रोक नहीं पाईं.
एक दिन मौका पा कर वो बच्चे को आइसक्रीम खिलाने ले गईं ताकि उसके अंदर का डर मिटा सकें. बातों-बातों में शोभना ने बच्चे से सवाल पूछा, "तुम्हारे शरीर पर ये निशान कैसे?
बच्चे ने बहुत मासूमियत से शोभना को बताया, "मेरी मां मुझे नहलाते हुए पत्थर से रगड़ती है. मैं काला हूं न. मां को गोरा बेटा चाहिए था." जवाब सुन कर शोभना दंग रह गई.
बच्चे की आवाज़ में डर और झिझक दोनों था. शोभना के मुताबिक डर की वजह से वह अपने घावों का दर्द भी ठीक से ज़ाहिर नहीं कर पा रहा था.
चाइल्डलाइन में शिकायत
ये पूरी घटना एक अप्रैल की थी. ये वाक़या भोपाल का है. शोभना ने जरा भी इंतज़ार नहीं किया और तुरंत चाइल्डलाइन पर फ़ोन करके बच्चे की हालत बताई.
चाइल्डलाइन ऐसी संस्था है जो छोटे बच्चों को उनके ख़िलाफ़ होने वाले अपराध से बचाती है.
शोभना के फोन से चाइल्डलाइन की टीम तुरंत हरकत में आई और भोपाल के निशातपुरा इलाक़े में उस बच्चे के घर पहुंच गई.
बीबीसी से बात करते हुए चाइल्डलाइन की अधिकारी अर्चना सहाय ने बताया, "जब हम बच्चे के घर पहुंचे तो देखा कि उसके हाथ, पैर, पीठ और पेट पर घाव के ढेरों निशान थे. वह बहुत घबराया हुआ था और कुछ नहीं बोल रहा था.''
अर्चना सहाय ने कहा कि पहले तो लगा मानो ये हाल पड़ोसी ने किया होगा. लेकिन, जब बच्चे ने बताया कि मां ने ही गोरा करने के लिए पत्थर से उसके पूरे शरीर को छील दिया है तो भरोसा नहीं हुआ.
पूरी घटना बताते हुए अर्चना की आवाज में भी गुस्सा और दुख था. बस एक ही बात उनके दिमाग में कौंध रही थी, "आख़िर पांच साल के बच्चे के साथ कोई इतना बेरहम कैसे हो सकता है?"
फिर क्या हुआ?
इस सवाल पर अर्चना का कहना था, ''बच्चे की बात पर यक़ीन करना थोड़ा मुश्किल था. इसलिए हमने बच्चे के मां-बाप से उसकी चोट के बारे में पूछा."
अर्चना के मुताबिक, "पहले तो उन्होंने बहाने बनाने की कोशिश की और गिरने से चोट लगने जैसे कारण बताए. लेकिन, जब हमने सख्ती से पूछा तो बच्चे के पिता टूट गए."
बच्चे के पिता ने चाइल्डलाइन को बताया कि उनकी पत्नी सुनती नहीं है और बच्चे को गोरा करने के लिए पत्थर से रगड़ती है. इसके बाद मां ने भी मान लिया कि वो बच्चे का मैल निकालती है.
आखिर ऐसी मां की मानसिकता कैसी होगी? आख़िर गोरा दिखने के लिए क्या लोग इस हद तक जा सकते हैं?
यही सवाल जब हमने डर्मोटोलॉजिस्ट जयश्री शरद से किया तो उन्होंने कहा, ''गोरेपन की चाहत पूरे देश की समस्या है. लोग इसे जीने-मरने का तक सवाल बना लेते हैं. मेरे पास कई लोग आते हैं जो किसी भी तरह गोरा होना चाहते हैं. उन्हें लगता है कि गोरा होना ही आपको बेहतर बना सकता है."
वो आगे कहती हैं, "इसकी शुरुआत घर से हो जाती है. मां-बाप ही सोचने लगते हैं कि बच्चा काला होगा तो उसकी शादी कैसे होगी. बेटी को लड़का नहीं मिलेगा, दहेज देना होगा. मां-बाप छोटे-छोटे बच्चों तक को गोरा करने के लिए लेकर आते हैं.''
पूरी घटना को सुनने के बाद चाइल्डलाइन की टीम बच्चे को अपने साथ ले गई. हालांकि, इतना कुछ होने के बाद भी बच्चा यही कहता रहा कि मां के साथ अच्छा नहीं हुआ लेकिन वापस घर जाने की बात पर उसने साफ़ इनकार कर दिया.
फिलहाल उसका इलाज़ किया जा रहा है ताकि उसके घाव ठीक हो सकें. इसके बाद बाल कल्याण समिति ही उसे लेकर फैसला करेगी.
गोद लिया था बच्चा
पुलिस ने माता पिता को गिरफ्तार कर लिया है.
निशातपुरा के सिटी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस लोकेश सिन्हा ने बीबीसी को बताया, ''मां बच्चे को गोरा करने के लिए पत्थर से रगड़ती थी. 'माता-पिता पर मारपीट और जुवैनाइल जस्टिस की धाराएं लगाई गई हैं और एफआईआर दर्ज कर ली गई. दोनों को कोर्ट में पेश किया गया था लेकिन अब उनकी जमानत हो चुकी है. इस मामले में माता-पिता को तीन साल की सजा हो सकती है.''
आगे की जांच में पता चला कि निशातपुरा में रहने वाले इस दंपत्ति ने बच्चे को डेढ़ साल पहले उत्तराखंड के एनजीओ मातृछाया से गोद लिया था. 50 साल की उम्र तक भी उनकी कोई औलाद थी और फिर उन्होंने गोद लेने के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन किया.
दोनों पति-पत्नी गोरे हैं शायद इसलिए उन्हें एक गोरे बच्चे की ही तलाश थी. लेकिन, गोद लेने के लिए मिलने वाले तीनों मौकों में उन्हें कोई गोरा बच्चा नहीं मिला.
उन्होंने पहले दो मौकों में दिखाए गए बच्चों को लेने से इनकार कर दिया. पर जब आख़िरी मौका बचा तो उन्हें इस बच्चे को गोद लेना ही पड़ा वरना उन्हें फिर से रजिस्ट्रेशन करके दो-तीन साल इंतजार करना पड़ता.
अर्चना सहाय ने बताया, ''बच्चे की मां शुरू से ही उसे गोरा करना चाहती थी. वो कई तरह की क्रीम का इस्तेमाल करती थी. लेकिन जब क्रीम से बात नहीं बनी तो उन्होंने पत्थर से रगड़ना शुरू कर दिया. गोरे रंग की चाहत उस पर इस तरह सवार हो गई कि वो सोच ही नहीं पाई कि जिसे वो मैल समझकर उतार रही है वो बच्चे की खाल है.''
गोरेपन की दीवानगी सिर्फ आज की बात नहीं है. कई लोग गोरेपन की चाहत में तरह-तरह के क्रीम-पाउडर इस्तेमाल करते हैं. साइड इफेक्ट होने के बावजूद भी उनका गोरेपन का जुनून खत्म नहीं होता.
यही वजह है कि कॉस्मैटिक उत्पादों का बाजार लगातार तेजी से बढ़ रहा है. एसोचैमा और एमआरएसएस इंडिया डॉट कॉम की पिछले साल अक्टूबर में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत का ब्यूटी कॉस्मैटिक और ग्रूमिंग का बाजार वर्तमान के लगभग 4 खरब से बढ़कर साल 2035 तक 22 खरब से ज्यादा होने का अनुमान है.
इस रिपोर्ट के मुताबिक किशोरों में साल 2005 से 2007 के बीच सौंदर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल बढ़ा है. इसकी वजह है कि वो सुंदर दिखना चाहते हैं और 68 प्रतिशत नौजवान सोचते हैं कि इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ जाएगा.
ये भी पढ़ें:
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)