इराक़ में 'इस्लामिक स्टेट' ने भारतीय मजदूरों के सिर में मारी थी गोली

    • Author, अरविंद छाबड़ा
    • पदनाम, संवाददाता, बीबीसी पंजाबी सेवा

गोबिंदर, बलवंत और देविंदर. ये तीन नाम और उनके साथ लिखी उनकी उम्र अलग-अलग ज़रूर है, लेकिन इन सभी की मौत की वजह एक ही है.

सभी के सिर में गोली मारी गई.

आधिकारिक दस्तावेज़ों के अनुसार, इराक़ के मूसल शहर में मारे गए 38 भारतीय मजदूरों मे से अधिकतर की मौत सिर में गोली लगने से हुई थी.

इराक़ सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने फ़ॉरेंसिक डिपार्टमेंट के हवाले से जो जानकारी दी, वो इसकी तस्दीक करती है.

इराक़ की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी के लिए काम करने वाले इन भारतीय मजदूरों को साल 2014 में कथित चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट ने अगवा कर, गोली मार दी थी.

मौत का वक़्त

इन मजदूरों के अवशेष सोमवार को भारत लाए गए और उन्हें उनके परिवारवालों को सौंप दिया गया.

इनमें से कुछ का अंतिम संस्कार सोमवार शाम को ही कर दिया गया, तो कुछ ने मंगलवार को अंतिम क्रिया की.

बीबीसी को इन मजदूरों में से कुछ के मृत्यु प्रमाण-पत्र मिले हैं.

इराक़ की राजधानी बगदाद में भारतीय वाणिज्य दूतावास के एक अधिकारी, उमेश यादव ने इन्हें जारी किया है.

ये मृत्यु प्रमाण-पत्र 28 मार्च, 2018 को जारी किए गए. इनमें मृतकों के नाम, पासपोर्ट नंबर, नागरिकता, मृत्यु की तारीख़ और मौत का कारण लिखा है.

इन मृत्यु प्रमाण-पत्रों के अनुसार, भारतीय मजदूरों की हत्या इराक़ के निनवे प्रांत के वादी अग़ब कस्बे में की गई.

इनमें दिलचस्प बात ये हैं कि कुछ मृत्यु प्रमाण-पत्रों पर मौत का वक़्त भी दिया गया है, जबकि बाकियों पर ऐसा नहीं है.

भारत सरकार ने मृतकों की डीएनए रिपोर्ट और उनके मृत्यु प्रमाण-पत्र संबंधित ज़िला अधिकारियों को सौंप दिए हैं.

बेचैनी और बढ़ी

पंजाब के फगवाड़ा में एक सरकारी अधिकारी ने बताया है कि वो जल्द ही सभी ज़रूरी क़ागज़ात परिजनों को दे देंगे.

मारे गए मजदूरों में से एक देविंदर सिंह की विधवा मंजीत कौर कहती हैं कि जब उन्हें अपने पति की हत्या का तरीक़ा मालूम पड़ा, तो उनकी बेचैनी और बढ़ गई.

मंजीत कहती हैं, "मेरे पति की उन लोगों से क्या दुश्मनी थी जो उन्होंने इतनी बुरी तरह उनकी हत्या की."

देविंदर सिंह के अवशेष मंगलवार सुबह ही उनके घर पहुँचे और दोपहर तक उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया.

27 मजदूर पंजाब से थे

उनके 14 साल के बेटे बलराज सिंह ने उनका अंतिम संस्कार किया. साल 2011 में जब उनके पिता रोज़गार की तलाश में इराक़ गए थे, तब बलराज महज़ सात साल के थे.

अंतिम क्रिया के दौरान देविंदर सिंह के आठ साल के जुड़वा बेटे भी चिता के क़रीब ही खड़े रो रहे थे.

मारे गए 38 भारतीय मजदूरों में से 27 पंजाब से थे.

सभी ग़रीब परिवार से वास्ता रखते थे और रोज़गार की तलाश में एक कंस्ट्रक्शन कंपनी के लिए काम करने इराक़ गए थे.

जहां कथित इस्लामिक स्टेट के चरमपंथियों ने उनकी हत्या कर दी.

कई तरह की ख़बरें आती रहीं

करीब चार साल तक इन लापता भारतीयों के बारे में अलग-अलग तरह की ख़बरें आती रहीं. भारत सरकार ने भी कई मर्तबा कहा कि लापता भारतीय ज़िंदा हैं.

लेकिन पिछले महीने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने राज्यसभा में बताया कि इराक़ में 2014 में लापता हुए 40 भारतीयों में से 39 मारे गए हैं. उन्होंने कहा कि ये चरमपंथी संगठन आईएसआईएस के हाथों मारे गए.

इसके बाद विदेश राज्य मंत्री वी के सिंह भारतीयों के शवों के अवशेष लेने इराक़ गए थे.

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