इस मामले में भारत से बेहतर है पाकिस्तान

    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

देश की राजधानी दिल्ली से लेकर अलग-अलग हिस्सों में पत्रकार माफिया और प्रशासन के सामने ख़ुद को असुरक्षित पा रहे हैं.

बिहार के आरा में एक हिंदी अख़बार के पत्रकार नवीन निश्चल और उनके सहयोगी की 'गाड़ी से टक्कर' में मौत हो गई.

मध्य प्रदेश के भिंड में खनन माफिया पर रिपोर्ट करने वाले पत्रकार संदीप शर्मा की ट्रक से टक्कर में मौत हो गई.

देश की राजधानी दिल्ली हाल ही में तीन ऐसी घटनाओं की गवाह बन चुकी है जब पत्रकारों और फ़ोटोग्राफ़रों को अपना काम करने के लिए हिंसा का सामना करना पड़ा.

इसमें पटियाला हाउस कोर्ट में वकीलों के समूह द्वारा पत्रकारों पर हमले, दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस से मार खाने और अब जेएनयू स्टूडेंट्स के प्रदर्शन में पत्रकारों के साथ पुलिस द्वारा अभद्रता किया जाना शामिल है.

इन हमलों के ख़िलाफ़ दिल्ली में पत्रकारों के समूह ने एक विरोध मार्च निकाला है. हालांकि, इससे पहले भी पटियाला हाई कोर्ट में पीटे जाने के बाद पत्रकार मार्च निकाल चुके हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि भारत में बड़े शहरों से लेकर छोटे शहरों तक में पत्रकारों के लिए काम करना कितना मुश्किल हो गया है.

भारत में पत्रकारों की सुरक्षा का स्तर

पत्रकारों की सुरक्षा पर नज़र रखने वाली संस्था रिपोर्टर विदआउट बॉर्डर हर साल दुनिया भर के देशों के पत्रकारों की सुरक्षा के आधार पर रैंकिंग जारी करती है.

इस रैंकिंग के हिसाब से सबसे ऊपर रहने वाले देश में पत्रकार सबसे ज़्यादा सुरक्षित और सबसे पीछे रहने वाले देशों में पत्रकार सबसे असुरक्षित माने जाते हैं.

साल 2017 में भारत इस रैंकिंग में 136वें नंबर पर था, लेकिन बीते साल भारत का स्थान 133वें नंबर पर था.

वहीं, इसी रैंकिंग के आधार पर साल 2017 में पाकिस्तान की जगह 139वें स्थान पर थी जबकि 2016 में पाकिस्तान का स्थान 147 था.

ये साल 2017 के आंकड़े हैं. अगर दस साल पहले 2007 के आंकड़ों पर नज़र डालें तो तब भारत इस रैंकिंग में 120वें नंबर पर था. वहीं, तब पाकिस्तान 152वें नंबर पर था.

साल 2017 में रैंकिंग के लिहाज से नॉर्वे सबसे पहले नंबर पर और उत्तर कोरिया 180वें स्थान के साथ आख़िरी पायदान पर है.

भारत में पत्रकारों की सुरक्षा पर सत्ता का रुख़

प्रेस असोशिएसन ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष जयशंकर गुप्ता ने इस मामले पर बीबीसी संवाददाता मोहम्मद शाहिद से बात की.

वो बताते हैं, "भारत में पत्रकारों की स्थिति बेहद ख़राब है. दिल्ली में जहां गृह मंत्री बैठे हैं वहां दिल्ली पुलिस ने जिस तरह जवाहरलाल नेहरू के छात्र-छात्राओं पर हमले की कवरेज करने वाले पत्रकारों और फोटोग्राफ़रों पर हमले किए, यहां तक की एक महिला पत्रकारों के साथ बदसलूकी की गई.''

उन्होंने कहा, ''इसके बाद जब पत्रकारों ने विरोध किया तो सिर्फ एक कॉन्स्टेबल को सस्पेंड करके इति श्री कर ली गई. इन्होंने गृह मंत्री से मुलाक़ात की तब भी कोई समाधान नहीं निकला. ये सबसे आश्चर्यजनक है कि ये जो लाठीचार्ज हुआ उसके लिए मैजिस्ट्रेट की इजाज़त नहीं थी.''

"इसके चार-पांच दिन पहले लाजपत नगर में सीलिंग का विरोध कर रहे व्यापारियों की तस्वीरें लेने वाले फोटोग्राफ़र को पीटा गया. कल सारे पत्रकारों ने अपने कैमरे डाउन कर दिए, ज़मीन पर रखकर विरोध किया. लेकिन इसका भी कोई असर नहीं हो रहा है. बिहार में अभी दो पत्रकारों को कुचलकर मार दिया गया. इसके पहले सीवान में एक पत्रकार की हत्या कर दी गई. भिंड में भी हमले हुए. देश के अलग-अलग हिस्से से ऐसी ख़बरें आ रही हैं. ऐसा लगता कि पत्रकारों का काम करना जोखिम का काम हो गया है."

क्या है पत्रकारों की मांग?

गुप्ता बताते हैं, "हम चाहते हैं कि जब पुलिस के कर्मचारी ऑन ड्यूटी होता है और उन पर हमला होता है तो हमलावर के ख़िलाफ़ ग़ैर-ज़मानती धारा के तहत गिरफ़्तारी होती है. इसी तरह से जब पत्रकार या छायाकार ऑन ड्यूटी होता है और उस पर हमला होता है तो हमलावर के ख़िलाफ़ गैर जमानती वॉरंट जारी होना चाहिए. एफआईआर होना चाहिए."

"हालिया मामले में लड़कियों के साथ जो अभद्रता की गई है तो पुलिस वाले ने कहा कि पुलिस ने समझा कि वो पत्रकार नहीं है, कोई छात्रा है. ऐसे में छात्रा के स्तन दबाने का अधिकार पुलिस को किसने दे दिया है. ये सबसे बड़ी सोचने वाली बात है हम किसी लोकतंत्र में जी रहे हैं या तालिबानी हुकूमत में जी रहे हैं. ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है."

प्रेस एसोशिएसन ऑफ़ इंडिया क्या कर रहा है?

जयशंकर गुप्ता ने बीबीसी को बताया, "प्रेस असोशिएसन ने इसका पुरजोर विरोध किया है. आज जो प्रदर्शन किया गया है उसमें सारे संगठन शामिल थे. इसमें महिला पत्रकारों के संगठन, प्रेस क्लब के पत्रकार शामिल थे. आज हमने संसद के गेट तक जाकर प्रदर्शन किया. उसके आगे जाने की अनुमति नहीं दी गई. इस लड़ाई को हम आगे लेकर जाएंगे. ये हो सकता है कि संसद के अंदर जाते समय काले बिल्ले और काले फीते लगाकर जाएं.

"पत्रकारों के विरोध की एक सीमा होती है. उससे आगे हम क्या कर सकते हैं. लेकिन लोकतंत्र में जितनी सीमा होगी उतना विरोध हम करेंगे. सरकार ने जिस तरह प्रेस की स्वतंत्रता पर जो हमला शुरू किया है. नेशनल मीडिया सेंटर में प्रेस एसोशिएसन का जो ऑफ़िस है, सरकार ने उसे खाली करने का एक तरफा आदेश कर दिया है. हाईकोर्ट ने हमें इस मामले में स्टे दिया हुआ है."

"सेंटर प्रेस एक्रिडिएशन कमेटी होती है जिसमें सारे संघों और एसोशिएसनों के प्रतिनिधि शामिल किए जाते हैं. सरकार ने इस पर क्लेम मांगा था. और हमारे दावे की सुनवाई करने की जगह पांच-सात लोगों की एक कमेटी अपने आप से बना ली. ऐसे में सरकार यूनियनों और एसोसिएशनों को धता बताकर ये सरकार एकतरफा फैसले कर रही है. ऐसे में प्रेस की स्वतंत्रता पर पूरी तरह से हमले हो रहे हैं."

पत्रकारों पर हमले से जुड़े मामलों में क्या हो?

गुप्ता कहते हैं, "पहली बात ये जांच होनी चाहिए कि लाजपत नगर या जेएनयू मामले में जो पत्रकारों पर हमले हुए, उसमें किसी मजिस्ट्रेट ने आदेश दिया था या नहीं. अगर ऐसा नहीं हुआ था तो इसे आपराधिक काम माना जाना चाहिए. और इसमें जो भी शामिल हैं. मौके पर जो भी एसीपी या एसएचओ रहा हो और जो भी पुलिस अधिकारी रहे हों उन पर आपराधिक मामले दर्ज होने चाहिए. हमने कहा कि महिला पत्रकार के साथ जो अश्लील हरकत की गई उसमें अश्लीलता के आरोप में मुकदमा किया जाना चाहिए."

अगर हालिया मामलों की बात करें तो मध्य प्रदेश के भिंड में मरने वाले पत्रकार संदीप शर्मा ने रेत माफिया से जुड़े एक मामले का ख़ुलासा किया था.

रिपोर्टर विदआउट बॉर्डर ने इसी मुद्दे पर साल 2016 में एक रिपोर्टर प्रकाशित की थी.

इस रिपोर्ट में संस्था के महासचिव क्रिस्टोफर डेलोयर ने साल 2016 में प्रकाशित अपनी एक रिपोर्ट में कहा है, "जलवायु परिवर्तन पर पैरिस समझौते के दौर में हमें ये समझने की ज़रूरत है कि जलवायु परिवर्तन और उसके नुकसानों से जुड़े सच को सामने लाने वालों को अक्सर गंभीर परिणाम भुगतने होते हैं. अगर हम दुनिया के लिए पैदा हो रहे ख़तरों से दुनिया को अवगत कराना चाहते हैं तो इसमें ऐसे पत्रकारों का मेहनत भरा और ख़तरनाक काम बेहद अहम है."

बीते साल दिसंबर में अंग्रेजी अख़बार द गार्जियन में प्रकाशित हुई एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में क्षेत्रीय भाषाओं में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार सबसे ज़्यादा ख़तरे की ज़द में रहते हैं क्योंकि वे कम चर्चित होते हैं. साल 2017 में बेंगलुरु में एक पत्रकार गौरी लंकेश को उनके घर के बाहर ही गोली मार दी गई. इसी तरह त्रिपुरा में एक क्राइम रिपोर्टर सुदीप दत्ता भौमिक की हत्या कर दी गई थी. इसके बाद कई अख़बारों ने इसके विरोध में अपने संपादकीय हिस्से को खाली छोड़ दिया था.

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