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अन्ना के आंदोलन में वो जादू नहीं, क्या कोई षड्यंत्र!
- Author, नवीन नेगी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क्या आपको सात साल पहले का रामलीला मैदान याद है, क्या आपके मन-मस्तिष्क में जनलोकपाल की वो मांगें ताज़ा हैं, क्या आपकी नज़रों में मंच पर बैठी अनशन करती वो बूढ़ी काया अभी भी समाई हुई है जिसने पूरे देश में एक जनआंदोलन पैदा कर दिया था...
शायद आप ये सब भूल गए हों, सात साल का वक्त होता भी बहुत लंबा है, इस दौरान देश की सत्ता बदल गई, रामलीला मैदान में आंदोलन करने वाले साथी बदल गए, देश में 2जी घोटाला अब कथित तौर पर घोटाला नहीं रहा, कितना कुछ बदल गया.
सात साल बाद एक बार फिर वही बूढ़ी काया जिसका नाम किसन बाबूराव हज़ारे है, जिसे हम अन्ना हज़ारे के नाम से जानते हैं, वो उसी रामलीला मैदान पर आमरण अनशन के लिए बैठे हैं, मांगें वही सात साल पुरानी, भ्रष्टाचार निवारण के लिए जनलोकपाल बिल लाना, लोकायुक्त की नियुक्ति और किसानों के लिए स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करना.
मैदान के बाहर ये भीड़ कैसी?
रामलीला मैदान के बाहर एक बड़ी भीड़ नज़र आती है, दूर से ही शोर शराबा और गानों की आवाजें सुनाई पड़ती हैं, लगता है कि अन्ना के आंदोलन में फिर से वही जनसैलाब उमड़ रहा है, लेकिन मैदान के गेट पर पहुंच कर नज़ारा बदला हुआ दिखता है.
बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के लोग यहां राम नवमी का आयोजन करते दिखाई देते हैं. वे बड़े-बड़े ट्रकों में ऊंची आवाज़ में डीजे पर भक्ति संगीत के पॉप वर्ज़न पर नाचते हुए दिखते हैं.
कुछ युवाओं के हाथों तलवारें भी हैं, राम मंदिर बनाने के नारे लगाए जाते हैं, मेक इन इंडिया का शेर और कुछ भारत निर्मित मिसाइलों के डमी रामलीला मैदान में हमारा स्वागत करते हैं.
अन्ना के आंदोलन का हाल?
गेट पर मौजूद भीड़ से छंटकर जब हम अन्ना के आंदोलन की ओर रुख़ करते हैं तो सिर पर 'मैं अन्ना हूं' लिखी सफ़ेद टोपियां पहने धूप से बचने की कोशिश करते कुछ लोग नज़र आते हैं.
मैदान आधे से ज़्यादा खाली पड़ा है, लोग वहां लेटे हुए सुस्ता रहे हैं, शायद दूर से आने की थकान मिटा रहे हों. हमारे हाथों में माइक देख वे थोड़ा संभलकर बैठने लगते हैं.
यह सवाल कि 'आप लोग कहां से आए हैं और आपकी मांगें क्या हैं', कुछ देर बाद अपना वज़ूद खोता हुआ महसूस होता है क्योंकि मैदान में मौजूद तमाम लोगों की अलग-अलग मांगे हैं, वे अन्ना के सामने उन्हें रखना चाहते हैं.
पीएसीएल कंपनी से जुड़े कुछ लोग मैदान में मौजूद हैं, वे बताते हैं कि उन्होंने पीएसीएल समूह में निवेश किया है, लेकिन बदले में उन्हें कुछ भी रीफ़ंड नहीं मिला.
वे कहते हैं कि उनका करोड़ों रुपया डूब गया. ये लोग अपने पैसों की वापसी की उम्मीद के साथ यहां आए हैं. अन्ना ने कहा है कि वे मंच से उनकी परेशानियां दोहराएंगे.
एक बुज़ुर्ग महिला बिहार के दरभंगा से आई हैं, वो सा़फ हिंदी नहीं बोल पातीं लेकिन इतना समझा देती हैं कि उनकी पेंशन लंबे वक्त से अटकी पड़ी है, वह उसे दोबारा शुरू करवाने के लिए यहां बैठी हैं. हमारे आगे हाथ जोड़ते हुए वो कहती हैं कि उनकी पेंशन वाली बात हम बड़े मंत्रियों तक ज़रूर पहुंचा दें.
किसानों का समर्थन?
अन्ना के इस आंदोलन में सबसे अहम बात जो नज़र आती है वह है किसान संगठनों का समर्थन. अलग-अलग राज्यों से आए किसान संगठन यहां बैठे हैं.
उनका कहना है कि वे अन्ना आंदोलन के ज़रिए कर्ज़ माफ़ी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने की बात उठाना चाहते हैं.
ये किसान हरियाणा, पंजाब, मध्यप्रदेश, राजस्थान जैसे अलग-अलग राज्यों से आए हैं. सभी का दावा है कि वे हज़ारों की संख्या में इस आंदोलन में हिस्सा लेने आ रहे हैं, हालांकि मैदान पर मौजूद बमुश्किल 1500 लोगों की भीड़ उनके दावों से कोसों दूर नज़र आती है.
इस बार अन्ना के मंच से ही सटकर एक अलग मंच भी बना है जिस पर किसान आंदोलन से जुड़े कुछ बैठे दिखाई देते हैं, अन्ना भी अपने भाषण में किसानों की बात रखते हैं. वे कहते हैं कि देश भर का किसान परेशान है, मोदी सरकार अपने वायदे पूरे नहीं कर रही, उसे किसानों की फ़िक्र नहीं है.
'सरकार आंदोलनकारियों को रोक रही है'
इस बार आंदोलन में पहले जैसी भीड़ नहीं दिख रही, यह बात अन्ना भी मानते हैं. वे कहते हैं कि लोग आंदोलन में शामिल होना तो चाहते हैं, लेकिन सरकार उन्हें रोक रही है. वह गाड़ियों को समय पर नहीं चलने दे रही, लोगों पर पानी की बौछार मारकर उन्हें आगे नहीं बढ़ने दिया जा रहा.
उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले से आंदोलन में शामिल होने आए एक युवा ने भी यह बात बताई, उन्होंने कहा कि वे जिस ट्रेन में बैठकर आंदोलन में शामिल होने आए हैं, रास्ते में उन्हें परेशान किया गया, कहा गया कि आंदोलन में शामिल होने ना जाएं.
इस युवा की बात का समर्थन आसपास मौजूद कई दूसरे लोग भी करते हैं, वे ख़ुद को किसान बताते हैं और कहते हैं कि उन्हें आंदोलन में शामिल होने से रोका जा रहा था, उनका कहना है कि अभी कई हज़ार किसान रास्ते में हैं जो आंदोलन में शामिल होना चाहते हैं.
वे कौन लोग हैं जो लोगों को आंदोलन में आने से रोक रहे हैं, इस सवाल का जवाब ना तो वह युवक दे पाता है ना ही ख़ुद को किसान कहने वाले बाकी लोग.
आंदोलन में कम भीड़ के पीछे अन्ना भी यही वजह बताते हैं. वे कहते हैं कि बहुत से किसानों ने उन्हें आंदोलन में शामिल होने के लिए संपर्क किया है, लेकिन सरकार उन्हें यहां पहुंचने से रोक रही है. अन्ना कहते हैं कि अलग-अलग राज्यों में जिन किसानों को दिल्ली पहुंचने से रोका गया है उन्होंने अपने राज्यों में ही अनशन शुरू कर दिया है.
इसके अलावा आंदोलन में कम भीड़ के पीछे वे एक और वजह बताते हैं. अन्ना कहते हैं कि पिछली बार आंदोलन में राजनीतिक लोग शामिल हो गए थे, वो सब कूड़ा करकट था, इस बार ऐसा कुछ नहीं है, कोई राजनीतिक व्यक्ति आंदोलन में नहीं है इसलिए मैदान भी खाली-खाली दिखता है.
हालांकि वे उम्मीद जताते हैं कि आने वाले दिनों में यह भीड़ बढ़ जाएगी, लोगों का समर्थन पिछली बार से ज़्यादा मिलेगा क्योंकि इस बार वे अपनी मांगों पर सिर्फ़ आश्वासन लेकर नहीं उठेंगे, जब तक सरकार उनकी सभी मांगों को पुख्ता तौर पर लागू नहीं कर देती वे नहीं उठेंगे, इस बार धोखा नहीं खाएंगे.
'केजरीवाल पार्टी बर्ख़ास्त करें तो स्वागत है'
पिछली बार अन्ना के आंदोलन का सबसे प्रमुख चेहरा थे अरविंद केजरीवाल. उस आंदोलन की पूरी कमान एक तरह से केजरीवाल के हाथों में नज़र आती थी. वे मंच का संचालन भी करते थे, मीडिया को आकर्षक बयान भी देते थे और सरकारों पर चोट करने वाले सवाल भी पूछते थे.
लेकिन अब केजरीवाल ख़ुद सरकार में हैं, आंदोलन के बाद राजनीति का रास्ता अपनाते हुए वे दिल्ली के मुख्यमंत्री बन चुके हैं. आंदोलन के तमाम साथी ना सिर्फ़ अलग-थलग हो गए बल्कि एक-दूसरे के धुर विरोधी भी बन चुके हैं.
लेकिन अन्ना के सामने सवाल बार-बार केजरीवाल का ही पूछा जाता है. अगर केजरीवाल माफी मांगते हैं तो क्या उन्हें दोबारा मंच पर आने देंगे?
इस सवाल पर अन्ना मुस्कुराते हैं और धीमे से कहते हैं 'वैसे तो वह माफ़ी नहीं मांगेंगे...' फिर कुछ सोचकर कहते हैं, 'हां! अगर केजरीवाल अपनी पार्टी को बर्ख़ास्त कर दें और राजनीति छोड़ दें तो उनका मंच पर स्वागत है'
लोग तालियां बजाने लगते हैं, अन्ना के आंदोलन की दूसरी शाम गहराने लगती है, मंच से महात्मा गांधी का प्रिय संगीत 'रघुपति राघव राजा राम' बजने लगता है...
बहुत देर से तिरंगा लहराते बुज़ुर्ग अब बैठ जाते हैं, शाम को भीड़ थोड़ी बढ़ी हुई दिखती है, शायद यहां-वहां से आए लोग अब सोने की चाहत में इस आंदोलन के टेंट के नीचे आ रहे हों.
ऐसा लगने लगता है जैसे, शाम के वक्त थोड़ी सी बढ़ी हुई महसूस होती यह भीड़ शायद अगले दिन के सवेरे के लिए कुछ उम्मीदें जगा रही हो.