You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
मायावती ने ऐसा क्या कह दिया कि मोदी-शाह की नींद उड़ जाएगी?
- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
राज्यसभा सीट पर बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार की हार के बाद मायावती ने कहा कि "जीत के बाद रात भर लड्डू खा रहे होंगे लेकिन मेरे प्रेस कॉन्फ़्रेंस के बाद बीजेपी वालों को फिर नींद नहीं आएगी."
उन्होंने ऐसा दावा क्यों किया और उनके दावे में कितना दम है?
सपा-बसपा और कांग्रेस की साझा कोशिश को नाकाम करके भाजपा ने उम्मीद से एक राज्यसभा सीट ज़्यादा झटक ली, फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में मिली हार से फैली मायूसी को दूर करने के लिए बीजेपी इस जीत पर जश्न मना रही है.
मायावती ने कहा कि अपने उम्मीदवार भीमराव आंबेडकर की हार के बाद भी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर उनका पूरा भरोसा कायम है, लखनऊ में उन्होंने कहा कि 2019 के चुनाव में महागठबंधन कायम रहेगा.
मायावती की प्रेस कांफ्रेंस के बाद समाजवादी पार्टी की ओर से यूपी विधानसभा में विपक्ष के नेता राम गोविंद चौधरी ने कहा, "भारतीय जनता पार्टी की सरकार चाहे वो यूपी में हो या फिर केंद्र में हो, वह एक के बाद एक करके दलित-पिछड़ा, आदिवासी, वनवासी और अल्पसंख्यकों के हितों को नुकसान पहुंचा रही है, ऐसे में समय की जरूरत है कि पिछड़े और अल्पसंख्यकों की राजनीति करने वाले एक मंच पर आ जाएं."
वैसे सपा-बसपा गठबंधन की सुगबुगाहट गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों के उप-चुनाव के दौरान बहुजन समाज पार्टी के समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों को समर्थन देने की घोषणा के बाद ही शुरू हो गई थी.
गठबंधन के खेमे में 50 फ़ीसदी वोट
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस गठबंधन की राजनीतिक ताक़त क्या है, इसका अंदाज़ा लोगों को गोरखपुर और फूलपुर उप-चुनाव के नतीजों ने बताया था. लेकिन अगर पूरे यूपी में इसके संभावित असर की बात करें तो 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान बसपा को करीब 22 फ़ीसदी वोट मिले थे, जबकि सपा-कांग्रेस गठबंधन को करीब 28 फ़ीसदी.
अगर इन तीनों को एक साथ मिला दिया जाए तो गठबंधन के खेमे में 50 फ़ीसदी वोट आते हैं, इस वोट बैंक को शायद किसी भी चुनावी मैदान में हराया नहीं जा सकता है.
यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने लगातार कोशिश की कि सपा-बसपा गठबंधन की बात परवान नहीं चढ़े. राज्यसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद योगी आदित्यनाथ ने अपने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस गठबंधन के टायर को पंक्चर करने की कोशिश करते हुए कहा कि "सपा का अवसरवादी चेहरा एक बार फिर दिखा, वह दूसरों से ले तो सकती है लेकिन दे नहीं सकती."
योगी आदित्यनाथ ने ये भी इशारा किया समझदार को पहले संभल जाना चाहिए, उनके बयान से ज़ाहिर है कि वो चाहते थे कि बसपा और सपा के बीच गठबंधन की बात शुरू होने से पहले ही अविश्वास का माहौल बन जाए.
लेकिन ऐसा होने के बजाए, मायावती ने गेस्ट हाउस कांड की याद दिलाने वालों को भी कहा कि उस वक्त अखिलेश यादव राजनीति में नहीं आए थे और जिस पुलिस अधिकारी की उपस्थिति में वो कांड हुआ था, उस अधिकारी को बीजेपी की सरकार ने यूपी का पुलिस महानिदेशक बनाया हुआ है.
समाजवादी पार्टी के नेता अभिषेक मिश्रा योगी आदित्यनाथ के बयान को अनैतिक बताते हुए कहते हैं, "हमारी पार्टी के पास जितने अतिरिक्त वोट थे, वो हमने बीएसपी को दे दिए. हम दूसरों के वोट उनकी तरह ख़रीद फरोख्त करके कहां से लाते?"
'गठबंधन होने पर बीजेपी हो जाएगी शून्य'
समाजवादी पार्टी के अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ के अध्यक्ष सर्वेश आंबेडकर ने कहा, "मुख्यमंत्री के बयान को आप बीजेपी का डर कह सकते हैं क्योंकि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन होने पर 2019 के आम चुनाव में बीजेपी शून्य तक पहुंच सकती है."
लखनऊ में तीन दशक तक पत्रकारिता कर चुके वरिष्ठ पत्रकार अंबिकानंद सहाय ने बताया, "जिन लोगों को यूपी की ज़मीनी राजनीति की समझ है उन्हें मालूम है कि सपा-बसपा गठबंधन होने का मतलब क्या है. 1993 में मुलायम सिंह और कांशीराम जब मिले थे तब जय श्रीराम वाकई हवा में उड़ गया था."
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी राज्यसभा चुनाव के जोड़-तोड़ के बीच अनौपचारिक बातचीत में माना है कि गठबंधन को आगे बढ़ाने के लिए काम किया जा रहा है.
ऐसे में समझना मुश्किल नहीं है कि 2019 में उत्तर प्रदेश बेहद अहम रहने वाला है.
2014 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में इस राज्य की 73 लोक सभा सीटों पर जीत की अहम भूमिका रही. ऐसे में सपा-बसपा गठबंधन होने की सूरत में इस राज्य में पार्टी किसी भी सूरत में इतनी सीटें जीत नहीं पाएगी.
सर्वेश आंबेडकर कहते हैं, "सपा-बसपा गठबंधन का असर केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं दिखेगा. बल्कि मध्य प्रदेश, गुजरात और बिहार में भी भारतीय जनता पार्टी की सीटें कम होंगी."
वहीं अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "सपा-बसपा गठबंधन होने से केंद्रीय स्तर पर विपक्ष का मोर्चा बन पाएगा. इन दोनों के बिना कोई मोर्चा कामयाब नहीं होगा. अब जब ये दोनों साथ आ रहे हैं तो तय मानिए केंद्र की मौजूदा मोदी सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो गई है."
2014 में जिस तरह से अति पिछड़ा और दलितों का एक बड़े तबके का वोट भारतीय जनता पार्टी को मिला था, ऐसे में क्या मोदी का जादू इन समुदायों पर एक बार फिर चल पाएगा?
सर्वेश आंबेडकर कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी अपनी ओर से कोशिश तो करेगी ही, लेकिन उनकी ओर से दलितों और पिछड़ों के लिए जिन योजनाओं की बात प्रचारित की जा रही है, उन सबका सच आम लोगों के सामने आ रहा है.
योगी आदित्यनाथ ने भी यूपी विधानसभा में बीते गुरुवार को अति पिछड़ा और दलितों के लिए नई योजनाओं को लागू करने का भरोसा दिया है.
राम गोविंद चौधरी कहते हैं, "देखिए लोगों में इतनी नाराज़गी है कि बीजेपी अपना गढ़ गोरखपुर नहीं बचा पाई. 170 से ज़्यादा ईवीएम मशीनों के साथ छेड़छाड़ नहीं की गई होती तो हमारी जीत का अंतर काफ़ी ज्यादा होता. अब यही स्थिति पूरे प्रदेश में होगी."
हालांकि, योगी आदित्यनाथ के नज़दीकी एवं डुमरियांगज से बीजेपी के विधायक राघवेंद्र प्रताप सिंह को भरोसा है कि नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ की जोड़ी का करिश्मा 2019 में भी कायम रहेगा, थोड़ा नुकसान ज़रूर होगा लेकिन ये बहुत ज़्यादा नहीं होगा.
अंबिकानंद सहाय कहते हैं कि अखिलेश यादव की सरकार ने जिस तरह का विकास किया था, उसका असर तो अभी यूपी के लोगों में है जबकि नरेंद्र मोदी ने जितने वादे किए उनमें बहुतों को अब तक पूरा नहीं किया जा सका है, उन्हें पूरा करने के लिए अब समय भी नहीं है.
एक बात ये भी कही जा रही है कि क्या समाजवादी पार्टी का कोर वोट बैंक यादव-मुस्लिम और बहुजन समाज पार्टी का कोर वोट बैंक जाटव समुदाय आपस में एक मंच पर आ पाएगा. राम गोविंद चौधरी के मुताबिक इसका जवाब गोरखपुर और फूलपुर में मिल चुका है, जब सपा-बसपा के कार्यकर्ता एकसाथ जश्न मनाते नज़र आए थे.
कैसे होगा सीटों का बंटवारा?
अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "इस लिहाज़ से ये गठबंधन मुलायम-कांशीराम के गठबंधन से बिलकुल अलग है, उस वक्त शीर्ष नेताओं ने एक होने का फ़ैसला लिया था, इस बार शीर्ष नेताओं पर अपने कार्यकर्ताओं का दबाव है, जो उन्हें करीब ले आया है."
कई विश्लेषक इस गठबंधन को सामाजिक गठजोड़ के तौर पर भी देख रहे हैं.
सोशलिस्ट फैक्टर के संपादक एवं अखिलेश यादव की जीवनी टीपू स्टोरी के लेखक फ्रैंक हुज़ूर कहते हैं, "सपा-बसपा गठबंधन से बहुजन की लड़ाई मज़बूत होगी. पिछड़ों, दलितों और पसमांदा मुस्लिमों को आबादी के हिसाब से प्रतिनिधित्व दिए जाने की शुरुआत होगी, जिससे देश की बहुसंख्यक आबादी को विकास की मुख्यधारा में जोड़ना संभव होगा. इस एक क़दम का असर आने वाले कई दशकों तक देश की राजनीति को प्रभावित करने वाला है."
हालांकि, इन सबके बीच इस गठबंधन को लेकर एक व्यवहारिक सवाल बना हुआ है, गठबंधन होने की सूरत में सीटों का बंटवारा किस तरह से होगा. रामगोविंद चौधरी कहते हैं, "समय आने पर उसका रास्ता निकल आएगा. कहीं कोई समस्या नहीं रहेगी."
अखिलेश यादव भी आपसी तालमेल से इस समस्या का हल निकालने की बात करते हैं लेकिन चूंकि चुनाव बहुत दूर नहीं रह गए हैं लिहाज़ा सपा-बसपा-कांग्रेस को आपस में मिलकर सीटों के बंटवारों की बात को अंतिम रूप देने पर ध्यान चाहिए.
इन तीन दलों के साथ राष्ट्रीय लोकदल और निषाद पार्टी भी खड़े हैं ऐसे में 80 सीटों पर किसी भी बंटवारे से टिकट नहीं मिलने से नाराज़ नेता, चुनाव मैदान में बागी होकर उतर सकते हैं.
लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इससे होने वाला नुकसान इतना नहीं होगा कि यूपी में बीजेपी का काम बन जाए.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)