नज़रिया: राज्यसभा चुनाव में शाह-योगी ने दिखाया दम पर एक क़रारा झटका भी

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- Author, राधिका रामशेषण
- पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक
उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव में बीजेपी ने चतुराई भरे जोड़-तोड़ और राजनीतिक प्रबंधन के दम पर आख़िरकार नौवीं सीट जीत ही ली.
बीजेपी के निर्वाचक मंडल की संख्या को देखें तो 10 में से आठ सीटें वह आसानी से जीत जाती. समाजवादी पार्टी को एक सीट मिलती जबकि बसपा को शायद कुछ भी न मिलता, क्योंकि बीजेपी के 324 और सपा की 47 सीटों की तुलना में उसके पास 19 ही विधायक हैं.
सात विधायकों वाली कांग्रेस का अस्तित्वहीन सी बनकर रह गई थी और उसके पास बीजेपी विरोधी 'धर्मनिरपेक्ष' गठबंधन का समर्थन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.
उत्तर प्रदेश विधानसभा में बीजेपी के विधायकों की दमदार संख्या होने के कारण बीजेपी सरप्लस वोटों और दूरी वरीयता वाले वोटों के कारण अपने कोटा से एक सीट ज़्यादा आराम से जीत सकती थी.
नौवीं सीट पर इसके उम्मीदवार अनिल अग्रवाल ने पहली वरीयता वाले 12 वोट ही हासिल किए, लेकिन दूसरी वरीयता वाले 100 से ज़्यादा वोट हासिल किए, जिससे उन्होंने आराम से ज़रूरी 37 वोटों का आंकड़ा पार कर लिया.
बीजेपी के लिए उस समय परेशानी खड़ी हो गई थी, जब सपा और बसपा ने रणनीतिक तौर पर एकसाथ आते हुए फूलपुर और गोरखपुर में हुए लोकसभा उपचुनाव जीतकर राजनीतिक चर्चाओं की हवा बदल दी थी.

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उपचुनाव का बदला?
गोरखपुर कई सालों से योगी का गढ़ रहा है और फूलपुर से उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य सांसद थे. ऐसे में इन सीटों पर हार से बीजेपी के नेतृत्व, ख़ासकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की साख कम हुई थी.
शाह को लगा कि उन्हें उत्तर प्रदेश में कोई चमत्कार करना होगा ताकि बीजेपी और अपना आत्मविश्वास लौटाया जा सके. ख़ासकर पार्टी के काडर का ताकि उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए तैयार किया जा सके.
पिछले साल गुजरात में हुए राज्यसभा चुनाव में सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार रहे कांग्रेस नेता अहमद पटेल के ख़िलाफ़ उन्होंने उम्मीदवार उतारा था ताकि विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के मनोबल को तोड़ा जाए. मगर कई कोशिशों के बावजूद पटेल को शाह हरा नहीं पाए थे.
शाह ने उत्तर प्रदेश में नौवीं सीट के लिए भी इसी तरह का रास्ता अपनाया और सपा-बसपा गठबंधन से छीनने का इरादा बनाया. इस अतिरिक्त सीट पर जीत से उन्हें तो संतोष होता ही, एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश भी जाता.
सपा ने एक ही सीट पर चुनाव लड़ा और जया बच्चन को उतारा. मगर बसपा प्रमुख मायावती ने दसवीं सीट पर उम्मीदवार उतारा. वो आश्वस्त थीं कि उनके उम्मीदवार, जिनका नाम भीमराव आंबेडकर है, के लिए सपा अपने अतिरिक्त वोट ट्रांसफर कर देगी और कुछ और वोट भी जुट जाएंगे.

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सियासी सगाई पर संकट?
जब मायावती ने गोरखपुर और फूलपुर में सपा के उम्मीदवारों का समर्थन किया था, उन्होंने सपा प्रमुख अखिलेश को सीधा संदेश दिया था कि वो उनकी मदद से एक राज्यसभा सीट चाहेंगी. अखिलेश ने तुरंत ऐसा करने का भरोसा भी दिलाया था.
पूर्व सहयोगियों के एक बार फिर एक हो जाने से शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साफ़ तौर पर परेशान थे, क्योंकि इनमें जाति के आधार पर मिलने वाले समर्थन और अभी बिखरे हुए मुस्लिमों को एकजुट करके उत्तर प्रदेश से बीजेपी को हटाने की क्षमता है.
बीजेपी का गणित था कि अगर मायावती का उम्मीदवार राज्यसभा की सीट नहीं जीत पाता है तो वह सपा को पूरे प्रयास न करने के लिए ज़िम्मेदार मानेंगी, ख़ासकर तब जब फूलपुर और गोरखपुर में उन्होंने दलितों के वोट बैंक को अखिलेश के उम्मीदवारों को ट्रांसफर कर दिया था.
मायवती के ज़हन में सपा के इरादों को लेकर शक के बीज पैदा हो जाते और फलने-फूलने से पहले ही दोस्ती में दरार आ जाती.

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गठबंधन पर भारी जातियां?
अखिलेश और मायावती के सामने एक या दो राज्यसभा सीटें जीतने से भी बड़ी चुनौतियां हैं. अगर वे अगले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अलग-अलग राह पर चलते हैं तो इससे बीजेपी को फ़ायदा होगा और उनके लिए बने रहना मुश्किल हो जाएगा.
समाजवादी पार्टी और बसपा के सूत्र बताते हैं कि उनके काडर से दोनों के गहरे होते रिश्ते और मज़बूत करने का दबाव 'इतना ज़्यादा' था कि नेता 'मामूली बातों' और 'आपकी संदेह' के चलते इसे तोड़ना नहीं चाहते थे.
राज्यसभा चुनाव में बीजेपी ने अपनी रणनीति के ज़रिए सपा और बसपा की आपसी समझ को कमज़ोर करने की कोशिश की है. इसके साथ ही अमित शाह ने प्रदेश में पार्टी के मनोबल को भी बल दिया है.
बीजेपी ने यूपी में राज्यसभा की नौ सीटें जीतने का जश्न लखनऊ में नतीजे आने से पहले ही शुरू कर दिया था. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पार्टी मुख्यालय पहुंचकर प्रेस कॉन्फ़्रेंस की.
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जीत के बावजूद बीजेपी को झटका
मोदी और शाह के लिए राज्यसभा में हर सीट का जीतना और हारना महत्व रखता है क्योंकि राज्यसभा में बीजेपी अब भी 126 के बहुमत के आंकड़े से दूर है. इस कारण राज्यसभा में इसके लिए हालात लोकसभा जैसे नहीं होते और विधायी कार्यों में, खासकर ट्रिपल तलाक़ जैसे संवेदनशील विधेयकों को लेकर दिक्कतें पेश आती हैं.
हालांकि इस चुनाव में बीजेपी को यूपी में इसकी सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने झटका दिया. सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ओम प्रकाश राजभर की है और वो योगी मंत्रिमंडल में राज्य मंत्री भी हैं. इस पार्टी के दो विधायकों ने सपा और बसपा उम्मीदवार को वोट किया. पिछले हफ़्ते ही राजभर ने योगी सरकार पर उपेक्षा का आरोप लगाया था.
अमित शाह ने राजभर को दिल्ली बुलाया था और दोनों के बीच लंबी बैठक हुई थी. इस बैठक के बाद राजभर ने बीजेपी के पक्ष में वोट करने की बात कही थी. ज़ाहिर है राजभर ने शाह की भी नहीं सुनी. राजभर की पार्टी कब तक बीजेपी के साथ रहेगी ये आने वाले दिनों साफ़ हो जाएगा.
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बसपा विधायक अनिल सिंह और समाजवादी पार्टी छोड़ने वाले नरेश अग्रवाल के बेटे नितिन अग्रवाल ने भी क्रॉस वोटिंग की और खुलकर इसका एलान भी किया. अनिल सिंह ठाकुर हैं जिन्होंने साफ़ कर दिया कि उनकी निष्ठा योगी के प्रति है, जो कि ठाकुर हैं.
उनका 'विद्रोह' मायावती के लिए संदेश है कि आज नहीं तो कल उन्हें उत्तर प्रदेश में प्रासंगिक बने रहने के लिए सभी जातियों और समुदायों को मिलाकर एक छत के नीचे लाना होगा.
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कुंडा से आजाद विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ़ राजा भैया ने गुप्त चाल चली. उन्होंने कहा कि मैंने एसपी को वोट दिया है, लेकिन मतदान के तुरंत बाद उन्होंने योगी से मुलाकात की. इससे ऐसे कयास भी लगाए जाने लगे कि ठाकुर होने के नाते उन्होंने बीजेपी को वोट दिया है.
जब मायावती मुख्यमंत्री थीं, उन्होंने पोटा के तहत राजा भैया और उनके पिता के ख़िलाफ़ आरोप तय किए थे और जेल भी भेजा था. ठाकुरों को वैसे तो एसपी से कोई दिक़्क़त नहीं है, मगर अखिलेश को याद रखना होगा कि मायावती से गठजोड़ करने से उन्हें ठाकुरों के वोटों का नुक़सान हो सकता है.
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