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हिन्दी की सबसे ख़ौफ़नाक क्रिया है जाना केदारनाथ का
हिंदी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह का सोमवार को दिल्ली में निधन हो गया. वो 83 वर्ष के थे.
केदारनाथ सिंह पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे. पेट में संक्रमण की शिकायत के बाद इलाज के लिए उन्हें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती किया गया था.
साल 2013 में केदारनाथ सिंह को साहित्य के सबसे बड़े सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित होने वाले वह हिन्दी के 10वें लेखक थे.
कवि केदारनाथ सिंह के 'जमीन पक रही है', 'यहां से देखो', 'बाघ', 'अकाल में सारस' आदि कई कविता संग्रह मशहूर रहे.
केदारनाथ सिंह का जन्म 1934 में उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के चकिया गाँव में हुआ था. उन्होंने बनारस के काशी हिंदू विश्वविद्यालय से 1956 में हिंदी में एमए और 1964 में पीएचडी की उपाधि हासिल की.
गोरखपुर में उन्होंने कुछ दिन हिंदी पढ़ाई और जवाहर लाल विश्वविद्यालय से हिंदी भाषा विभागाध्यक्ष पद से रिटायर हुए.
उन्होंने कविता व गद्य की अनेक पुस्तकें रची. ज्ञानपीठ के अलावा उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, कुमार आशान पुरस्कार (केरल) और व्यास पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान भी मिले.
जटिल विषयों पर बेहद सरल और आम भाषा में लेखन उनकी रचनाओं की विशेषता है. उनकी सबसे प्रमुख लंबी कविता 'बाघ' है.
केदारनाथ सिंह के प्रमुख लेख और कहानियों में 'मेरे समय के शब्द', 'कल्पना और छायावाद', 'हिंदी कविता बिंब विधान' और 'कब्रिस्तान में पंचायत' शामिल हैं.
ताना-बाना (आधुनिक भारतीय कविता से एक चयन), समकालीन रूसी कविताएँ, कविता दशक, साखी (अनियतकालिक पत्रिका) और शब्द (अनियतकालिक पत्रिका) का उन्होंने संपादन भी किया.
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