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ब्लॉग-शेयर बाज़ार की तरह मोदी और राहुल के उठते-गिरते भाव
- Author, राजेश प्रियदर्शी
- पदनाम, डिजिटल एडिटर, बीबीसी हिंदी
कांग्रेस अधिवेशन में राहुल गांधी के भाषण के बाद उनका भाव चढ़ गया है, उप-चुनाव भाजपा के लिए उफ़-चुनाव साबित हुए हैं लेकिन ये शायद कुछ ही दिनों की बात है.
योगी ने मान लिया है कि पार्टी 'अति-आत्मविश्वास' की वजह से हारी, फूलपुर और गोरखपुर की हार पर मोदी मौन हैं, वैसे ये सच है कि पीएम ने इन सीटों के लिए प्रचार नहीं किया था लेकिन उनके नाम पर वोट माँगे ज़रूर गए थे.
कुछ दिन पहले पूर्वोत्तर राज्यों के नतीजे आने के बाद, जब लोगों को पता चला कि राहुल गांधी तो अपनी नानी के घर छुट्टियाँ मनाने गए हैं तो उनका रेट अचानक गिर गया, उसके पहले गुजरात में बीजेपी को 100 सीटों से नीचे समेट देने के नाम पर उनका ग्राफ़ चढ़ा हुआ था.
अभी मोदी का बाज़ार भाव थोड़ा डाउन है लेकिन कुछ ही दिन पहले त्रिपुरा में ढाई दशक पुरानी कम्युनिस्ट सरकार को उखाड़ने के बाद उनका ग्राफ़ आसमान छू रहा था, उनकी कामयाबी के कसीदे पढ़े जा रहे थे. पकौड़ा प्रकरण और नीरव मोदी कांड से जो माहौल बिगड़ा था, त्रिपुरा की जीत से ट्रैक पर आता दिख रहा था.
साझीदार रही तेलुगु देसम पार्टी ने मोदी सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाकर फिर सीन ख़राब कर दिया, वहीं देवदर्शन में मोदी को टक्कर दे रहे राहुल गांधी, उनकी ही शैली में कांग्रेस को पांडव और बीजेपी को कौरव बताते हुए 'धर्मयुद्ध' का ऐलान कर रहे हैं.
2014 की भारी कामयाबी के बाद, बिहार और दिल्ली में जब बीजेपी को हार मिली तो कुछ समय के लिए लगा कि मोदी का जादू चुक रहा है लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मिली भारी कामयाबी के बाद लोग पिछली नाकामियों को भूल गए, मोदी ने यूपी फ़तह करने के बाद बने मूड को काफ़ी समय तक कायम रखा लेकिन पिछले कुछ समय से जय-जयकार की आवाज़ मद्धिम पड़ती लग रही है, मगर 2019 तक मूड ऐसा ही रहेगा, ऐसा नहीं कहा जा सकता.
2019 के नतीजे आने तक हर रोज़ जनता का भरपूर मनोरंजन होता रहेगा, भारत दरअसल नौटंकी प्रधान देश है जहाँ लोग तथ्यों-तर्कों पर ध्यान देने की जगह अदा पर फ़िदा होते हैं. यही वजह है कि कॉमेडी शो और कांग्रेस अधिवेशन दोनों जगह, नवजोत सिंह सिद्धू अपने अंदाज़ में कोई बदलाव किए बिना फ़िट हो जाते हैं.
टीवी न्यूज़ चैनल और सास-बहू के सीरियल दिखाने वाले इंटरटेनमेंट चैनलों के बीच का अंतर मिटता जा रहा है, टीवी चैनलों पर शोर-हंगामा मचता है और माहौल बनाया-बिगाड़ा जाता है, लेकिन ज़मीनी सियासी हाल जानने-समझने के लिए टीवी देखना रेत से तेल निकालने की कोशिश है.
केवल बोलने वाले का बोलबाला
राहुल गांधी ने अब तक क्या हासिल किया है? उन्हें कहाँ जीत मिली है? गुजरात में जिग्नेश, अल्पेश और हार्दिक का सहारा लेने के बाद भी वे जीत नहीं सके. पंजाब की जीत का श्रेय भी अमरिंदर सिंह को गया, न कि उन्हें.
उत्तर प्रदेश में बीजेपी हारी है लेकिन जीत 'बुआ-भतीजे' की जोड़ी की हुई है, फूलपुर और गोरखपुर दोनों जगह कांग्रेस के उम्मीदवार की ज़मानत ज़ब्त हो गई है लेकिन वे बीजेपी की कमज़ोरी पर हावी होने में फिलहाल कामयाब हुए हैं, मगर ऐसा नहीं है कि उन्होंने कोई ठोस सफलता हासिल की हो, उनकी सबसे बड़ी प्रगति यही है कि उनकी बात सुनी जा रही है.
कांग्रेस के कार्यकर्ता आज भी आश्वस्त नहीं हैं कि वे ऐन मौक़े पर फिर छुट्टी पर नहीं जाएँगे, और अब तो छुट्टी एप्रूव करवाने की ज़रूरत भी नहीं रही, उपाध्यक्ष तो हैं नहीं, अध्यक्ष बन गए हैं.
राहुल गांधी को पहले अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं का विश्वास जीतना है और उसके बाद उन्हें उन दलों का विश्वास जीतना होगा जो भाजपा विरोधी महागठबंधन का नेतृत्व उनके हाथ में देने को तैयार नहीं हैं.
यह साल 2019 की बड़ी लड़ाई से पहले का निर्णायक समय है. राहुल अगर राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ बीजेपी से छीन पाते हैं तभी माना जाएगा कि वे मोदी के लिए चुनौती हो सकते हैं, वरना नहीं. ये वो राज्य हैं जहाँ कभी कांग्रेस मज़बूत रही है और कोई दूसरा दमदार क्षेत्रीय खिलाड़ी नहीं है.
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो बीजेपी लंबे समय से सत्ता में है जिसका नुक़सान उसे होना तय है, इस पर भी राहुल ये तीन राज्य नहीं छीन पाए तो कोई उनके पीछे नहीं आएगा.
लेकिन, उससे भी पहले राहुल गांधी को कर्नाटक में अपनी सरकार बचानी होगी जहाँ भाजपा पूरे लाव-लश्कर के साथ हमला बोल रही है. राहुल का भविष्य इस बात पर काफ़ी हद तक निर्भर करेगा कि अब से लेकर 2019 के नतीजे आने तक वे जी-जान से, बिना कोई बड़ी ग़लती किए अपनी पारी खेल पाते हैं या नहीं?
मोदी के पास बोलने के लिए क्या बचा है?
राहुल को एक छूट है कि वे अभी ख़ूब बोल सकते हैं, उनको कोई ये नहीं कहा जा सकता कि आपको मौका मिला और आपने कुछ नहीं किया.
ब्रैंड मोदी की सबसे बड़ी ताक़त उनके भाषण रहे हैं लेकिन उनकी अपनी कही हुई हर बात उन तक पलटकर आ रही है. अब पौने चार साल बाद मोदी के दावे और वादे वास्तविकता की कसौटी पर परखे जा रहे हैं.
2014 का चुनाव नरेंद्र मोदी विकास और हिंदुत्व के कॉम्बिनेशन के साथ लड़े थे, गुजरात मॉडल की बात बढ़-चढ़कर हुई थी, विकास के बारे में मोदी अब भी बोल सकते हैं लेकिन उसका असर कितना होगा, ये बड़ा सवाल है.
रोज़गार की कमी, किसानों में असंतोष, स्मार्ट सिटी, मेक इन इंडिया जैसी अति-महत्वाकांक्षी योजनाओं का आगाज़ जितना शानदार था, अंजाम उतना चमकदार नहीं रहा है. ऊपर से पीएनबी घोटाला, जय शाह की कमाई पर उठे सवाल और कई ऐसे मामले हैं जिनकी वजह से विकास और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी करने की ताक़त कम कर दी है.
लेकिन, ये नहीं कहा जा सकता कि मोदी की निजी लोकप्रियता कम हुई है. गुजरात का चुनाव वे जिस तरह अपने नाम पर और गुजरातियों की शान के सवाल पर लड़कर हार से बच गए, वो मोदी की निजी ताक़त का सबूत है.
वे पूरे देश का चुनाव 'मोदी नहीं तो कौन?' के मुद्दे पर लड़ सकते हैं और ऊपर से हिंदुत्व तो है ही, आरएसएस और भाजपा का संगठन भी काफ़ी चुस्त है.
'मोदी नहीं तो कौन?' का जवाब राहुल अभी तक नहीं बन पाए हैं, आगे बन पाएँगे या नहीं, मालूम नहीं, लेकिन हर रोज़ ये साँप-सीढ़ी का खेल बहुत दिलचस्प है. शेयर बाज़ार की तरह रोज़-रोज़ का उतार-चढ़ाव देखने लायक़ है, वोटर सोच-समझकर ही निवेश करेंगे, ऐसी उम्मीद करनी चाहिए.
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