चंद्रबाबू नायडू के सियासी स्ट्रोक से निपटने की क्या है बीजेपी की तैयारी?

    • Author, दिनेश उप्रेती
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा नहीं देने की नाराज़ तेलुगूदेशम पार्टी यानी टीडीपी ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से अलग होने का फ़ैसला कर लिया है. पिछले हफ्ते ही टीडीपी के दो मंत्रियों ने सरकार से इस्तीफ़ा दे दिया था और इसके बाद राज्य की वाईएसआर कांग्रेस ने मोदी सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाने का एलान किया था.

वाईएसआर कांग्रेस के अध्यक्ष जगनमोहन रेड्डी ने ये भी कहा है कि अगर केंद्र सरकार ने आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग नहीं मानी तो उनकी पार्टी के सभी सांसद 6 अप्रैल को इस्तीफ़ा दे देंगे.

टीडीपी ने कहा कि वह केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ 19 मार्च को अविश्वास प्रस्ताव लाएगी.

टीडीपी ने कहा, "हम 54 सांसदों का हस्ताक्षर 19 मार्च को लाएंगे और संसद में अविश्वास प्रस्ताव पेश करेंगे."

आंध्र प्रदेश के मंत्री के.एस. जवाहर ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा, "भाजपा ने तेलुगू जनता को धोखा दिया. हम एनडीए सरकार के ख़िलाफ़ संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाने जा रहे हैं."

लोकसभा में तेलुगूदेशम पार्टी के 16 सदस्य हैं और वाईएसआर के नौ सांसद हैं. अविश्वास प्रस्ताव के लिए कम से कम 50 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता है. हालांकि, बीजेपी को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत हासिल है और इस प्रस्ताव का मोदी सरकार पर शायद ही कोई असर हो.

लेकिन चंद्रबाबू के इस सियासी स्ट्रोक से आंध्र प्रदेश की राजनीति ख़ासी दिलचस्प हो गई है. जन सेना पार्टी के प्रमुख पवन कल्याण ने मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं तो टीडीपी ने इन आरोपों को' बेबुनियाद और निरर्थक' करार देते हुए कहा कि यह तेलुगु देशम पार्टी को कमज़ोर करने की बड़ी साजिश का हिस्सा है.

टीडीपी नेताओं ने फ़िल्म स्टार से राजनेता बने पवन कल्याण पर जवाबी हमला बोलते हुए कहा कि वह नई दिल्ली की लिखी पटकथा पढ़ रहे हैं और आरोप लगाया कि इसके पीछे भाजपा है. भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का अप्रत्यक्ष हवाला देते हुए मुख्यमंत्री ने चेतावनी दी कि तमिलनाडु जैसा ड्रामा आंध्र प्रदेश में नहीं खेलने दिया जा सकता है.

लेकिन राजनीतिक विश्लेषक चंद्रबाबू नायडू के इस 'सियासी मास्टर स्ट्रोक' को दक्षिण भारत में अमित शाह की विस्तार योजना के लिए बड़ा झटका मान रहे हैं. कहा जा रहा है कि आंध्र प्रदेश में वैसे भी भाजपा का जनाधार बहुत मज़बूत नहीं है और वहाँ पैर जमाने के लिए उसका एक मजबूत क्षेत्रीय दल के साथ चलना आवश्यक है.

नायडू स्ट्रोक कितना असरदार?

चंद्रबाबू नायडू अटल बिहारी वाजपेयी के दौर से ही एनडीए के साथ रहे. ऐसे में अगले साल राज्य में होने वाले चुनावों से पहले चंद्रबाबू ने एनडीए से अलग होने का फ़ैसला क्षेत्रीय राजनीति के मद्देनज़र किया है और उनका दांव किसी और रणनीति का हिस्सा है?

वरिष्ठ पत्रकार उमर फारुख़ का मानना है कि पिछले कुछ दिनों से जो सियासी घटनाक्रम चल रहा है, उसे देखते हुए उन्हें टीडीपी के फ़ैसले से हैरानी नहीं हुई है.

उमर कहते हैं, "पिछले कुछ दिनों से आंध्र प्रदेश की सियासत में जो घटनाक्रम चल रहा है, उसे देखते हुए हैरानी नहीं थी कि टीडीपी अब एनडीए में नहीं रहेगी. जगनमोहन रेड्डी ने जिस तरह लगातार दबाव बनाया, उसके बाद चंद्रबाबू नायडू के लिए एनडीए के साथ बने रहना मुश्किल हो गया. टीडीपी ने इस मुद्दे पर पॉलित ब्यूरो की आपात बैठक बुलाई और एनडीए से अलग होने का फ़ैसला कर लिया."

वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषन का मानना है कि भाजपा के लिए आंध्र में मुश्किलें बढ़ गई लगती हैं.

राधिका कहती हैं, "भाजपा की आंध्र में बहुत कम मौजूदगी है. आगे बढ़ने के लिए उन्हें टीडीपी या वाईएसआर कांग्रेस का साथ चाहिए और मौजूदा हालात में तो लग रहा है कि उन्हें शायद अकेले ही चलना पड़ेगा."

लेकिन आंध्र के बाहर नायडू के इस सियासी स्ट्रोक का शायद ही बहुत असर हो.

उमर फ़ारुख़ कहते हैं, "जहाँ तक इस फ़ैसले का दक्षिण भारत की राजनीति पर असर की बात है, तो पूरे दक्षिण भारत के तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की सियासत में भारी उथल-पुथल है. क्षेत्रीय पहचान और संस्कृति का मुद्दा ज़ोर-शोर से उठाया जा रहा है, कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इसे ही अपना मुख्य मुद्दा बनाया है. दक्षिण भारत में वैसे भी कोई राष्ट्रीय राजनीतिक दल प्रभावशाली नहीं है, ऐसे में अगले लोकसभा चुनावों में उसके लिए दक्षिण भारत से सीटें जुटाना बेहद मुश्किल काम होगा. कहने का मतलब है कि 2019 में उत्तर भारत से होने वाले नुक़सान की भरपाई बीजेपी दक्षिण भारत से नहीं कर पाएगी."

घटक दलों में नाराज़गी क्यों?

भाजपा को सत्ता चलाने के लिए अभी भले ही एनडीए के घटक दलों की बहुत ज़रूरत न हो, लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मिशन 2019 के लिए अमित शाह और मोदी को गठबंधन को मजबूत करना ही होगा.

उनका मानना है कि मोदी सरकार ने 2014 में जनता से इतने वादे कर लिए थे, उन सभी को पूरा करना बहुत मुश्किल होगा, ऐसे में लोगों में नाराज़गी होना लाज़िमी है. भाजपा की इस मुश्किल को क्षेत्रीय दल कुछ कम कर सकते हैं, लेकिन महाराष्ट्र शिव सेना जिस तरह लगातार भाजपा पर निशाना साध रही है और पंजाब में अकाली दल से भी उसके रिश्ते अब पहले जैसे नहीं रहे हैं.

उमर फ़ारुख़ कहते हैं, "टीडीपी के अलग होने का असर ये हो सकता है कि एनडीए में शामिल दूसरे घटक दल जिनमें नाराज़गी है, वो ज़्यादा मुखर हो सकते हैं और अपनी मांगों के लिए मोदी सरकार पर अधिक दबाव बना सकते हैं. यानी कुल मिलाकर भाजपा को एनडीए के कुनबे को एकजुट रखने के लिए ख़ूब मशक्कत करनी होगी."

राधिका रामाशेषन कहती हैं, "ये सही है कि ये अटल बिहारी वाजपेयी वाला एनडीए नहीं है. तब सरकार चलाने के लिए बीजेपी को इन दलों की ज़रूरत थी, लेकिन 2014 में मोदी और अमित शाह ने स्पष्ट बहुमत हासिल करने के बावजूद कहा था कि वह घटक दलों को साथ लेना चाहते हैं. लेकिन घटक दलों में जिस तरह की नाराज़गी देखने को मिल रही है, उससे तो लग रहा है कि शाह घटक दलों को लिए बहुत गंभीर नहीं हैं."

राधिका कहती हैं, "शिव सेना के साथ मोदी और अमित शाह का व्यवहार बहुत ख़राब रहा. यही अकालियों के साथ हुआ. पंजाब चुनाव हारने के बाद अकालियों से दूरी बन गई है. वो नाम मात्र को एनडीए में है. तमिलनाडु में बीजेपी ने गठबंधन करने की कोशिश की, लेकिन पता ही नहीं चला कि उसकी रणनीति क्या है. किस दल के साथ जाना चाह रही है. "

राधिका मानती हैं कि इस नाराज़गी की दूसरी वजह क्षेत्रीय दबाव और मौके का फ़ायदा उठाना भी हो सकता है.

राधिका कहती हैं, "क्षेत्रीय राजनीति तो है ही उत्तर प्रदेश और बिहार के उपचुनावों के नतीजे बीजेपी के ख़िलाफ़ जाने के बाद ये लगने लगा है कि बीजेपी अब 2014 जितनी ताक़तवर नहीं रही, ऐसे में अपनी मांगों के लिए मोदी सरकार पर दबाव बनाया जाए और अपने टार्गेट वोटर को स्पष्ट संदेश भी दिया जाए."

चुनावी साल में कितना बड़ा नुक़सान

विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव में अभी एक साल बाकी है और अभी बहुत कुछ होना बाकी है.

राधिका कहती हैं, "चंद्रबाबू नायडू के इस फ़ैसले का सीधे-सीधे कोई असर होगा, ये तो नहीं जा सकता. लेकिन बीजेपी के साथ जाएं या न जाएं, इस बात को लेकर सोच-विचार होगा. कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और राजस्थान के चुनावों में से अगर दो-तीन राज्यों के नतीजे बीजेपी के पक्ष में रहे तो एनडीए और मजबूत हो सकता है."

पत्रकार रामचंद्रन कहते हैं, "मोदी सरकार के लिए 2019 का चुनाव 2014 से बिल्कुल अलग होगा. अगर 2019 में विपक्ष बड़ा गठजोड़ बनाने में कामयाब रहा तो पीएम मोदी के लिए न केवल जीत की राह मुश्किल होगी. उत्तर प्रदेश उप-चुनाव में सपा और बसपा की दोस्ती का असर सभी ने देखा है. अगर अगले आम चुनाव में भी ये गठजोड़ बना रहा तो सपा-बसपा 50 सीटें तक जीत सकती है, मतलब ये है कि भाजपा को इन सीटों की भरपाई दूसरे राज्यों (पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत) से करनी होगी. मौजूदा हालात में ये मुश्किल है."

भाजपा की क्या है रणनीति?

भारतीय सियासत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी को सियासी रणनीति के मामले में बहुत गंभीरता से लिया जाता है. पूर्वोत्तर के कई राज्यों में अमित शाह ने क्षेत्रीय दलों से गठबंधन कर पार्टी को वहाँ सत्ता तक पहुंचाने में कामयाबी हासिल की है. ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का ये भी मानना है कि आंध्र प्रदेश में बीजेपी अभी अपना मास्टर स्ट्रोक चल सकती है.

वरिष्ठ पत्रकार उमर फ़ारूख़ कहते हैं, "चंद्रबाबू नायडू शक्तिशाली और बहुत दूर तक सोचने वाले नेता हैं और शायद यही वजह है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह को ये मंज़ूर नहीं कि कोई क्षेत्रीय नेता उनसे आंख में आंख मिलाकर बात कर सके. ऐसे में चुनावी साल में अभी बहुत कुछ हो सकता है. ये भी संभव है आने वाले समय में अमित शाह की रणनीति ये हो सकती है कि वो जगनमोहन रेड्डी को अपने पाले में कर लें, चंद्रबाबू के मुक़ाबले जगनमोहन पर दबाव डालना मोदी-शाह के लिए ज़्यादा आसान होगा."

वरिष्ठ पत्रकार टीआर रामचंद्रन भी मानते हैं कि टीडीपी के अलग होने के बाद भाजपा के पास प्लान बी हो सकता है. रामचंद्रन कहते हैं, "ये संभव है कि कुछ समय बाद बीजेपी वाईएसआर के साथ गठबंधन कर ले. सियासी हलकों में तो ये भी कहा जा रहा है कि वाईएसआर के साथ बीजेपी का समझौता लगभग हो चुका है. अगले साल विधानसभा चुनावों से ठीक पहले, बीजेपी वाईएसआर की राज्य को विशेष राज्य के दर्जा देने की मांग मानते हुए उससे तालमेल कर सकती है."

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