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झारखंडः तीर-धनुष के साथ ‘स्वशासन’ मांगते आदिवासी
- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, कोचांग (खूंटी) से, बीबीसी हिंदी के लिए
शारदामारी गांव की सीमा पर तीर-धनुष से लैस दर्जन भर लोग जमा हैं. वे हमें जोहार (नमस्ते) बोलते हैं. यहां ताजा पत्तों से बने गेट पर टंगा हरे रंग का बैनर पत्थलगड़ी महोत्सव में आने वाले बाहरी लोगों का अभिनंदन कर रहा है.
यह पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले के बंदगांव प्रखंड की सीमा है. इसके बाद अड़की प्रखंड शुरू होता है, जो खूंटी जिले का हिस्सा है. शारदामारी इस प्रखंड का पहला गांव है. इसके बाद हम कोचांग पहुंचते हैं.
यहां पत्थलगड़ी महोत्सव की तैयारी की जा रही है. ऐसा आयोजन सिंजुड़ी, बहम्बा, साके, तुसूंगा और तोतकोरा गांवों में भी हो रहा है. यहां मौजूद हजारों लोगों के हाथों में धनुष है.
इस पर नुकीले तीर चढ़े हैं. कुछ महिलाएं फरसा लिए घूम रही हैं. कुछ ने टांगी (कुल्हाड़ी) और दूसरे पारंपरिक हथियार ले रखे हैं. कोचांग के तिराहे पर पत्थर के बड़े टुकड़े से बनी एक बोर्डनुमा आकृति (शिलापट्ट) खड़ी है.
इसके चारों तरफ से बांस के बल्ले लगे हैं. बीच में फीता है. तभी नाचते-गाते युवाओं की टोलियों के साथ कई लोग पहुंचते हैं. इनमें से कुछ लोग आगे बढ़कर फीता काटते हैं. पूजा होती है. लोग ग्रामसभा ज़िंदाबाद के नारे लगते हैं और पत्थलगड़ी महोत्सव का आगाज हो जाता है.
क्या है पत्थलगड़ी
इस बैनर पर भारत के संविधान का हवाला देते हुए लिखा गया है कि पांचवी अनुसूची के क्षेत्रों में आदिवासियों के स्वशासन व नियंत्रण की व्यवस्था है.
संविधान के अनुच्छेद 19 (5), (6) के तहत इस क्षेत्र में इस व्यवस्था से इतर लोगों का स्वतंत्र रुप से भ्रमण करना, बस जाना और व्यवसाय या रोजगार पर प्रतिबंध है.
यह भी लिखा है कि अनुच्छेद 244 (1), भाग (ख), पारा 5 (क) के तहत पांचवी अनुसूची क्षेत्र में संसद या विधानमंडल का कोई सामान्य कानून लागू नहीं है. इसके नीचे 'रुढ़ि प्रथा प्राकृतिक ग्राम सभा कोचांग' के आदेश का उल्लेख किया गया है.
इसी बैनर के दूसरी तरफ 'इंडिया नॉन ज्यूडिशियल' शीर्षक से कई बातों के साथ सुप्रीम कोर्ट के हवाले से लिखा गया है - भारत में जनादेश (मतदान) नहीं बंधाकरण (संविधान ग्राम सभा) सर्वोपरि है.
बैनर के सामने बैठे कई लोग इन बातों को अपनी कॉपियों में लिख रहे हैं. पूछने पर कहते हैं कि यह हमारा संविधान है. हमें इसकी जानकारी होनी चाहिए.
स्वशासन क्यों?
कोचांग के ग्राम प्रधान काली मुंडा बीबीसी से कहते हैं, ''हम स्वशासन की मांग नहीं कर रहे. यह तो हमारा अधिकार है. हमलोग संविधान में उल्लिखित अधिकारों से समस्त आदिवासियों को वाकिफ़ कराना चाहते हैं. हमारी पत्थलगड़ी इसी कारण है. हमलोग अपने इलाके के तमाम गांवों में यह आयोजन करेंगे. अगर सरकार ने इसे रोकने की कोशिश की, तो इसका विरोध होगा.''
इस आयोजन में शामिल शंकर महली ने आरोप लगाया कि सरकार ने आदिवासी महासभा के लोगों को बेवजह गिरफ्तार कर लिया है. वे कहते हैं कि वे किसी को भड़का नहीं रहे सिर्फ़ लोगों को संविधान के प्रति जागरुक कर रहे हैं. वे सरकार से वार्ता करने की बात भी कहते हैं.
शंकर महली ने बीबीसी से कहा, ''सरकार हमारे इलाके में शौचालय बना रही है. यह कैसा विकास है. आदिवासियों के खाने के लिए पेट में अन्न नहीं है, तो शौचालय बनाकर क्या कीजिएगा. हम विकास के इस सरकारी मॉडल में शामिल नहीं हैं. इसके बावजूद सरकार हम आदिवासियों पर अपना कानून थोपना चाहती है. हम मुख्यमंत्री रघुवर दास की सरकार के ख़िलाफ़ संवैधानिक लड़ाई लड़ेंगे.''
पत्थलगड़ी या राजद्रोह
वहीं, मुख्यमंत्री रघुवर दास का कहना है कि झारखंड के आदिवासी भोले-भाले हैं. उन्हें कुछ बाहरी लोग गुमराह कर रहे हैं.
मुख्यमंत्री ने कहा, ''मैं मानता हूं कि पत्थलगड़ी हमारी परंपरा में हैं लेकिन यह अच्छे कामों के लिए की जानी चाहिए. ये लोग राष्ट्रविरोधी हैं और असंवैधानिक काम करने में लगे हैं. हमारी सरकार इनको छोड़ने वाली नहीं हैं. मैं स्वयं पत्थलगड़ी वाले गांवों में जाउंगा. देखते हैं कौन मुझे रोकता है.''
हालांकि, नवनियुक्त मुख्य सचिव सुधीर त्रिपाठी ने इस बाबत कहा है कि पत्थलगड़ी करने वाले लोग कुछ संदेश देना चाहते हैं. हमें इस संदेश को समझने की कोशिश करनी चाहिए.
यहां उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों से कोचांग के ग्रामीणों ने 35 पुलिसकर्मियों को बंधक बना लिया था. तब खूंटी के डीसी सूरज कुमार के समझाने के बाद गांव वालों ने कई घंटों बाद उन्हें मुक्त किया.
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