You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
नज़रिया: क्या नरेंद्र मोदी संघ के 'मिशन 2025' को पूरा कर देंगे
- Author, प्रदीप सिंह
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
कहते हैं कि जंग में अपने दुश्मन और राजनीति में अपने विरोधी को कभी कम नहीं आंकना चाहिए. पर अमूमन ऐसा होता नहीं.
लोग बार-बार ये ग़लती करते ही हैं. जनसंघ (भाजपा के पुराने अवतार) के ज़माने में कांग्रेस के लोग एक नारा लगाते थे- 'इस दीपक में तेल नहीं सरकार चलाना खेल नहीं.'
वो ज़माना कांग्रेस के वर्चस्व का था. दिल्ली से दक्षिण, उत्तर, पश्चिम और पूरब में कांग्रेस की दुन्दुभि बजती थी. समय ने करवट ली है.
जिस पार्टी पर तंज़ किया जाता था कि उसे सरकार चलाना नहीं आता, वह देश के बीस राज्यों और केंद्र में अकेले या सहयोगियों के साथ सत्ता में है.
और यह तंज़ करने वाली पार्टी आज पांच राज्यों में सिमट गई है. कुछ दिनों में यह संख्या और घट सकती है.
भाजपा ने चुनौती को अवसर में बदला
इस बदलाव के यूं तो कई कारण हैं पर एक बड़ा कारण यह है कि पिछले कुछ दशकों में कांग्रेस ने अवसर गंवाए हैं और भाजपा ने चुनौती को अवसर में तब्दील किया है.
शनिवार को जिन तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आए उनसे भी इस बात को समझा जा सकता है.
त्रिपुरा में माणिक सरकार की लोकप्रियता में कमी किसी से छिपी नहीं थी. ईमानदार मुख्यमंत्री होने के बावजूद एक बेईमान सरकार से त्रिपुरा के लोग आजिज आ गए थे.
भाजपा से पहले कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के पास इस सत्ता विरोधी रुझान को भुनाने का मौका था.
कांग्रेस विधायकों को समझ में आ गया था कि त्रिपुरा की हवा मार्क्सवादी सरकार के ख़िलाफ़ बह रही है.
चार साल से तैयारी कर रही थी भाजपा
पश्चिम बंगाल में ममता के प्रचंड उभार को देखकर उन्हें लगा कि ममता एक और राज्य में सत्ता चाहेंगी, इसलिए वे पहले तृणमूल के साथ गए.
पर राष्ट्रीय पार्टी से आई ममता बनर्जी की सोच क्षेत्रीय दलों वाली निकली. वे अपने किले से बाहर आने के लिए तैयार नहीं हुईं.
राज्य में सरकार विरोधियों के लिए एकमात्र विकल्प भाजपा बची थी. भाजपा इस मौके के लिए पिछले चार साल से तैयारी कर रही थी.
नतीजा ये हुआ कि डेढ़ फ़ीसदी वोट वाली पार्टी पांच साल में 42 फ़ीसदी पर पहुंच गई.
त्रिपुरा और नगालैंड (जूनियर पार्टनर के रूप में) की जीत के बाद भाजपा पूर्वोत्तर में लगभग उस स्थिति में आ गई है जहां क़रीब चार दशक पहले कांग्रेस हुआ करती थी.
लेकिन नुक़सान सबसे ज़्यादा कांग्रेस का
बीजेपी ने ये छलांग पिछले चार सालों में लगाई है. ये बात सही है कि लोकसभा चुनाव के नज़रिए से देखें तो पूरे पूर्वोत्तर में लोकसभा की कुल पच्चीस ही सीटें हैं.
इसलिए ये जीत लोकसभा के अंक गणित को बहुत बड़े पैमाने पर बदल देगी ऐसा नहीं है. पर भाजपा संगठन और उसकी केंद्र सरकार के लिए इस जीत के बहुत मायने हैं.
पूर्वोत्तर में ऐसी पैठ से भाजपा के हिंदी पट्टी की पार्टी होने बिल्ला हट गया है. दूसरे, त्रिपुरा की जीत से पश्चिम बंगाल और केरल में पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा.
त्रिपुरा में हारी तो मार्क्सवादी पार्टी है पर नुक़सान सबसे ज्यादा कांग्रेस को हुआ है. वह भी राष्ट्रीय स्तर पर.
ये नुक़सान वोट के लिहाज से नहीं बल्कि बौद्धिक पूंजी (इंटेलेक्चुअल कैपिटल) का होगा. वैचारिक बौद्धिक स्तर पर अब अंदरूनी संघर्ष और तेज़ होगा.
राजस्थान, मध्य प्रदेश के लिए रणनीति
कांग्रेस को सबसे ज़्यादा मदद वामपंथी बुद्धिजीवियों से मिलती थी.
माकपा के कमज़ोर होने से कांग्रेस को घाटा ज़्यादा होगा क्योंकि कमज़ोर हालत में भी भाजपा को चुनौती देने वाली वह एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी है.
गुजरात विधानसभा चुनाव में अपेक्षा से ख़राब प्रदर्शन और राजस्थान में तीन उपचुनाव (दो लोकसभा और एक विधानसभा सीट) हारने के बाद राजनीतिक हलकों में एक चर्चा चल पड़ी थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा शासित तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में सत्ता विरोधी रुझान से बचने के लिए समय से पहले लोकसभा चुनाव करा सकते हैं.
कयास लगाया जा रहा था कि इस साल के अंत तक लोकसभा चुनाव हो सकते हैं.
मतदाताओं में विश्वसनीयता
इस बात को प्रधानमंत्री के बार-बार ये कहने से भी बल मिला कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ साथ कराने पर विचार किया जाना चाहिए.
अब एक बार फिर यह चर्चा शुरू हो सकती है कि पूर्वोत्तर की जीत से बने माहौल का फ़ायदा उठाने के लिए भाजपा लोकसभा चुनाव जल्दी करा सकती है.
पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में इस बात को लेकर कोई दुविधा नहीं है. उसका मानना है कि लोकसभा चुनाव समय से पहले किसी हाल में नहीं होंगे.
समय से पहले सत्ता छोड़ने में इस नेतृत्व का यक़ीन नहीं है.
पिछले चार सालों में भाजपा ने जितनी जीत हासिल की है, उसके पीछे संगठन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मतदाताओं में विश्वसनीयता सबसे बड़े कारण रहे हैं.
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार और नरेंद्र मोदी सरकार में एक बुनियादी फ़र्क यह है कि आज सरकार और संगठन में बेजोड़ तालमेल है और इन दोनों को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का पूरा समर्थन है. वाजपेयी सरकार के समय ऐसा नहीं था. इस तालमेल की एक बड़ी वजह संघ का एक लक्ष्य भी है.
साल 2025 में संघ के गठन के सौ साल पूरे हो रहे हैं.
संघ की इच्छा और कोशिश है कि उसके शताब्दी समारोह के समय देश के अधिकतर राज्यों और केंद्र में भाजपा की सरकार हो.
अमित शाह भाजपा के जिस स्वर्णिम काल की बात करते हैं शायद ये वही है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)