घर में बची हुई दवाइयों का क्या करें?

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    • Author, गुरप्रीत कौर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

एक्सपायर हो चुकी या खराब हो चुकी दवाईयों का आप क्या करते हैं? कूड़ेदान में फेंक देते हैं?

अतुल गर्ग भी हमेशा से यही करते थे. अपने घर की बची हुई और एक्सपायर हो चुकी दवाईयों को कूड़ेदान में फेंक देते थे.

लेकिन इस बार जब घर की सफाई करते हुए उन्हें ऐसी दवाइयां मिली तो कूड़ेदान में डालने से पहले उनके ज़हन में एक सवाल आया.

उन्होंने खुद से पूछा कि दवाइयों को इस तरह कूड़ेदान में फेंकना सही है?

उन्होंने सोचा कि एक्सपायर हो चुकी दवाइयां जब कूड़े समेत डंपिंग ग्राउंड पहुंचेगी, तो क्या पर्यावरण, जीव-जंतुओ और जल पर इसका बुरा असर नहीं पड़ेगा?

क्या इन दवाइयों को नष्ट करने का कोई सुरक्षित तरीका है?

अतुल के ये सारे सवाल वाजिब हैं, क्योंकि उनकी ही तरह सभी लोग बची हुई और एक्सपायर हो चुकी दवाइयों को आम कूड़े की तरह फेंक देते हैं.

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दवाइयों को ख़त्म करने का सही तरीका

दवाइयों वैसे तो बीमारियों को ठीक करने के लिए इस्तेमाल में आतीं हैं.

लेकिन अगर ये दवाइयां काम की ना रहे तो इन्हें सही तरीके से डिसपोस करना ज़रूरी है.

ऐसा नहीं करने पर दवाइयां नुकसान दायक हो सकतीं हैं.

इसके लिए भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने बाकायदा नियम बनाएं हैं.

हालांकि बहुत कम लोगों को इसकी जानकारी है.

नियमों के मुताबिक एक्सपायर, अनावश्यक और इस्तेमाल ना की गई दवाइयों को नष्ट करने के लिए सरकार मेडिसिन टेक-बैक प्रोग्राम चलाती है.

  • इस टेक बैक प्रोग्राम के तहत आप अपने घर में बची और एक्सपायर हो चुकी दवाईयों को स्थानीय प्रशासन को दे सकते हैं.
  • अपने इलाके के मेडिसिन टेक-बैक प्रोग्राम के बारे में जानने के लिए आप अपने शहरी प्रशासन की घरेलू कचरा प्रबंधन या रीसाइक्लिंग सेवा से संपर्क भी कर सकते हैं.
  • अपने नज़दीकी फार्मासिस्ट से भी मेडिसिन डिस्पोसल के तरीकों के बारे में जानकारी ले सकते हैं.
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अगर आपके इलाके में किसी तरह का टेक-बैक प्रोग्राम नहीं होता तो आप इस आसान तरीके से घर में दवाइयों को नष्ट कर सकते हैं:

घर पर दवाई नष्ट करने का तरीका

  • टैबलेट या कैप्सूल को साबूत किसी पदार्थ जैसे इस्तेमाल की हुई चायपत्ति के साथ मिलाएं.
  • ध्यान रहे टैब्लेट या कैप्सूल को क्रश न करें.
  • इस मिश्रण को प्लास्टिक बैग में डालकर अच्छे से सील कर दें.
  • इसके बाद प्लास्टिक बैग को घरेलू कचरे के साथ फेंक सकते हैं.

मतलब ये कि टैबलेट और कैप्सूल को खुले में न फेंके.

कब करें दवाइयों को फ्लश

कुछ खास दवाइयों को नष्ट करने का अलग तरीका भी होता है.

नियमों के मुताबिक कुछ एक ऐसी दवाइयां हैं जिन्हें फ्लश करने के निर्देश दवाइयों पर लिखे होते हैं.

ऐसा इसलिए क्योंकि वो बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचा सकतीं हैं.

कोई और उन दवाईयों का एक भी डोस ले ले तो नुकसानदायक हो सकता है.

इसलिए इस तरह की कुछ दवाईयों पर निर्देश दिया होता है कि जरूरत ना होने या एक्सपायर होने पर इसे फ्लश कर दिया जाए.

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अब सवाल ये भी हो सकता है कि किन दवाइयों को फ्लश करना है और किन दवाइयों को घर के कचरे के साथ फेंके.

इसके लिए सबसे आसान सा तरीका है, DailyMed नाम की वेबसाइट.

फार्मासूटिकल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के मुताबिक इस बेबसाइट पर आप दवाइयों का नाम डालकर उसे नष्ट करने के तरीके के बारे में जान सकते हैं.

फार्मासूटिकल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत काम करता है.

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ज़रूरतमंदो को मुफ्त में दवाइयां

कुछ दवाइयां एक्सपायर होने के बाद खराब हो जाती है. लेकिन कुछ दवाइयां बीमारी ठीक होने के बाद बच जाती हैं. ये दवाइयां आपके ना सही लेकिन किसी और के काम ज़रूर आ सकती हैं.

'मेडिसिन बाबा' के नाम से मशहूर दिल्ली के ओमकार नाथ बीते 10 सालों से घर-घर जाकर लोगों से बची हुई दवाइयां इक्कठा करते हैं. फिर इन दवाइयों को ज़रूरतमंद लोगों को दे देते हैं.

वो दवाइयां उन्हीं लोगों को देते हैं जिनके पास डॉक्टर के पर्चे पर वो दवाइयां लिखी होती हैं.

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उनके साथ एक फार्मासिस्ट काम करता है जो प्रिस्क्रिपशन के हिसाब से लोगों को दवाइयां देता है.

कानून के मुतबाकि कोई व्यक्ति दवाइयां तो इक्कठा कर सकता है लेकिन उन्हें ऐसे ही बांट नहीं सकता. इसलिए मेडिसिन बाबा फार्मासिस्ट की मदद से दवाइयां ज़रूरतमंदो को देते हैं.

उन्हें ये काम करने की प्रेरणा 2008 में पूर्वी दिल्ली में हुए एक हादसे से मिली. दरअसल यहां बन रहे लक्ष्मी नगर मेट्रों स्टेशन का एक पिलर गिर गया था. जिसकी चपेट में आकर काम कर दो मज़दूरों की मौत हो गई और कई घायल हो गए थे.

घायल लोगों को स्थानीय अस्पताल प्रशासन ने फर्स्ट एड देकर घर भेज दिया. जिसके बाद सही इलाज और दवाइयों के अभाव में कई घायल लोगों की मौत हो गई.

इस घटना ने बल्ड बैंक टेक्निशियन ओमकार नाथ को अंदर तक हिला दिया और उन्होंने इस समस्या का हल निकालने का सोचा. इसके बाद उन्होंने दवाइयां इकठ्ठा कर उन लोगों को देना शुरू किया जो महंगी दवाइयां अफोर्ड नहीं कर सकते.

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इसी तरह की कई और संस्थाएं है जो ज़रूरतमंद लोगों के लिए काम करती हैं. ऐसी एक संस्था ज़िम्मेदारी फाउंडेशन के लिए काम करने वाली आईआईएम ग्रेजुएट प्रिया शर्मा बताती हैं कि हम बची हुई दवाइयां उन ग्रामीण लोगों तक पहुंचाते हैं जिन तक महंगी और अच्छी दवाइयों की पहुंच नहीं है.

प्रिया शर्मा उत्तराखंड के उन ग्रामीण इलाकों के लोगों के लिए काम करती हैं, जो नेशनल रूरल हेल्थ मिशन के मुताबिक स्वास्थ के लिहाज़ से पिछड़े हुए हैं.

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