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प्रेस रिव्यूः जब आपस में उलझ गईं सुप्रीम कोर्ट की दो बेंच
सुप्रीम कोर्ट की दो अलग-अलग बेंचों में भूमि अधिग्रहण मामले में हुए फ़ैसले को लेकर मतभेद सामने आया है.
यह खबर प्रकाशित की है टाइम्स ऑफ इंडिया ने. अखबार लिखता है कि न्यायिक आचरण के मसले पर अलग-अलग बेंच की बीच मतभेद का मामला तब सामने आया, जब गुरुवार को मामले की सुनवाई जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की बेंच के सामने हुई.
तब उन्होंने इस मामले में पेंडिंग केस चीफ जस्टिस को रेफर करने का फैसला किया है. जस्टिस अरुण मिश्रा की बेंच ने इस मामले में चीफ जस्टिस से आग्रह किया है कि वह जुडिशल और एडमिनिस्ट्रेटिव साइड पर फैसला हैं. जस्टिस लोकुर, कुरियन जोसेफ और नवीन गुप्ता की बेंच ने जस्टिस अरुण मिश्रा की अगुवाई बेंच के 8 फरवरी के फैसले पर असहमति जताई थी.
'केजरीवाल-सिसोदिया देखते रहे, मुख्य सचिव पिटते रहे'
दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ मारपीट के मामले में गिरफ्तार आम आदमी पार्टी के दोनों विधायकों को कोर्ट से झटका लगा है. अमानतुल्लाह खान और प्रकाश जारवाल को कोर्ट से जमानत नहीं मिली है. दोनों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया है.
हिंदी समाचार पत्र दैनिक जागरण की खबर के मुताबिक दोनों विधायकों को जमानत नहीं मिलने की सबसे बड़ी वजह दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल के सलाहकार वीके जैन की गवाही रही.
पुलिस ने कहा कि इस मामले में मुख्यमंत्री के सलाहकार वीके जैन का अहम बयान लिया गया है. उन्होंने सात लोगों के नाम लिए हैं. जैन ने कोर्ट में साफ कहा कि मुख्य सचिव के साथ 'आप' विधायकों ने मारपीट की शुरुआत की थी, लेकिन मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री ने बचाने की कोई कोशिश नहीं की.
दिल्ली पुलिस ने जब बुधवार को पूछताछ की थी तब जैन ने कुछ भी नहीं कहा था. वह इस पूरे मामले पर बचते हुए नजर आए थे.
भारत में बढ़ा भ्रष्टाचार
अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल की ताज़ा रिपोर्ट की माने तो भ्रष्टाचार को लेकर भारत के सरकारी क्षेत्र की छवि दुनिया की निगाह में और ज़्यादा ख़राब हुई है. वैसे 2015 की तुलना में स्थिति में सुधार के संकेत हैं.
जनसत्ता में प्रकाशित खबर के अनुसार संस्था की ताज़ा रिपोर्ट ग्लोबल करप्शन इंडेक्स-2017 में भारत को 81वें स्थान पर रखा गया है जबिक पिछले साल भारत 79वें स्थान पर था.
भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ फ सरकारों को एक सशक्त संदेश देने के उद्देश्य से 1995 में शुरू किए गए इस सूचकांक में 180 देशों की स्थिति का आकलन किया गया है.
यह सूचकांक विश्लषकों, कारोबारियों और विशेषज्ञों के आकलन और अनुभवों पर आधारित बताया जाता है. इसमें पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं के लिए काम की आजादी जैसी कसौटियां भी अपनाई जाती हैं.