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बांग्लादेश की ज़मीन अपने आप भारत के हिस्से आ रही है!
- Author, शुभज्योति घोष
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बांग्ला सेवा
त्रिपुरा के दक्षिणी हिस्से से सटे बांग्लादेश की सीमा के नज़दीक भारतीय इलाका है मुहुरीचार यानी मुहुरी नदी की तराई वाला इलाका.
यहां से कई हज़ार लोग हर साल की तरह इस बार भी मतदान करने के लिए भारत के मुख्य भूभाग पहुंचे. भारत के पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में रविवार विधानसभा चुनावों के लिए मतदान हुआ था.
इस जगह को लेकर भारत और बांग्लादेश दोनों का दावा है कि ये उनका इलाका है, लेकिन यहां रहने वाले लोगों के लिए ये विवाद कभी ना खत्म होती समस्या बन गया है.
दक्षिण त्रिपुरा के सदर बिलोनिया ज़िले को घेरकर बहने वाली मुहुरी नदी के ऊपर बने बांध के बीचों-बीच भारतीय सीमा सुरक्षा बल की सतर्क चौकी है. सामने दूर-दूर तक जहां नज़र जाए वहां हरे-भरे खेत खलिहान हैं और उनमें कहीं-कहीं आपको बकरी और गायें भी दिख जाती हैं.
बस थोड़ी ही दूरी पर आपकी नज़र अटक जाएगी कुछ पीले रंग के झंडों पर जो हवा में लहराते हुए आपका ध्यान खुद ही अपनी ओर खींच लेते हैं. ये झंडे भारत और बांग्लादेश के बीच मौजूद अस्थायी सीमा को दर्शाते हैं.
मुहुरीचार यानी मुहुरी नदी की तराई वाले करीब 700 एकड़ के इस भूखंड की भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति ही कुछ ऐसी है कि भारत-बांग्लादेश के बीच समझौता होने के बावजूद इस जगह पर आकर भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा की लकीर ठीक से नहीं खींची जा सकी. यहां राजनीति और भूगोल आपस में घुलमिल गए हैं.
अपने-अपने दावे
त्रिपुरा विश्वविद्यालय में भूगोल के अध्यापक सप्तऋषि मित्र कहते हैं, "ये मान लिया गया है कि नदी के बीचों-बीच की लकीर ही दोनों देशों के बीच की सीमा रेखा है. लेकिन यहां नदी एक भूखंड को घेर कर बहती है."
वो कहते हैं, "मामला ये है कि जिस इलाके को हम मुहुरी कहते हैं वो इलाका वहां है जहां नदी मुड़ती है. वक्त और मौसम के साथ-साथ पानी की गति और नदी का रास्ता भी बदलता रहता है यानी कि वो खिसकती रहती है."
"जैसे-जैसे नदी रास्ता बदलती है उसके किनारे भी बदलते रहते हैं. यही इस समस्या की जड़ है क्योंकि एक तरफ जहां नदी ज़मीन काट कर बढ़ रही है दूसरी तरफ से वो सिकुड़ रही है यानी अपने किनारे से खिसक रही है."
वक्त के साथ भौगोलिक स्थिति में परिवर्तन हुआ - नदी बांग्लादेश की तरफ़ खिसकती गई तो भारत की सीमा की तरफ़ का भूभाग बड़ा होता गया.
बाद में यहां भारतीय ज़मीन की तरफ़ एक कृत्रिम सीमारेखा बना दी गई जो अब यहां विवाद का मुख्य कारण बन गई है.
इस विवाद के केंद्र में है महादेव साहा का परिवार जिसमें उनकी पत्नी, बच्चे, दादी और उनके मवेशी और मुर्गियां हैं. रविवार को महादेव ने बेलोनिया शहर में जाकर त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के लिए मतदान किया.
अपने घर की ड्योढ़ी पर बैठे महादेव ने चुनाव के बारे में बताया, "मैं बेलोनिया शहर की सीमा पर हूं. ये जगह है मुहुरी नदी की तराई वाली ज़मीन पर. मैं वोट देने के लिए गर्ल्स स्कूल गया जो यहां से तीस किलोमीटर दूर है."
इस तराई वाले इलाके में कुल कितने लोग रहते हैं इस बारे में वो कहते हैं, "मुझे ठीक-ठीक कुछ पता नहीं हैं, लेकिन मैं कह सकता हूं कि यहां 10-15 हज़ार लोग रहते होंगे. 10-15 हज़ार तो हमारे इसी टोले में होंगे. तराई वाले इलाके में तो मैं अकेला ही हूं."
'बांग्लादेश से परेशानी नहीं'
उनका कहना है, "मैं चाहता हूं कि सरकार हमारी बात सुने. मेरे लिए वहां से बेलोनिया आना आसान नहीं. वहां मेरे घर में मेरी दादी हैं जो चल नहीं सकती हैं. जब तक वो चल सकती थीं मैंने बहुत कोशिश की कि मैं यहां से निकलकर दूसरे इलाके में जाकर बस जाऊं. लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सका. जगह नहीं मिली तो इसीलिए मैं यहीं पर हूं."
महादेव बताते हैं कि उनके खेत तराई वाले इलाके से सटे हुए हैं और उनके जानवर भी खेतों में चरते हुए उस तरफ निकल जाते हैं, लेकिन बांग्लादेश के सीमा सुरक्षा बलों के साथ उनकी कभी कोई कहासुनी नहीं हुई.
महादेव कहते हैं, "हमारे साथ तो ऐसा कभी कुछ नहीं हुआ. हम तो इस झंडे के इस तरफ़ हैं, इसीलिए हमें परेशानी नहीं होती. झंडे के उस तरफ़ खेती करने पर बांग्लादेश सीमा सुरक्षा बल के लोग हमसे लड़ाई करते हैं. वो हमसे कहते हैं कि यहां खेती मत करो. अभी तो कोई ऐसी समस्या नहीं क्योंकि हम खुद ही उस तरफ नहीं जाते. लेकिन जो लोग गए हैं उन्हें मुश्किल हुई है ऐसा मैंने सुना है."
वो बतते हैं कि यहां बीच-बीच में सरकारी अधिकारी दौरे के लिए आते रहते हैं, लेकिन वो भी इस मामले में कुछ नहीं करते.
वो कहते हैं, "सरकारी अधिकारी आए थे. वहां जो दिख रहा है न ताड़ का पेड़, वहां बैठने की जगह बनाई. वो उसके नीचे बैठे, चाय मिठाई खाई. उसके बाद उन्होंने क्या कहा मैंने उसके बारे में कुछ नहीं सुना. वो लोग तो हमेशा मीटिंग करते हैं. मीटिंग करते हैं और खाना-पीना करते हैं."
मुहुरी नदी की तराई पर विवाद आज तक क्यों खत्म नहीं किया जा रहा. सीमा के नज़दीक मुहुरीचार घेंसा में रहने वाले वृद्ध नारायण चंद्र मजूमदार यही सवाल पूछते हैं.
वो कहते हैं, "सभी कह रहे हैं कि इस मामले में कोई फ़ैसला लिया जाए तो सबके लिए बेहतर होगा. चार का इलाका ऐसे ही खुला पड़ा हुआ है. हम भारतीय हिस्से में रहते हैं इसका समाधान अब हो जाना चाहिए. सीमा को लेकर यहां ऐसा कोई विवाद नहीं है, लेकिन हम चाहते हैं कि ये मामला निपटाया जाए."
खिसक रही है ज़मीन
मुहुरी नदी की तराई को लेकर सोमप्रकाश धर लंबे समय से अध्ययन कर रहे हैं. वो बताते हैं कि बिलोनिया में मुहुरी नदी का जो मोड़ है वहां नदी मोड़ पर लगातार बांग्लादेश की तरफ बढ़ रही है जिस कारण तराई वाला इलाका अब भारत की तरफ़ खिसकने लगा है.
वो बताते हैं कि ये ज़मीन बेहद उपजाऊ है और इस कारण दोनों दी देश इस पर अपना अधिकार छोड़ने के लिए राज़ी नहीं हैं.
सोमप्रकाश धर कहते हैं, "साल 1937 के आस-पास यहां सेटलमेन्ट सर्वे किया गया था. उस समय जो स्थिति थी वो अब नहीं है. नदी में तलछट जमने के कारण लगातार नदी बांग्लादेश की तरफ बढ़ रही है और उधर तराई का इलाका कम हो रहा है, जबकि भारत की तरफ़ ये इलाका लगातार बढ़ रहा है."
"नदी के बीचों-बीच जो सीमा निश्चित की गई थी वो अब भारत की तरफ की तराई के इलाके तक पहुंच गई है. इस कारण भारत की तरफ़ जो अस्थाई ज़मीन तैयार हो गई है वो बेहद उपजाऊ है."
धर कहते हैं, "मुद्दे की बात ये है कि इस इलाके की ज़मीन की उर्वरता साल दर साल बढ़ती जा रही है."
मुहुरी की तराई वाले इलाके में सीमा विवाद ना सुलझने की सूरत में यहां कांटेदार बाढ़ लगा दी गई है.
लेकिन जब तक भारत और बांग्लादेश के बीच इस इलाके को लेकर कोई ठोस हल नहीं निकल जाता तब तक सीमा के नज़दीक रहने वाले इन गांववालों के लिए सीमा पर एक अदृश्य दीवार है जिसे लांघ कर वो इस बार त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में वोट देने पहुंचे.