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ब्लॉग: क्यों मुस्लिम देशों का पसंदीदा है भारत?
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता दिल्ली
ये सच है कि मुस्लिम देशों में भारत का आम तौर से बहुत आदर किया जाता है. उन्हें भारत से मोहब्बत भी है. ऐसा मैं मुस्लिम देशों में जाकर महसूस करता हूँ.
मुस्लिम देशों से आए लीडर्स को भी भारत सरकार सम्मान देती है. ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी के भारतीय दौरे की शुरुआत हैदराबाद की एक शिया मस्जिद में जुमे की नमाज़ का नेतृत्व करने से होती है.
लेकिन इन दिनों मेरे मुस्लिम दोस्त कहते हैं कि उन्हें अपने ही देश में सम्मान नहीं मिलता. उन्हें शक़ की निगाह से देखा जाता है और पाकिस्तानी कहा जाता है.
मुस्लिम देशों का भारत प्रेम
हाल में अफ़ग़ानिस्तान से आए कुछ पत्रकारों ने बीबीसी से हुई एक मुलाक़ात में कहा कि मक्का और मदीना के बाद वो भारत से सबसे अधिक प्यार करते हैं.
ये सुनकर लोगों को आश्चर्य हुआ होगा लेकिन मुझे नहीं हुआ. मैंने कई मुस्लिम देशों का दौरा किया है. पाकिस्तान और बांग्लादेश छोड़कर लगभग हर मुस्लिम देश के लोगों के दिलों में भारत के लिए भरपूर इज़्ज़त और प्रेम पाया.
पाकिस्तान की सरकार को अलग रखें तो आप वहां की आम जनता में भी भारत के लिए इज़्ज़त पाएंगे.
भारतीय जान कर मिलती इज़्ज़त
पहली बार मैं साल 2012 में मोरक्को गया था. मुझे लगा भारत से हज़ारों मील दूर उत्तर अफ्रीका के इस देश में भारत को कम ही लोग जानते होंगे. लेकिन केवल जानना तो छोड़िये, वो भारत के बारे में काफ़ी जानकारी भी रखते थे और उनकी बातों से भारत के लिए इज़्ज़त भी झलकती थी.
ऐतिहासिक शहर मराकेश के एक पुराने बाजार में एक व्यक्ति ने मुझसे अरबी में पूछा, "अंता मिनल हिन्द? (क्या आप भारत से हैं)?". मैंने सोचा अगर हाँ में जवाब दिया तो पता नहीं उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी. मैंने डरते-झिझकते हाँ कहा तो वो मुझसे लिपट गया.
उसने अरबी में बहुत शब्द कहे लेकिन मुझे कुछ के ही मायने समझ में आये. उसने जो सबसे अहम बात कही थी, वो ये कि उसे भारत बहुत पसंद है.
सभी समुदायों की आज़ादी सबसे बड़ी वजह
वहां से मैं मिस्र गया. लोग मुझे मिस्र का ही समझ कर अरबी में बातें करना शुरू कर देते थे. लेकिन जब मैं उन्हें बताता कि मैं भारतीय हूँ तो वो खुश हो जाते थे और कहते कि उन्हें भारत जाने की तमन्ना है. वो ये कभी नहीं पूछते थे कि मैं मुस्लिम हूँ या हिन्दू. उनके लिए इतना काफ़ी था कि मैं "अल-हिंद" का हूँ.
संयुक्त अरब अमीरात, फ़लस्तीन, उज़्बेकिस्तान, कज़ाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और ईरान जैसे मुस्लिम देशों में भारत का नाम काफ़ी ऊँचा है.
मैंने पिछले कुछ सालों में इसका ज़िक्र कई लोगों से किया है. इसके कई कारण बताए जाते हैं. एक बड़ा कारण ये है कि वो भारत को एक बहु-सांस्कृतिक और बहुभाषी देश की तरह से देखते हैं जहाँ सभी समुदायों को अपने त्योहारों में जश्न मनाने की आज़ादी है और जहाँ हर तरह के लोगों की खपत है. उन्हें हिन्दू धर्म में भी काफ़ी दिलचस्पी होती है.
लोकतंत्र और बॉलीवुड भी बड़ी वजह
दूसरी वजह भारत का लोकतंत्र है, जो अधिकतर मुस्लिम देशों में नहीं है. ज़ाहिर है लोकतंत्र से वंचित मुस्लिम समाजों में भारत का क़द ऊँचा नज़र आता है. तीसरा कारण है बॉलीवुड. इसकी पहुँच इतनी लम्बी है कि भारतीय फिल्मों को देख कर वो भारत के बारे में काफ़ी कुछ जान जाते हैं और कई लोग तो हिंदी भी सीख लेते हैं
दिलचस्प बात ये है कि इन मुस्लिम देशों में पाकिस्तान का नाम लेने वाले कम ही लोग होते हैं. ना के बराबर. सऊदी अरब का उदाहरण बड़ा अहम है. मैं वहां कभी गया नहीं लेकिन मेरे दोस्त और रिश्तेदार वहां रहते हैं जिनके अनुसार उन्हें पाकिस्तान के मुक़ाबले अधिक तरजीह दी जाती है.
हाल तक सऊदी अरब पाकिस्तान से काफ़ी क़रीब था. पाकिस्तान को ऐसा लगता था कि मुसलमान होने की वजह से सऊदी अरब से उसकी दोस्ती क़ुदरती है. लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के 2010 के सऊदी अरब के दौरे के बाद सऊदी अरब और भारत के बीच नज़दीकियां बढ़ीं. और ये अधिक गहरी हुईं 2015 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सऊदी अरब गए.
वहां की सरकार ने मोदी को सब से बड़े सऊदी पुरुस्कार "किंग अब्दुल अज़ीज़ आर्डर" से नवाज़ा. ये सम्मान अब तक पाकिस्तान के किसी लीडर को नहीं दिया गया है.
मुस्लिम देशों में बुलंदी कायम करने में कामयाब
भारत और सऊदी अरब के क़रीब आने का मतलब था सऊदी अरब ने पाकिस्तान से दूरी बनायी. दिल्ली और रियाद के बीच क़ुरबत (घनिष्ठता) आपसी फायदे पर निर्भर है. दोनों देशों का आपसी व्यापार सालाना 40 अरब डॉलर का है, जबकि पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब का व्यापार 7 अरब डॉलर है.
उधर सऊदी अरब में काम करने वाले भारतीयों की संख्या 30 लाख है जबकि पाकिस्तान के लोग इसके आधे भी नहीं. कहने का मतलब ये है कि सऊदी अरब को समझ में आया कि "इस्लामी" पाकिस्तान से दोस्ती रखने से अधिक फायदा "हिन्दू" इंडिया से है.
प्रधानमंत्री मोदी के बारे में ये कहना होगा कि उन्होंने मुस्लिम देशों को निराश नहीं किया है. वो अब तक दो बार संयुक्त अरब अमीरात का दौरा कर चुके हैं. सऊदी अरब से लेकर मध्य एशिया के मुस्लिम देशों की यात्रा कर चुके हैं.
भारत के वक़ार (प्रतिष्ठा) को और भी बुलंद करने में मोदी कामयाब रहे हैं. ये एहसास मुझे मुस्लिम देशों के लोगों से बात करने से होता है.
लेकिन देश में मुस्लिम विरोधी तत्वों के काबू करने में नाकाम
मेरे हिसाब से जहाँ मोदी नाकाम रहे हैं वो है अपने ही देश में मुस्लिम विरोधी तत्वों को काबू करने में. केवल यही नहीं पत्रकार गौरी लंकेश और तर्कसंगतवादी नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे और एम.एम. कलबुर्गी जैसे लोगों की हत्याओं से भी भारत की छवि पर असर पड़ा है और इसकी नैतिक ज़िम्मेदारी भी नरेंद्र मोदी पर आयद होती है. आखिर वो केंद्र सरकार के मुखिया हैं.
नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से जो देश में माहौल बना है वो भारत से प्रेम करने वाले देशों में भारत के प्रति निराशा में बदल सकता है. सच्ची देश भक्ति का तक़ाज़ा है कि भारत के प्रयासों को निराश न किया जाए.