You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
ब्लॉग: क्या है जो मोदी को 'महान' बनने से रोकता है
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सुना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी एक यादगार विरासत छोड़ना चाहते हैं. आज से सौ साल बाद उनकी विरासत को किस तरह से देखा जाएगा? जब मोदी काल का इतिहास लिखा जाएगा तो उन्हें किस तरह याद किया जाएगा?
पांच ऐसे नेताओं के नाम गिनाने हों जो पिछले सौ सालों में इतिहास के पन्नों पर अमर हैं तो वे नाम कौन से होंगे?
आपके नाम अलग हो सकते हैं मेरी लिस्ट में ये पांच नाम ये हैं: महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, बी.आर आंबेडकर, इंदिरा गाँधी और मनमोहन सिंह. इन सभी नामों पर शायद सबकी सहमति नहीं होगी.
पहले तीन नामों पर शायद किसी को संदेह नहीं होना चाहिए लेकिन आख़िरी दो नामों पर लोगों की अलग-अलग राय हो सकती है.
इंदिरा गाँधी क्योंकि उन्होंने बांग्लादेश को आज़ाद कराने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसके लिए उन्हें दुर्गा भी कहा गया. लेकिन क्या 1975 से 1977 तक का आपातकाल नकी विरासत को कमज़ोर करता है?
मर्दों से भरी सियासी दुनिया में इंदिरा गांधी का क़द काफी ऊंचा था और सच में वो एक दबंग नेता थीं. उनकी शख़्सियत से आत्मविश्वास झलकता था.
मनमोहन: आर्थिक उदारवाद के नायक
मनमोहन सिंह को इस पांच नेताओं की सूची में शामिल करना कई लोगों को चौंका सकता है. लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि वित्त मंत्री की हैसियत से था.
वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ही थे जिन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से जोड़ा और विदेशी निवेशकों को भारत में निवेश का कामयाब न्योता दिया. आज हमें समझ में आता है कि 1991 में मनमोहन सिंह का अर्थव्यवस्था के उदारीकरण का फैसला कितना सही था. यह एक 'गेम चेंजर' साबित हुआ. साल 1991 के पहले का भारत मनमोहन सिंह के क़दम के कारण एक नए दौर में शामिल हो गया.
एपीजे अब्दुल कलाम और अटल बिहारी वाजपेयी भी पांच सर्वश्रेष्ठ नेताओं की फेहरिस्त में शामिल हो सकते हैं.
मोदी: अपरंपरागत तरीक़े से काम करने की हिम्मत
नरेंद्र मोदी के आलोचक बहुत हैं और इन दिनों उनकी संख्या बढ़ रही है. लेकिन वो भी अपना नाम इतिहास में लिखवाने की योग्यता रखते हैं. उन्हें अपना 56 इंच का सीना दिखने के बजाय अपने क़द को बुलंद करने में जुट जाना चाहिए और छोटी राजनीति से दूर रहना चाहिए.
गांधी जी को जीते जी 'महात्मा' की उपाधि मिल चुकी थी. जवाहरलाल नेहरू 'चाचा नेहरू' बन चुके थे. प्रधानमंत्री के नज़दीकी लोगों को लगता है कि वो भी इस तर्ज़ पर एक विरासत छोड़ना चाहते हैं.
नरेंद्र मोदी में बहुत सारे ऐसे गुण हैं जो उन्हें महानता की बुलंदियों तक ले जा सकते हैं. उनके आलोचक भी मानते हैं कि वह सबसे अच्छे संचारकों में से एक हैं. आम लोगों से जुड़ने की क्षमता उनमें कूटकर भरी है.
कभी कभी उनमें एक अपरंपरागत तरीके से काम करने की हिम्मत दिखती है जिसमें हमेशा कामयाबी नहीं मिलती लेकिन इससे उनकी हिम्मत नहीं टूटती. प्रधानमंत्री मोदी बड़ी मेहनत से रोज़ देर तक काम करते हैं और अच्छी सेहत के मालिक हैं. जब से वो प्रधानमंत्री बने हैं मुझे नहीं याद आता उन्होंने कभी छुट्टी ली हो. दूसरी तरफ़ उनके प्रतिद्वंद्वी राहुल गांधी इन चार सालों में कई बार छुट्टी मनाने विदेश जा चुके हैं.
विदेश दौरों के दो फायदे
नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद दर्जनों देशों का सरकारी दौरा किया है. इस पर लोग उनकी आलोचना भी करते हैं, कुछ उनका मज़ाक़ भी उड़ाते हैं. लेकिन उनके लगातार विदेशी दौरों से दो फायदे हुए हैं. पहला अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का क़द बढ़ा है. मैं हाल में ऐसे दो देशों से लौटा हूं जहाँ नरेंद्र मोदी सरकारी दौरे पर गए थे. ये देश हैं- संयुक्त अरब अमीरात और इसराइल.
इन दोनों देशों के कई लोगों ने मुझसे कहा कि किस तरह मोदी के दौरे के बाद से भारत के बारे में उनकी राय बेहतर हुई है. वो ये भी कहते हैं कि मोदी को वो बहुत पसंद करते हैं.
दूसरा फायदा है प्रवासी भारतीयों का भारत से पहले से अधिक मज़बूत तरीके से जुड़ना. हम जानते हैं कि वो जहां भी जाते हैं प्रवासी भारतीयों से जोश से मिलते हैं और उन्हें भारत में आकर निवेश का न्योता देते हैं. संयुक्त अरब अमीरात और इसराइल में रहने वाले प्रवासी भारतीय नरेंद्र मोदी को अपना हीरो मानते हैं. इनमें मुसलमान और ईसाई भी शामिल हैं.
कहां हो रही चूक?
प्रधानमंत्री मोदी के पास अच्छी विरासत छोड़ने का अवसर है. अगर उन्होंने अगले साल का चुनाव जीता तो उनके पास समय भी है. सेहत भी है. भाषण भी है. लोगों से जुड़ने की अदा भी है.
इसके लिए उन्हें एक लम्बे समय के लिए शासन में बने रहना होगा, कुछ 'गेम चेंजिंग' आइडियाज़ लाने होंगे और उन पर अमल करना होगा. उनके पास शब्द हैं, वो एक ज़बरदस्त भाषण देने वाले नेता हैं. उनमें क़द्दावर नेता बनने के कई गुण हैं लेकिन अपना नाम इतिहास के पन्नों पर लिखाने और अमर रहने का मौक़ा वह गंवा रहे हैं.
पिछले चार साल में समाज जाति और सांप्रदायिक लीक पर काफ़ी विभाजित हो चुका है. इसके ज़िम्मेदार वो ख़ुद हैं. इतिहासकार इसका ज़िम्मेदार उन्हें ही मानेंगे. गोरक्षकों की बढ़ती हिंसा के ज़िम्मेदार वही होंगे. उनकी ख़ामोशी उन्हें महान बनने से रोकती है.
'गेम चेंजर आइडिया की ज़रूरत'
प्रधानमंत्री ये ज़रूर कहते हैं कि वो 130 करोड़ भारतीयों के प्रधानमंत्री हैं लेकिन ये कहना ग़लत नहीं होगा कि वो ख़ुद को अपनी पार्टी के समर्थकों और अपने 'भक्तों' का प्रधानमंत्री ही समझते हैं.
उन्हें अच्छी विरासत छोड़ने के लिए सबका प्रधानमंत्री बनना पड़ेगा. भारत के बहुलतावादी समाज के बिखरते ताने-बाने को जोड़ना होगा. तुच्छ सोच और तुच्छ सियासत से ऊपर उठना होगा. और फिर एक गेम चेंजर आइडिया लाना पड़ेगा जिससे देश एक नए दौर में प्रवेश कर सके.
हम सब ये जानते हैं कि ख़ुद को महान कहने या सोचने से कोई महान नहीं हो जाता. देश महान कहे तो कोई महान होता है. तब ही आने वाले दौर में इतिहासकार उनकी विरासत को पहचानेंगे.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)