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नज़रिया: मोदी सरकार के लिए उल्टा तो नहीं पड़ जाएगा ये बजट
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने गुरुवार को देश का आम बजट पेश किया. मौजूदा सरकार का यह अंतिम पूर्ण बजट था.
अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव और आगामी कई विधानसभा चुनावों से पहले यह उम्मीद की जा रही थी कि यह बजट लोकलुभावन साबित हो सकता है.
माना जा रहा था कि वित्त मंत्री आम जनता के लिए कई सौगातें लेकर आएंगे और इससे आगामी चुनावों से पहले वे अपनी पार्टी के लिए एक सकारात्मक माहौल तैयार करने की कोशिश भी करेंगे.
तो क्या यह बजट आम जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने में कामयाब रहा और क्या भाजपा को इस बजट से आने वाले चुनावों में कुछ फायदा मिलता हुआ दिख रहा है, इसी विषय पर बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी ने बात की बिजनैस स्टैंडर्ड की वरिष्ठ पत्रकार अदिति फड़निस से.
आगे पढ़िए, अदिति फड़निस की राय:
कम ख़र्च में ख़ुश करने की कोशिश
सरकार का कहना है कि वह राजकोषीय घाटे को बरक़रार नहीं रख पाएंगे क्योंकि जितना सरकार ने पहले से तय किया था उससे ज़्यादा उनका ख़र्च हो गया है. सरकार ने यह भी कहा है कि आने वाले वक्त में भी वे ख़र्च तो करेंगे लेकिन उनके पास टैक्स उस अनुपात में नहीं आएगा.
इस लिहाज़ से यह कोई बहुत अच्छी बात नहीं है. इसे हम पूरी तरह से चुनावी बजट कह सकते हैं क्योंकि वित्त मंत्री ने विशेष रूप से उन तबकों पर नज़र डाली है जो चुनावी रूप से महत्वपूर्ण हो सकते हैं.
इस बजट में ग़रीब तबके के लिए बहुत कुछ है. स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकार ने कई घोषणाएं की हैं. वरिष्ठ नागरिकों के लिए भी नई योजनाएं आई हैं. महिलाओं के लिए पीएफ में ज़रूरी अंशदान को 12 से घटाकर 8 फीसदी कर दिया गया है, ताकि हर महीने उनके हाथ में आने वाला वेतन थोड़ा बढ़कर आए.
ये सब कुल मिलाकर लोकलुभावन योजनाएं है जिसमें सरकार यह सोच रही है कि इसमें ज़्यादा ख़र्च भी नहीं होगा और इससे लोगों को लगेगा कि सरकार हमारे बारे में सोचती है.
चुनाव में मिलेगा फ़ायदा?
कौन सी चीज़ चुनाव में ज़्यादा मददगार साबित होती है, यह कहना मुश्किल है. हालांकि योजनाओं की घोषणा होने के बाद लोगों की सोच में थोड़ा तो फर्क आएगा लेकिन अंतत: यही अहम होगा कि सरकार कितनी नौकरियां देने में कामयाब होती है या गांव और दूरदराज़ के इलाके में स्वास्थ्य के सिस्टम को बेहतर कर पाती है या नहीं.
चुनावी घोषणाओं का बजट में इतना उल्लेख नहीं होता. बजट तो यह बताने के लिए होता है कि सरकार के पास कितना पैसा है और वह कितना ख़र्च कर सकती है. साथ ही बजट के ज़रिये सरकार की प्राथमिकताएं भी पता चलती हैं.
योजनाएं पूरी कर पाएगी सरकार?
सरकार की अधिकतर योजनाओं में राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करना बेहद ज़रूरी होता है. जैसे कृषि क्षेत्र में सरकार ने कई घोषणाएं की हैं, इसमें बहुत ज़्यादा भूमिका राज्य सरकारों को ही निभानी है.
अब ज़्यादातर राज्यों में भाजपा की ही सरकार है तो शायद आने वाले वक़्त में प्रधानमंत्री कोई बैठक बुलाएंगे जिसमें वे मुख्यमंत्रियों के साथ यह तय करेंगे कि बजट की घोषणाओं को किस तरह आगे ले जाया जाए. लेकिन अंत में यह बात अहम होती है कि सरकार कितनी योजनाओं को ज़मीन पर उतारने में कामयाब हो पाती है.
हमें याद है कि सबसे ज्यादा लोक लुभावन बजट 1990 के दशक में पी चिंदबरम का बजट था, जिसे उनका 'ड्रीम बजट' कहा गया था.
उस बजट में बहुत से लुभावने वायदे किए गए थे, लेकिन नतीजा यह हुआ था कि सरकार का राजकोषीय घाटा बहुत ज़्यादा बढ़ गया था और सरकार को इसका नुकसान ही हुआ था.
इसलिए अगर सरकार बजट में कुछ कहती है तो उसे वह करके भी दिखाना होता है. इस सरकार के साथ भी यही बात है कि वह अपने तमाम वायदों को पूरा कर पाती है या नहीं.
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