भारत से भी छोटी सेना क्यों करने जा रहा है चीन?

अक्सर कहा जाता है कि भारत के पास दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्मी है. इसका सीधा मतलब आर्मी में मैनपावर (सैनिकों की संख्या) से है.

सैनिकों की संख्या ज़्यादा होने से कोई आर्मी ताक़तवर नहीं हो जाती है, बल्कि विशेषज्ञों का मानना है कि सैनिकों की बड़ी संख्या आर्मी के लिए बोझ होती है.

भारत के संदर्भ में देखें तो इसी तरह की बात कही जा रही है. इंस्टीट्यूट फ़ॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस (आईडीएसए) के लक्ष्मण कुमार बेहरा कहते हैं कि भारत अपने बजट की जितनी राशि रक्षा पर आवंटित करता है, उसका क़रीब 90 फ़ीसदी सैनिकों पर खर्च हो जाता है.

मतलब आवंटित राशि का मामूली हिस्सा ही सेना के आधुनिकीकरण पर खर्च करने के लिए बचता है. भारतीय आर्मी में संख्या बल क़रीब 14 लाख है.

चीन अपने सैनिकों की संख्या में लगातार कटौती कर रहा है. जुलाई 2017 में चीन की सरकारी मीडिया ने कहा था कि पीपल्स लिबरेशन आर्मी के संख्या बल में बड़ी कटौती होगी. चीन 20 लाख की संख्या वाले सैनिक बलों को संतुलित करने कोशिश में लगा है. सरकारी मीडिया के मुताबिक चीन लगातार सैनिकों की संख्या में कटौती कर रहा है.

कितनी कमी आई है चीनी सेना में

इस रिपोर्ट के मुताबिक चीन सैनिकों की संख्या भले कम कर रहा है, लेकिन नेवी, मिसाइल ताक़त और रणनीतिक क्षमताओं का व्यापक रूप से विस्तार कर रहा है.

चीनी आर्मी के मुखपत्र पीएलए डेली के अनुसार ऐतिहासिक रूप से पहली बार सैनिकों की संख्या 10 लाख से नीचे तक लाई जाएगी. रिपोर्ट के अनुसार चीनी आर्मी में व्यापक रूप से सुधार की प्रक्रिया जारी है.

पीएलए डेली की रिपोर्ट में कहा गया है, ''नेवी, रॉकेट फ़ोर्स, रणनीतिक क्षमता को बढ़ाया जाएगा. एयरफ़ोर्स में जवानों की संख्या में कोई कटौती नहीं होगी.'' चीन के रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2013 में साढ़े आठ लाख लड़ाकू सैनिक थे. अभी तक साफ़ नहीं है कि सैनिकों की संख्या में कितनी कमी होगी.''

चीन ने 1980 के दशक से ही सेना के आधुनिकीकरण के साथ ही संख्या को संतुलित करना शुरू कर दिया था. इसके बाद से पीएलए की संख्या में कई बार कटौती की जा चुकी है.

एक रिपोर्ट के अनुसार चीन ने 1985 में 10 लाख सैनिकों की संख्या कम की थी. 1997 में पांच लाख और 2003 में दो लाख मैनपावर को कम किया गया. सबसे हाल में 2015 में चीन ने अपनी आर्मी से तीन लाख मैनपावर को कम किया था.

सेंट्रल मिलिटरी कमीशन चीन के सभी आर्म्ड फ़ोर्सेज को नियंत्रित करता है. सीएमसी ने एक बार फिर से संख्या में कटौती की बात कही है. जनवरी 2016 में सीएमसी ने चीन की सेना में सुधार को लेकर एक दस्तावेज प्रकाशित किया था.

इसने चीनी सेना के आधुनिकीकरण का लक्ष्य 2020 तक रखा है. इस दस्तावेज में लिखा गया है कि चीनी सेना को बड़े आकार से गुणवत्ता की तरफ़ ले जाना है. सीएमसी का कहना है कि 'नॉन कॉम्बैटिंग' मैनपावर में और कटौती की जाएगी.

चीन कहां पैसे खर्च कर रहा है

चीन आख़िर सैनिक संख्या बल छोटा क्यों कर रहा है? आईडीएसए के लक्ष्मण कुमार बेहरा कहते हैं, ''यह बिल्कुल सही बात है कि चीनी आर्मी के मैनपावर में कटौती लगातार जारी है. यह चीनी सेना के आधुनिकीकरण का हिस्सा है. चीन मैनपावर पर खर्च कम कर आधुनिकीकरण और तकनीक पर ज़्यादा ज़ोर दे रहा है. हम किसी भी देश की सैन्य शक्ति का आकलन सैनिकों के संख्या बल के आधार पर नहीं करते हैं.''

बेहरा कहते हैं, ''किसी देश की आर्मी कितनी मजबूत है इसका निर्धारण फाइटर प्लेन, युद्धपोत, आधुनिक पनडुब्बी, मिसाइल, कृत्रिम ख़ुफिया क्षमता, स्पेस और साइबर वॉर में विशेषज्ञता और आधुनिक प्रशिक्षण से होता है. भारत सरकार रक्षा क्षेत्र पर जितनी रक़म आवंटित करती है उसका 90 फ़ीसदी हिस्सा तो मैनपावर की सैलरी और पेंशन पर खर्च हो जाता है. चीन ने पिछले दो दशकों में अपने सैनिकों की संख्या में भारी कटौती की है. ज़ाहिर है चीन की अर्थव्यवस्था भारत से काफ़ी बड़ी है ऐसे में भारत को सेना के आधुनिकीकरण को लेकर और सजग रहने की ज़रूरत है.''

मोदी सरकार में मनोहर पर्रिकर रक्षा मंत्री थे तो उन्होंने सेना में सुधार के लिए लेफ्टिनेंट जनरल शेकटकर की अध्यक्षत में एक कमिटी बनाई थी. इस कमिटी ने कुल 99 सिफारिशें की थीं. सरकार ने 65 सिफ़ारिशों को 2019 तक लागू करने का वादा किया है. इस कमिटी ने भी सेना की संख्या को लेकर चिंता जताई थी.

कहा जा रहा है कि चीन सोवियत युग की सेना के केंचुल से बाहर निकल चुका है. दिसंबर 2015 में चीन ने पीएलए स्ट्रैटिजिक सपोर्ट फोर्स बनाने की घोषणा की थी. यह चीन का एक स्वतंत्र बल है जिस पर सीएमसी का नियंत्रण है. इस नए फोर्स का लक्ष्य पीएलए को स्पेस, साइबर शक्ति मुहैया कराना है. इसके साथ ही पीएलए को कृत्रिम इंटेलिजेंस ताक़त से भी लैस करना है.

चीन की सेना का तेज़ी से आधुनिकीकरण

2015 में चीन के रक्षा मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा था, ''सैनिकों की संख्या में कटौती सेना की क्षमता और उसकी संरचना को आधुनिक बनाने के लिए की जा रही है. इससे आर्मी को और प्रभावी, वैज्ञानिक के साथ आधुनिक बनाया जाएगा.''

चीन के इस क़दम पर कैनबरा स्थित ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में नेशनल सिक्योरिटी कॉलेज के प्रमुख प्रोफ़ेसर रॉरी मेडकाफ़ ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा था, ''चीन की इस कटौती से क्षेत्रीय चिंता में कमी आने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वो अपनी सेना को और आधुनिक बना रहा है. वो अपनी सेना को पारंपरिक चोले से निकाल आधुनिक खांचे में शिफ्ट कर रहा है.''

प्रोफ़ेसर मेडकाफ़ का कहना था, ''सैन्य बजट की बड़ी रक़म सैनिकों की तनख़्वाह पर खर्च हो जाती है. हाल के वर्षों में चीन ने सैनिकों के वेतन में काफ़ी बढ़ोतरी की है. ऐसे में सेना को आधुनिक बनाने के लिए चीन ने यह क़दम उठाया है.''

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