नज़रिया: सज़ा से लालू के राजनीतिक जीवन पर लगेगा पूर्णविराम?

लालू प्रसाद

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बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और जगन्नाथ मिश्र को चाईबासा कोषागार मामले में 5-5 साल की सज़ा सुनाई गई है.

यह सज़ा रांची में सीबीआई के विशेष न्यायाधीश एसएस प्रसाद ने सुनाई. चाईबासा कोषागार से अवैध तरीक़े से 33 करोड़ 67 लाख 534 रुपये निकाले गए थे.

लालू फ़िलहाल जेल में ही रहेंगे. ऐसे में ये सवाल उठता है कि क्या इस सज़ा से लालू के राजनीतिक जीवन में विराम लग जाएगा और लालू के राजनीतिक गलियारे से दूर रहने से 2019 के आम चुनावों में क्या फर्क पड़ेगा?

बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय ने वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश से यही जानने की कोशिश की.

लालू

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पढ़िए उर्मिलेश का नज़रिया

लालू प्रसाद का निजी, संसदीय या विधायक के तौर पर जो जीवन है, अगर सुप्रीम या हाईकोर्ट से लालू प्रसाद को राहत नहीं मिलती है तो संभव है कि इससे उनके चुनावी राजनीतिक जीवन में विराम लग जाए.

लेकिन इससे उनकी पार्टी या लालू की राजनीतिक गतिविधियों पर विराम लग जाएगा, ऐसा नहीं कहा जा सकता.

2013 में जब पहली बार लालू को दोषी ठहराया गया था, तब भी लोगों ने ये माना था कि उनके राजनीतिक जीवन का अंत हो गया. लेकिन अंत नहीं हुआ. लालू सत्ता में वापसी आए.

ये अलग बात है कि जनादेश मिलने के बाद नीतीश कुमार ने उनका साथ छोड़ दिया. ऐसे में अभी लालू के अंत की बात कहना सही नहीं होगा. मीडिया को भी 2013 की तरह गलती दोहरानी नहीं चाहिए.

मुलायम सिंह और लालू की पार्टी में यही फर्क है. दोनों परिवार केंद्रित पार्टी है. लेकिन आरजेडी बिहार में जिस विरासत से अब भी जुड़ी हुई है, वो पुरानी है. ये विरासत लोकदल, बीकेडी और सोशलिस्ट की है. इसमें अब रघुवंशप्रसाद सिंह, शिवानंद जैसे नए लोग इसमें शामिल हो गए हैं.

तेजस्वी यादव में हल्की सी एक राजनीतिक रौशनी दिखाई देती है. अगर वो राष्ट्रीय जनता दल को एकजुट और एकताबद्ध यूनाइडेट एक्शन के लिए विपक्ष को लामबंद करते हैं. क्योंकि बिहार में विपक्ष काफी मजबूत है. कांग्रेस, वामपंथी समेत कई दल हैं.

ऐसे हालात में मैं समझता हूं कि तेजस्वी बीजेपी और नीतीश कुमार के खिलाफ एक वैकल्पिक शक्ति खड़ी कर सकते हैं.

तेजस्वी यादव

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2019 चुनावों पर असर?

लालू के राजनीति से हटने का राष्ट्रीय स्तर पर ज़रूर असर होगा.

क्योंकि लालू प्रसाद का गांव, दलित, ओबीसी तबके में करिश्मा रहा है. लालू में जोखिम लेने का साहस और दमखम है. हालांकि इसकी कुछ सीमाएं भी हैं. जैसे लालू के पास प्रशासनिक विजन नहीं है.

जब वो मुख्यमंत्री थे, तो जैसे उन्हें काम करना चाहिए था उन्होंने नहीं किया. लेकिन इसके बावजूद बिहार में उत्पीड़न और दमन की शिकार जो दलित और ओबीसी जनता है, उसमें जाति और वर्ण उत्पीड़न का जो ख़ौफ़ है, उसकी वजह से इन लोगों ने लालू को अपना सितारा माना है.

लालू में दमखम तो रहा है, इसमें कोई दो राय नहीं है.

ऐसे में 2019 में विपक्ष की बड़ी लामबंदी की जो तैयारी हो सकती थी, उससे विपक्ष वंचित रहेगा. बिहार में इसका उतना असर नहीं होगा.

इसकी वजह ये है कि लालू के समर्थकों में आक्रोश दिखाई दे रहा है, जिसको पार्टी भुनाने की कोशिश कर रही है.

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