नज़रिया: सज़ा को भी अपने पक्ष में भुना लेंगे लालू यादव!

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- Author, मणिकांत ठाकुर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, पटना से
झटके चाहे अदालत से मिलें या सियासत से, लालू यादव मुश्किलों से उबरने में माहिर साबित होते रहे हैं.
चारा घोटाले के एक और मामले में हुई सज़ा को अपने लिए आघात नहीं, सियासी फ़ायदे वाला अवसर बनाने में वह जुट गए हैं.
जब राँची में विशेष अदालत उन्हें सज़ा सुना रही थी, तभी पटना में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के बाक़ी तमाम नेता उनके पुत्र तेजस्वी यादव को आगे करके अपनी सियासी जंग जारी रखने का ऐलान कर रहे थे.
चूँकि ऐसी परिस्थिति आने का अंदेशा लालू परिवार और उनकी पार्टी को पहले से था, इसलिए हालात से निबटने की तैयारी भी चल रही थी.

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तेजस्वी को विरासत सौंपने का मौक़ा!
सुप्रीम कोर्ट ने चारा घोटाले के एक मामले में सज़ायाफ़्ता लालू प्रसाद को उनसे जुड़े अन्य पाँच मामलों में कोई राहत नहीं दी.
इसलिए कोर्ट और जेल के चक्कर से जल्दी मुक्ति की जो उन्हें उम्मीद थी, उस पर पानी फिर गया.
इसी झटके के बाद तेजस्वी को अपनी सियासी विरासत सौंपने की हड़बड़ी उनमें दिखने लगी थी.
हुआ भी ऐसा ही. नीतीश सरकार में आरजेडी को साझीदार बनाने और उपमुख्यमंत्री के रूप में तेजस्वी को सियासी पहचान दिलाने का उन्हें मौक़ा मिल गया.
यहाँ तक कि सत्ता फिर से खो देने के बाद तेजस्वी यहाँ विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता बन गए.
अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो लालू आज अपने इस छोटे बेटे को आरजेडी का नेतृत्व संभालने लायक बताने जैसी स्थिति में नहीं होते.

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अंतर्कलह का ख़तरा नहीं
हालत ये है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता- रघुवंश प्रसाद सिंह, जगदानंद सिंह और अब्दुल बारी सिद्दीक़ी भी मान चुके हैं कि अब तेजस्वी के हाथ में ही पार्टी की कमान है.
दरअसल इन्हें इस हक़ीक़त का अंदाज़ा है कि लालू परिवार से काट कर आरजेडी के खाँटी जनाधार को क़ायम रख पाना कठिन है.
यही वजह है कि इस पार्टी में लालू प्रसाद की मर्ज़ी के विरुद्ध कोई अलग राग अलापने को तैयार भी नहीं दिखता.
ज़ाहिर है, ऐसे में नेतृत्व को लेकर पार्टी में अंतर्कलह का ख़तरा नहीं होना लालू परिवार के लिए संतोष की बात है.
वैसे भी, लालू की हड़काऊ अंदाज़ वाली हल्लाबोल सियासत को उनके दल में चुनौती देने वाला है ही कौन ?
लेकिन हाँ, बेनामी संपत्ति से जुड़े जो मामले तेजस्वी समेत लालू परिवार के ख़िलाफ़ ज़ोर पकड़ते जा रहे हैं, उनसे पार पाना तो बड़ी चुनौती है.
फिर भी, राजनीति कब कौन-सी करवट ले लेगी, कहा नहीं जा सकता.

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सज़ा का फायदा उठाने का ट्रेंड?
अब इस प्रकरण के कुछ अन्य पहलुओं पर ग़ौर करें. सवाल उठता है कि भ्रष्टाचार के अपराध से जुड़े मामले में हुई सज़ा को भी सियासतदाँ अपने हक़ में कैसे मोड़ लेते हैं ?
इसका मुख़्तसर-सा जवाब यही दे दिया जाता है कि जाति, मज़हब या स्वार्थ जनित राजनीति में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं रहा.
ऐसा कहना पूरी तरह न सही, लेकिन काफ़ी हद तक सही दिखने लगा है. अब इसी चारा घोटाले के मामले में ही देख लीजिए.
लालू यादव को राजनीतिक साज़िश के तहत फँसाने की बात ज़ोर-शोर से कह रहे लोग अदालती निर्णय के क़ानूनी पहलुओं पर बहस से बचने लगते हैं.
मतलब साफ़ है. अपने सियासी स्वार्थ के अनुकूल तर्क जुटा कर समर्थकों के बीच उसे ही प्रचारित करना मूल मक़सद हो जाता है.
और यह चलन किसी नेता विशेष या दल विशेष तक ही सीमित नहीं है. कमोबेश सभी इसमें शामिल हैं.

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अब आगे क्या?
जहाँ तक लालू यादव के मौजूदा जेल प्रवास का सवाल है, उनकी ज़मानत अब झारखंड हाई कोर्ट के रुख़ पर निर्भर है.
पिछली बार उन्हें ऊपर की अदालत से ज़मानत के लिए दो महीना इंतज़ार करना पड़ा था.
इस बार अगर लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ी, तो 2019 के लोकसभा चुनाव में ग़ैरबीजेपी मोर्चे को लालू जैसे मुखर नेता के सक्रिय सहयोग से वंचित रहना पड़ सकता है.
आरजेडी को एक और आशंका घेर रही है.
चारा घोटाले के ही जिन दो अन्य मामलों की सुनवाई एक-दो महीने में पूरी होने वाली है, उनमें भी अगर लालू को सज़ा मिली, तो फिर ज़मानत की दिक़्कतें और बढ़ सकती हैं.
बावजूद इन मुश्किलों के, लालू ख़ेमा संघर्ष का तेवर दिखाने में जुटा हुआ है.












