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21 दिनों की कशमकश के बाद यूपी को मिला पुलिस महानिदेशक, कहां फंसा था पेंच?
- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
21 दिनों के लंबे इंतज़ार के बाद आख़िरकार देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश को अपना पुलिस महानिदेशक मिलने का रास्ता साफ़ हो गया है.
केंद्र सरकार ने केंद्रीय ओद्यौगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ़) के महानिदेशक ओम प्रकाश सिंह को मुक्त कर दिया है. सोमवार यानी 22 जनवरी को ओपी सिंह अपनी इस ज़िम्मेदारी से आधिकारिक तौर पर मुक्त होंगे और उम्मीद की जा रही है कि मंगलवार तक वे उत्तर प्रदेश पुलिस महानिदेशक का पद संभाल लेंगे.
उत्तर प्रदेश के पुलिस इतिहास में ये पहला मौका है जब राज्य के पुलिस महानिदेशक के नाम की घोषणा के बाद उन्हें दफ़्तर पहुंचने में इतना लंबा वक्त लगा है.
दरअसल, 31 दिसंबर को यूपी के मुख्य सचिव राजीव कुमार के नेतृत्व में राज्य गृह विभाग के प्रमुख सचिव और मुख्य मंत्री के प्रमुख सचिव की समिति की अनुशंसा पर ओपी सिंह के नाम का ऐलान पुलिस प्रमुख के तौर पर किया गया था.
कहां फंसा था पेच?
उसी दिन गृह विभाग के प्रमुख सचिव ने ओपी सिंह के नाम का ऐलान करते हुए कहा था कि केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर तैनात ओपी सिंह को कार्यमुक्त किए जाने के लिए केंद्र सरकार को आवेदन दे दिया गया है.
इसके बाद ओपी सिंह के यूपी पहुंचने के इंतज़ार का सिलसिला शुरू हुआ. पहले कहा गया कि वे तीन जनवरी को पद संभालेंगे, फिर पांच जनवरी, फिर 10 जनवरी और उसके बाद 15 जनवरी को भी पदभार ग्रहण किए जाने की चर्चा हुई लेकिन केंद्र सरकार के पास ओपी सिंह को मुक्त करने की फ़ाइल पड़ी रही.
उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में पुलिस महानिदेशक की तैनाती में होने वाली देरी को लेकर राजनीतिक गलियारों से लेकर प्रशासनिक गलियारों में कयासों का दौर शुरू हो गया था. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चुटकी लेते हुए ये भी कहा, "पुलिस अधिकारी नियुक्ति की घोषणा के बाद भी नहीं आ रहे हैं, क्योंकि अच्छे दिन नहीं आए हैं."
इन सबसे योगी आदित्यनाथ की सरकार के इस फ़ैसले पर सवाल भी उठने लगे थे कि क्या ओपी सिंह की नियुक्ति की घोषणा से पहले केंद्र सरकार से तालमेल में कोई कमी रह गई थी?
तालमेल की कमी?
यूपी पुलिस मुख्यालय में तैनात एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, "पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति का मामला इतने बड़े स्तर पर होता है कि आजकल के इंटरनेट के जमाने में मिनट और घंटों में लोग एक जगह से दूसरी जगह पदभार संभाल लेते हैं, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ और वो भी तब जब दोनों जगह बीजेपी की ही सरकार थी और ये पार्टी त्वरित ढंग से काम करने का दावा करती रही है."
ऐसे में अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है कि कुछ मुद्दों पर केंद्र सरकार यूपी में ओपी सिंह को भेजने के लिए तैयार नहीं हो रही थी. इन मुद्दों में दो अहम मुद्दों की लगातार चर्चा हो रही थी, एक तो ओपी सिंह को उत्तर प्रदेश से ही आने वाले गृह मंत्री राजनाथ सिंह का बेहद करीबी अफ़सर माना जाता रहा है. ऐसे में 2019 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए पीएमओ में ओपी सिंह को भेजने को लेकर अलग अलग राय थी.
इस बारे में यूपी मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े एक सूत्र ने बताया, "दरअसल ओपी सिंह को लेकर कुछ पेंच थे. प्रधानमंत्री कार्यालय के कुछ शीर्ष अधिकारी यूपी में किसी अन्य अधिकारी को तैनात किए जाने के पक्ष में थे. इसलिए उन्हें मुक्त नहीं किया जा रहा था. लेकिन मुख्यमंत्री ने ओपी सिंह को मुक्त किए जाने के लिए जब ख़ुद पहल की तो उन्हें मुक्त किया गया है."
इसके अलावा 2 जून, 1995 को लखनऊ के मीराबाई मार्ग के स्टेट गेस्ट हाउस में मायावती पर समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं के हमले के दौरान ओपी सिंह की भूमिका पर सवाल उठे थे. ओपी सिंह उस वक्त लखनऊ के एसएसपी थे. मायावती और उनके समर्थक उस दंश को अब तक नहीं भूले हैं.
एक दलील ये भी दी जा रही थी कि आने वाले लोकसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी यूपी में दलित वोट बैंक में अपना जनाधार बढ़ाना चाहती है, ऐसे में ओपी सिंह की तैनाती से अच्छा संदेश नहीं जाएगा. इतना ही नहीं, ओपी सिंह को यूपी में मुलायम सिंह का भी ख़ास अधिकारी के तौर पर देखा जाता रहा है.
ओपी सिंह की मुलायम सिंह से लेकर राजनाथ सिंह-योगी आदित्यनाथ तक की नज़दीकी के बारे में यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक अरविंद कुमार जैन कहते हैं, "देखिए ये सब कहने की बातें होती हैं. हम लोगों की भूमिका ऐसी होती है कि हमें राज्य सरकार के मुखिया के साथ मिलकर चलना होता है. उनके निर्देशों को भी देखना होता है और क़ानून व्यवस्था की स्थिति नहीं बिगड़े, इसे भी संभालना होता है."
अरविंद कुमार जैन के मुताबिक ओपी सिंह बड़े ही सक्षम अधिकारी रहे हैं, इसलिए हर जगह उन्हें पसंद किया जाता रहा है. यूपी पुलिस के साथ विभिन्न ज़िम्मेदारियों को निभाने के अलावा सीआईएसएफ़ में ओपी सिंह के कार्यकाल को संतोषजनक माना जाता है. चाहे वो वीआईपी सुरक्षा का मसला हो या एयरपोर्ट पर सुरक्षा. उनके काम की तारीफ़ होती रही है.
सीआईएसएफ़ को नहीं मिला है मुखिया
इससे पहले वे नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फ़ोर्स (एनडीआरएफ़) के प्रमुख थे, वहां भी नई तकनीक लाने का श्रेय उन्हें दिया जाता है. यही वजह है कि योगी आदित्यनाथ राज्य में ऐसी छवि वाले पुलिस अधिकारी की तैनाती से पीछे नहीं हटे.
पहले ये भी कहा जा रहा था कि केंद्रीय ओद्यौगिक सुरक्षा बल के ज़िम्मे एयरपोर्ट से लेकर देश के अहम ठिकानों की सुरक्षा का ज़िम्मा होता है, लिहाज़ा जब तक ओपी सिंह की जगह लेने वाले अधिकारी का चयन नहीं हो जाता तब तक उनको पद मुक्त नहीं किया जा सकता.
लेकिन योगी आदित्यनाथ के अड़ने की वजह से केंद्र सरकार ने सीआईएसएफ़ के नए महानिदेशक की घोषणा किए बिना ही ओपी सिंह को मुक्त करने का फ़ैसला कर लिया है.
सीआईएसएफ़ मुख्यालय के प्रवक्ता हेमेंद्र सिंह ने बताया, "ओपी सिंह आधिकारिक तौर पर सोमवार को मुक्त होंगे. उनकी जगह लेने के लिए अभी किसी अधिकारी का नाम नहीं आया है. ऐसी सूरत में कई बार दूसरी फोर्स के महानिदेशक को अतिरिक्त प्रभार दिया जाता रहा है या फिर किसी अतिरिक्त महानिदेशक (एडीजी) स्तर के अधिकारी को इसकी ज़िम्मेदारी दी जाती है."
बहरहाल, आठ पुलिस ज़ोन, 18 पुलिस रेंज और 75 पुलिस ज़िलों में बंटे उत्तर प्रदेश पुलिस फ़ोर्स को अपना कमांडर मिल गया है.
ओपी सिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौती यूपी पुलिस की भ्रष्ट छवि को दुरुस्त करने के साथ-साथ अपराध की रफ़्तार को कम करने की होगी. इस दौरान राज्य में सांप्रदायिक सद्भाव नहीं बिगड़े, इसकी ज़िम्मेदारी भी उन्हें निभानी होगी.
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