You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
नज़रियाः क्या जीएसटी पर हड़बड़ी में एक और गड़बड़ी हो गई?
- Author, विवेक कौल
- पदनाम, आर्थिक विश्लेषक
18 जनवरी 2018 को जीएसटी परिषद ने 29 सामानों और 53 सेवाओं पर जीएसटी दर घटाने का निर्णय लिया. मीडिया में इस ख़बर को बड़ा एलान बता कर उछाला गया.
भारत में जीएसटी लागू हुए अभी सात महीने भी पूरे नहीं हुए हैं, और इन सात महीनों में जीएसटी की दरों को कई बार बदला गया है.
इस बात का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि, जीएसटी परिषद की बैठक अब तक 25 बार हो चुकी है. और अब भी जीएसटी की दरें एक जगह पर आकर टिकी नहीं हैं.
बार-बार जीएसटी दरों से छेड़छाड़
यहाँ ये बता देना ज़रूरी है, के दुनिया भर में जहाँ कहीं भी जीएसटी या वैट (वैल्यू एडेड टैक्स) लागू किया गया है, वहां टैक्स की दरें इतनी जल्दी-जल्दी नहीं बदली जाती हैं.
इन सभी देशों में कोशिश ये रहती है कि जीएसटी की दरों के साथ कम से कम छेड़छाड़ की जाए.
इसके पीछे कई वजहें हैं: अगर जीएसटी परिषद हर महीने बैठकें करके दरों को बदलेगी तो इससे व्यापारी वर्ग को ये संदेश जाता है कि नेताओं के साथ लॉबी करके, जीएसटी की दरों में अपने हिसाब से फेरबदल कराया जा सकता है.
व्यापारी वर्ग में क्या संदेश जा रहा?
क्या ये हो रहा है या नहीं, ये कहना तो मुश्किल है, पर बार-बार दरों के साथ छेड़छाड़ करके, जीएसटी परिषद व्यापारी वर्ग को यही संकेत दे रहा है.
भारत जैसे देश में जहां व्यापारियों और नेताओं के बीच में संबंध बहुत ही गहरे हैं, ये सही नहीं है.
बार-बार जीएसटी की दरों के साथ छेड़छाड़ करने से उन लोगों को भी तक़लीफ होती है जो जीएसटी सिस्टम का एक हिस्सा हैं.
ये वो लोग हैं जो सामानों और सेवाओं की ख़रीद पर सरकार को जीएसटी देते हैं. ये वो लोग भी हैं जो सामानों और सेवाओं को बेचते वक़्त, इस जीएसटी को सरकार की बिनाह पर वसूलते हैं.
जीएटसी दरों में इतना बदलाव क्यों?
अब प्रश्न ये उठता है कि जीएसटी की दरों के साथ इतनी छेड़छाड़ क्यों की जा रही है?
इसका सरल उत्तर ये है कि जीएसटी को बहुत हड़बड़ी में शुरू किया गया था. सरकार और नौकरशाही की तरफ़ से तैयारी पूरी नहीं थी.
इसका नतीजा ये हुआ की जीएसटी का पालन करने के लिए जो सिस्टम बनाया गया, वो काफ़ी पेचीदा निकला.
इस पेचीदगी की वजह ये भी थी के टैक्स की बहुत सारी दरों (0, 0.25%, 3%, 5%, 12%, 18%, 28% और उससे भी ऊपर) का एक बेतुका ढांचा बनाया गया.
विश्व भर में जहाँ कहीं भी जीएसटी या वैट है, ज़्यादा से ज़्यादा, दो या तीन दरें लागू की गई हैं. और उसके ऊपर, 28 फ़ीसदी की ऊंची दर लगभग कही नहीं है.
जीएसटी परिषद अब इस बुनियादी ग़लती को ठीक करने की कोशिश कर रहा है. पर कुछ ग़लतियां ऐसी होती है, जो होनी ही नहीं चाहिए. ये उन में से एक ग़लती है.
जीएसटी की एक ही दर रखने का सुझाव था
यहाँ ये बता देना ज़रूरी है, 13वें वित्त आयोग के अध्यक्ष विजय केलकर ने ये कहा था कि जीएसटी की एक दर 12 फ़ीसदी हो सकती है.
जीएसटी के शुरू होने से पहले, बहुत लोगों ने ये लिखा और बोला था, कि इतनी सारी दरों वाला जीएसटी नहीं चलेगा और बहुत ज़्यादा पेचीदगी पैदा करेगा. और वैसा ही हुआ है.
अगर सरकार ने ये बात सुनी होती, तो अभी इस देश के लोगों को जीएसटी की वजह से इतनी तक़लीफ नहीं उठानी पड़ती.
दरों के अलावा, जीएसटी रिटर्न फाइल करने का जो तरीका सरकार ने बनाया है, उसकी वजह से भी काफ़ी तकलीफ हो रही है.
ये हड़बड़ी में गड़बड़ी का एक और अच्छा नमूना है.
किसी भी नए सिस्टम को शुरू करने से पहले उसका थोड़े समय तक परीक्षण किया जाता है. इसके दौरान, ये कोशिश रहती है कि ग़लतियों को सुधारा जाए और सिस्टम को और भी सरल बनाया जाए.
समिति बनी, फिर क्या हुआ?
जैसा सरकारी कामों में अक्सर होता है, जीएसटी रिटर्न फाइल करने की प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए, एक समिति बना दी गई है.
इन सारे कारणों की वजह से नवंबर 2017 में कुल 80,808 करोड़ रुपए जीएसटी की उगाही हुई. अक्तूबर में 83,346 करोड़ रुपए करोड़ की उगाही हुई थी.
हालांकि सरकार को ये उम्मीद थी कि हर महीने 91 हज़ार करोड़ रुपए की उगाही होगी.
जुलाई के बाद पहले के कुछ महीनो में ऐसा हुआ था. ये चिंता का विषय है क्योंकि जीएसटी को केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच में बांटा जाना है, और अगर सरकारें कमाएंगी नहीं तो खर्च कहाँ से करेंगी?
यहां एक और बात ज़रूरी है कि 99.01 लाख करदाता जीएसटी के तहत रजिस्टर्ड हैं, पर उन में से केवल 53.06 लाख करदाताओं ने नवंबर के महीने के जीएसटी रिटर्न भरे हैं. इनमें से 16.6 लाख करदाताओं ने कम्पोजिट स्कीम को चुना है.
लोग क्यों नहीं भर रहे जीएसटी रिटर्न?
सवाल ये है कि इतने लोग जीएसटी रिटर्न क्यों नहीं भर रहे हैं?
एक वजह जीएसटी रिटर्न की पेचीदगी है. पर उससे ज़्यादा लोगों को ये डर है कि, जीएसटी रिटर्न भरने से पुराने सालों का कच्चा चिट्ठा भारत सरकार के पास पहुँच जाएगा.
गुजरात चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये विश्वास दिलाया था, के गड़े मुर्दों को नहीं उखाड़ा जाएगा, पर जिनको जीएसटी रिटर्न भरना चाहिए, उन लोगों ने इस बात पर पूरा पूरा भरोसा अब तक नहीं जताया है.
और अंत में, भारतीय जीएसटी ढांचे को एक पूरी मरम्मत की ज़रूरत है और ये बार-बार छेड़छाड़ करने से नहीं होने वाला.
(विवेक कौल 'इंडियाज़ बिग गवर्नमेंट - द इंट्र्यूसिव स्टेट एंड हाउ इट इज़ हर्टिंग अस' के लेखक हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)