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ग्राउंड रिपोर्ट: खट्टरलैंड जहां 'बेटी पढ़ाओ, बेटी गंवाओ' बनता जा रहा है?
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कुरुक्षेत्र से
हरियाणा में कुरुक्षेत्र का झांसा गांव. दो कमरों के घर में सुरेंद्र कुमार आंगन में उदास आंखों के साथ बैठे हुए हैं.
पेशे से दर्ज़ी सुरेंद्र दलित हैं. उनकी गोद में आठ साल की बेटी महक है. महक बार-बार बेहोश हो जा रही है. उसके चेहरे पर पानी के छींटे मारे जा रहे हैं. एक कमरे में सुरेंद्र कुमार की पत्नी सिमटी हुई हैं. वहां से लगातार सिसकियों की आवाज़ आ रही है.
कुछ दिन पहले ही (आठ जनवरी) को नेहा दोपहर में छत पर बैठकर पढ़ रही थी. उसने आठ जनवरी को अपने हाथों से ख़ूबसूरत राइटिंग में नई कॉपी के पहले पन्ने पर अपना नाम लिखा था- नेहा श्रोहा.
नेहा को डॉक्टर बनना था. इसी सपने के साथ वो हर दिन घर से किताब लेकर ट्यूशन के लिए निकलती थी. नौ जनवरी को भी वो शाम में पांच बजे निकली थी और रोज़ रात में आठ बजे से पहले आ जाती थी.
पहचानना तक मुश्किल था
रात के साढ़े आठ हो गए थे. घर में जो लोग थे, उनकी आवाज़ में डर सुनाई आने लगा. वो कहने लगे, 'नेहा आई नहीं. नेहा अब तक नहीं आई.'
13 जनवरी को इसी घर में नेहा की लाश आई. लाश भी ऐसी कि गर्दन में पहनी संत रविदास की तस्वीर से पहचान में आई कि यह नेहा ही है.
नेहा का शव घर से 104 किलोमीटर दूर जींद में मिला था. उसके साथ गैंगरेप की बात कही जा रही है. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट पढ़ने के बाद साफ़ पता चलता है कि उस 15 साल की लड़की के साथ कैसी दरिंदगी हुई थी.
शरीर का कोई ऐसा अंग नहीं था, जो सलामत था. मानो लाश को भी एक मौत दी गई हो. 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' - पीएम मोदी ने तीन साल पहले हरियाणा के पानीपत में यह नारा दिया था. बेटी पढ़ने गई थी, लेकिन बची नहीं.
सुरेंद्र कुमार की दो बेटियां ही थीं. बेटी बचाओ का नारा गर्भ में बेटियां बचाने के लिए है, लेकिन गर्भ से बाहर निकली बेटियों को नेहा की मौत मरने से कौन बचाएगा?
सुरेंद्र कुमार कहते हैं, ''मेरी बेटी पढ़ने में बहुत तेज़ थी. मैं तो घर से 20 किलोमीटर दूर दर्ज़ी का काम करने जाता हूं. इतनी मेहनत इन बेटियों के लिए ही तो कर रहा था. वो डॉक्टर बनना चाहती थी.''
सुरेंद्र कुमार इतना कहते ही फूटकर रोने लगते हैं.
महक फिर से होश में आ गई है. पूछती है, ''दीदी अब कभी नहीं आएगी? मुझे अब कौन पढ़ाएगा?'' सुरेंद्र कुमार भीतर से टूट चुके हैं, लेकिन हौसला किसी न किसी कोने में ज़िंदा है. महक को पिता आश्वस्त करते हैं बेटा तुझे और अच्छे स्कूल में भेजूंगा.
वहां बैठी एक महिला को सुरेंद्र कुमार का यह इरादा रास नहीं आया. वो कहती हैं एक ही बेटी बची है उसे तो बचा लो. उसे भी मरने के लिए अब पढ़ने मत भेजो.
महक की मायूसी आंसुओं में ढलने लगती है.
क्या हुआ था?
15 साल की नेहा और 18 साल गुलशन में किस हद तक दोस्ती थी इस पर कोई कुछ कहने को तैयार नहीं है. नेहा के घर वालों का कहना है कि उन्होंने गुलशन को देखा तक नहीं और यही बात गुलशन के घर वाले भी कहते हैं.
अब न नेहा है और न ही गुलशन.
नौ जनवरी को गुलशन भी अपने घर से ट्यूशन के लिए निकला था. गुलशन और नेहा दोनों गांव से ग़ायब थे. आरोप लगा कि गुलशन ने ही नेहा को भगाया. गुलशन भी दलित परिवार से था. उसके परिवार वालों को पुलिस ने ग़िरफ़्तार किया. उन्हें मारा गया. अचानक 16 जनवरी को गुलशन की लाश करनाल से कुरुक्षेत्र के बीच में मिली. गुलशन का शव भी बुरी हालत में था.
गुलशन के घर वालों का कहना है कि शव की अंत्येष्टि पुलिस ने उसी रात करवा दी. अब इस मामले की जांच बिल्कुल बदल गई है. रहस्य और गहरा गया है. मामला तूल पकड़ने लगा तो राज्य की मनोहर लाल सरकार ने जांच के लिए एक एसआईटी का गठन कर दिया. इसका नेतृत्व डीएसपी धीरज कुमार कर रहे हैं.
धीरज कहते हैं, ''लड़के का शव मिलने के बाद चुनौती और बढ़ गई है. जांच कई एंगल से की जा रही है. बिना कुछ ठोस प्रगति के कोई टिप्पणी करना मुनासिब नहीं है.'' लड़के के पिता जसविंदर का आरोप है कि पुलिस ने उनके बाक़ी दोनों बेटों को बेरहमी से मारा है.
उनका कहना है कि जब गुलशन की भी लाश मिली तब पुलिस ने उनके दोनों बेटों को छोड़ा.
क्या गुलशन और नेहा में दोस्ती थी?
यह सवाल जितना दोनों के माता-पिता के लिए अनजाना है उतना ही गांवा वालों के लिए भी. जिस संजय कुमार शर्मा के पास दोनों ट्यूशन पढ़ने जाते थे उनका कहना है कि उन्हें कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ.
संजय कहते हैं कि दोनों का व्यवहार अच्छा था और वे काफ़ी शर्मीले थे. गुलशन के बड़े भाई सागर से पूछा कि क्या उन्होंने कभी नेहा को देखा?
सागर ने बड़ी मुश्किल से कहा, ''उस दिन चाची ने गुलशन को फ़ोन पर किसी लड़की से बात करने के लिए डांटा था. हो सकता है कि वो नेहा ही हो. चाची की डांट से गुलशन नाराज़ था.''
हालांकि सागर की बात को गुलशन की मां राधा पूरी तरह से नकार देती हैं. वो कहती हैं, ''हमलोग से लड़की वालों का घर काफ़ी दूर है. उनके घरवालों से भी कभी बात नहीं हुई.''
झांसा गांव बहुत बड़ा है. यहां अलग-अलग जातियों के लोग रहते हैं. दलितों की भी अच्छी-ख़ासी आबादी है.
इस वाक़ये को लेकर गांव में अजीब ख़ामोशी है. कोई ग़ुस्सा नहीं है. गांव में कई बार बातचीत करते हुए मन में सवाल उठता है कि लोग इसे लेकर इतने उदासीन क्यों हैं? संजय कुमार शर्मा कहते हैं कि वो मीडिया वालों को बयान देते-देते परेशान हो गए हैं.
हरियाणा की खट्टर सरकार ने प्रदेश में 'पद्मावत' फ़िल्म रिलीज़ होने पर पाबंदी लगा दी थी. सरकर का कहना था कि यह राजपूतों की शान पर चोट करती है. बीजेपी के कुछ नेताओं ने पद्मावती को नारी की मर्यादा से जोड़ा.
पिछले चार दिनों में प्रदेश में रेप की 6 वारदातें सामने आई हैं. इसमें तीन साल की एक बच्ची से रेप हुआ है. सवाल उठता है कि इन बच्चियों की मर्यादा क्या पद्मावती के सामने मायने नहीं रखती?
हरियाणा में महिला सुरक्षा की आईजी ममता सिंह कहती हैं, ''हम इस पर बिना पद्मावती के भी बात कर सकते हैं. हाल के दिनों में रेप की कई क्रूर वारदातें सामने आई हैं, हम इसकी जांच में कोई कसर नहीं छोड़ रहे.''
गुलशन के घर से उसके पिता जसविंदर की चीखें नेहा के घर नहीं पहुचंती होंगी. पर दोनों घरों में मातम है. कल तक जसविंदर ख़ुद को अपराध बोध तले दबा महसूस कर रहे थे. बेटे का शव मिलने का बाद अपराध बोध नहीं रहा, लेकिन दुख तो सुरेंद्र कुमार की तरह ही है.
सुरेंद्र कुमार के घर से धूप निकल गई है. सुरेंद्र वहीं बैठे हैं. नेहा के आने का वक़्त हो गया है. अभी तक आई नहीं. ज़ाहिर है अब नेहा कभी नहीं आएगी. सुरेंद्र कुमार के जीवन में अब बेटी के रूप में महक ही बची है.
हरियाणा में गैंगरेप
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2016 के आंकड़ों के मुताबिक, प्रति एक लाख आबादी पर गैंग रेप के मामले में हरियाणा सबसे आगे है. राज्य की एक लाख महिला आबादी पर 2016 में गैंगरेप की दर 1.5 फ़ीसदी थी.
2016 में राज्य में गैंगरेप के 191 मामले दर्ज़ कराए गए. हालांकि पिछले साल से यह कम है. पिछले साल यह संख्या 204 थी.
इसके बावजूद गैंगरेप के मामले में हरियाणा देशभर में शीर्ष पर है.
राज्य की विपक्षी पार्टी कांग्रेस का कहना है कि खट्टर सरकार राज्य की क़ानून व्यवस्था संभालने में बुरी तरह से नाकाम रही है. हाल ही में डेरा सच्चा सौदा के गुरमीत राम रहीम पकड़े गए तो दर्जनों की जान चली गई थी.
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