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ब्लॉग: आपका राजनीतिक 'एनकाउंटर' कब का हो चुका, तोगड़िया जी!
- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, रेडियो एडिटर, बीबीसी हिंदी
फ़र्ज़ी मुठभेड़ के लिए ले जाया जा रहा आदमी बलि के लिए ले जाए जा रहे मेमने जैसा होता है.
ये मेमना कभी ज़ोर ज़ोर से मिमियाने लगता है, फिर चुपचाप सिर झुका कर घास खाने लगता है. कुछ देर बाद रस्सी तुड़ाने की जीतोड़ कोशिश करता है.
फिर मिमियाता है और आख़िरकार गंडासा उसकी गरदन पर गिरा दिया जाता है. वो कुछ देर तड़प कर ठंडा पड़ जाता है.
अदालतों की फ़ाइलों, पुलिस की इंटेरोगेशन रिपोर्टों और चार्जशीटों में ऐसे दर्जनों बयान दर्ज हैं जिनसे पता चलता है कि फ़र्ज़ी मुठभेड़ के लिए चिन्हित किए गए आदमी से चुनिंदा पुलिस वाले ही डील करते हैं ताकि असली कहानी उन लोगों तक ही रहे, कहीं बाहर न जाए.
फ़र्ज़ी मुठभेड़
हिंदी फ़िल्मों में अक्सर ऐसे दृश्य दिखाई पड़ते हैं:
बिना नंबर की किसी गाड़ी में बैठाकर ऐसे आदमी को शहर से बाहर किसी सुनसान इलाक़े में ले जाया जाता है. गाड़ी रोकी जाती है, क़ैदी की हथकड़ियाँ खोल दी जाती हैं और उससे कहा जाता है- यहाँ से जितना जल्दी हो सके भाग जाओ क्योंकि अब तुम आज़ाद हो.
क़ैदी को मालूम होता है कि उसकी कुछ ही साँसें बची हुई हैं फिर भी वो मेमने की तरह इस आज़ादी को गले लगा लेता है. कुछ ही पलों में कई कोणों से आ रही गोलियाँ उसकी देह को छेद डालती हैं.
दूसरे दिन अख़बारों में ख़बर छपती है- 'पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में शातिर बदमाश/ दुर्दांत डाकू/ खूँख़ार नक्सली/इंडियन मुजाहिदीन का आतंकवादी ढेर.'
सोहराबुद्दीन शेख़, उनकी पत्नी क़ौसर बी, तुलसीराम प्रजापति, इशरत जहाँ, माओवादी पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य आज़ाद, उत्तराखंड के पत्रकार हेम पांडे, उत्तर प्रदेश के श्रीप्रकाश शुक्ला जैसे कई हिस्ट्री शीटर, भोपाल की जेल में बंद सिमी के आठ कार्यकर्ता- ये सभी असली या नक़ली 'मुठभेड़ों' में मार डाले गए.
कभी दहाड़ने वाले तोगड़िया भागे क्यों?
क्या विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष डॉक्टर प्रवीण तोगड़िया का नाम भी इस लिस्ट में जुड़ने वाला था, जैसा कि उन्होंने ख़ुद लाइव टेलीविज़न पर रोते हुए शिकायत की?
अगर पिछले सोमवार को वो राजस्थान पुलिस के हत्थे चढ़ जाते तो क्या उन्हें भी अहमदाबाद के बाहर किसी सुनसान इलाक़े में लेजाकर पुलिस वाले किसी कच्ची पगडंडी पर छोड़ देते और कहते कि अब तुम आज़ाद हो, जितना जल्दी हो सके यहाँ से भाग जाओ?
राजस्थान की पुलिस दस साल पुराने एक मामले में उन्हें गिरफ़्तार करने आई थी पर तोगड़िया के मुताबिक़ उन्हें इसकी भनक लग गई और वो ज़ेड सिक्योरिटी को ग़च्चा देकर ऑटो में बैठकर निकल भागे. अगले दिन अहमदाबाद के एक नर्सिंग होम में उन्हें होश आया.
तोगड़िया को मुठभेड़ का डर क्यों?
जो शख़्स कल तक हिंदू वीरता और शौर्य का प्रतीक था, मुसलमानों को खुलेआम ललकारता था, कहता था महात्मा गाँधी की वजह से भारत में आतंकवाद फैल रहा है— वही शख़्स अहमदाबाद के एक अस्पताल में एक मेमने की तरह आँखों में आँसू लिए और भरे गले से कहता हुआ दिखाई दिया कि मेरा एनकाउंटर करने का षडयंत्र किया जा रहा है.
जिस राज्य में हिंदू हृदय सम्राट प्रवीण तोगड़िया ने ये कातर आर्तनाद किया वहाँ भी हिंदुत्ववादी भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, जिस राजस्थान की पुलिस से उन्हें एनकाउंटर कर दिए जाने का डर था वहाँ भी बीजेपी का शासन है और जिस केंद्र की तरफ़ उन्होंने अपनी इस दयनीय स्थिति के लिए इशारा किया वहाँ भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में ट्रेनिंग ले चुके तीन स्वयंसेवक भारतीय गणराज्य के तीन सर्वोच्च पदों पर आसीन हैं.
यही नहीं, पूरे देश भर में तोगड़िया की विश्व हिंदू परिषद ने लाखों लाख स्वयंसेवक तैयार किए हैं. उसके युवा संगठन बजरंग दल के सदस्यों को 'आत्मरक्षा' के लिए लंबे छुरे के आकार के त्रिशूल और बंदूक़ चलाने की ट्रेनिंग दी जाती है.
तोगड़िया के क्रंदन पर कोई क्यों नहीं बोला?
बजरंग दल के लड़के गाँव-गाँव, क़स्बे-क़स्बे में 'हिंदुओं की रक्षा' की ज़िम्मेदारी ख़ुद ही उठाए हैं. वो किसी पर भी लव जिहाद का स्टिकर चिपका कर उसे पीट सकते हैं, किसी भी गाड़ी को तलाशी लेने के लिए रोक सकते हैं, गरबा में जाना चाह रहे मुसलमान लड़कों को रोक सकते हैं, चाहे जिसे धमका सकते हैं, चाहे जिसे 'देशद्रोही' घोषित कर सकते हैं.
पर मातृभूमि और हिंदू धर्म पर जान न्योछावर करने को तैयार इनमें से कितने नौजवान अपने हिंदू हृदय सम्राट की रक्षा के लिए माथे पर भगवा पट्टा पहने और हाथ में छुरेनुमा त्रिशूल लेकर आगे आए?
प्रवीण तोगड़िया के आँसू देखने के बावजूद आपने किसी भी कोने से कोई नारा सुना कि 'जिस हिंदू का ख़ून न खौले, ख़ून नहीं वो पानी है'? कितने स्वयंसेवकों ने कहा कि हिंदुओं के नेता प्रवीण भाई तोगड़िया को मारने का षडयंत्र रच रहे लोग राष्ट्रद्रोही और हिंदू द्रोही हैं?
कोई नहीं बोला क्योंकि प्रवीण तोगड़िया का राजनीतिक एनकाउंटर बहुत पहले किया जा चुका है.
सत्ता की डोर
तोगड़िया जब तक पाकिस्तान, मुसलमान, महात्मा गाँधी, कांग्रेस, ओवैसियों और ईसाइयों के ख़िलाफ़ हुंकार भरेंगे तब तक उनकी उपयोगिता बनी रहेगी.
जब तक उनकी हुंकारों से हिंदू-मुसलमान ध्रुवीकरण होता रहेगा और वोट मिलते रहेंगे तब तक उनकी उपयोगिता बनी रहेगी. जैसे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी की उपयोगिता बनी हुई है क्योंकि वो सधुक्कड़ी करते करते राजनीति के अखाड़े में भी अंगद का पाँव गड़ा कर रख पाए.
इसीलिए मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने ख़ुद ही अपने ख़िलाफ़ दंगा फैलाने का मामला वापस ले लिया.
पर तोगड़िया जैसे ही वो चुनी हुई सरकारों के ऊपर सुपर-पावर बनने की कोशिश करेंगे और ये बताएंगे कि सत्ता की डोर विधानसभा नहीं बल्कि उससे ऊपर की 'गुरुसभा' के हाथों में रहनी चाहिए, वैसे ही वो पाएंगे कि वो शहर के बाहर किसी सुनसान बियावान में अकेले खड़े हैं और उनसे कहा जा रहा है — तुम आज़ाद हो, जितनी जल्दी हो सके यहाँ से भाग जाओ. और तब उन्हें बचाने के लिए जय-जय श्रीराम का नारा लगाते हुए बजरंग दल के जत्थे दूर दूर तक नहीं होंगे.
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