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जब सफ़दर की हत्या पर दिल्ली की सड़कों पर उतरे हज़ारों लोग
- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"जब देश में तार्किकता के साथ उठने वाली हर आवाज़ को, डराया-धमकाया जा रहा हो, जब हर किसी पर एक ख़ास विचारधारा थोपने की कोशिश की जा रही हो, तब और सत्ता के निरकुंश होने की ऐसी हर परिस्थिति में सफ़दर हाशमी प्रासंगिक बने रहेंगे और युवाओं को याद आते रहेंगे.''
सफ़दर हाशमी को इस तरह याद करने वाले उनके बड़े भाई सोहेल हाशमी अकेले नहीं हैं. उनके साथ हर पहली जनवरी की दोपहर दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में सैकड़ों युवाओं की भीड़ जनवादी नारों के साथ सफ़दर हाशमी को याद करने पहुंचती है.
सोमवार की शाम इस भीड़ में दिखने वाले हर बुर्जुग चेहरे के पास सफ़दर को लेकर अपनी यादें हैं, वो भी तब जब सफ़दर को गुजरे 29 साल हो चुके हैं. महज 34 साल की उम्र तक जीने वाले सफ़दर ने ऐसा मुकाम तो बना ही लिया था जो लोगों के दिलों में उतर चुका था.
सफ़दर ने आख़िर क्या किया था?
दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य से एमए करने वाले संपन्न परिवार के युवा सफ़दर ने सूचना अधिकारी की नौकरी से इस्तीफ़ा देकर मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी की होल टाइमरी ले ली और आम लोगों की आवाज़ बुलंद करने के लिए नुक्कड़ नाटकों को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया.
1978 में जननाट्य मंच की स्थापना करके आम मजदूरों की आवाज़ को सिस्टम चलाने वालों तक पहुंचाने की उनकी मुहिम कितनी प्रभावी थी, इसका अंदाजा इससे होता कि एक जनवरी, 1989 को दिल्ली से सटे गाज़ियाबाद के साहिबाबाद में नुक्कड़ नाटक 'हल्ला बोल' खेलने के दौरान तब के स्थानीय कांग्रेसी नेता मुकेश शर्मा ने अपने गुंडों के साथ उनके दल पर जानलेवा हमला किया.
सफ़दर के परिवार और उनके दोस्तों को इस हमले के गुनहगारों को सजा दिलाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा. सुहेल हाशमी कहते हैं, "दिल्ली के क़रीब दिन दहाड़े ये घटना हुई थी. चश्मदीद गवाह भी थे, लेकिन हत्या के आरोपियों की ज़मानत हो गई थी. हमें लंबा संघर्ष करना पड़ा. 14 साल लगे हमें दोषियों को सजा दिलाने में. सफ़दर की लड़ाई आम लोगों के हक की लड़ाई के साथ इंसाफ़ पाने की लड़ाई भी बन गई."
सफ़दर की मौत के 48 घंटों के भीतर उनके साथियों और उनकी पत्नी मौलीश्री ने ठीक उसी जगह जाकर 'हल्ला बोल' नाटक का मंचन किया. उस दिन तारीख थी 4 जनवरी 1989.
आम से ख़ास लोग सड़कों पर उतर आए
इस हमले में बुरी तरह घायल हुए सफ़दर हाशमी की मौत दो जनवरी को राम मनोहर लोहिया अस्पताल में हो गई थी. ये हमला कैसा था, इसकी झलक सफ़दर की मौत के बाद उनकी अम्मी की लिखी पुस्तक 'पांचवां चिराग' से मिलती है- "जिसमें राम मनोहर लोहिया अस्पताल के डॉक्टर बताते हैं कि सिर में तीन तरफ से फ्रैक्चर हुआ है, बचने की उम्मीद बिलकुल नहीं के बराबर है."
सफ़दर की मौत के बाद उनके अंतिम संस्कार में आम लोग से लेकर दिल्ली का खासा इलीट माने जाने वाला तबका सड़कों पर उतर आया था, उस जमाने में जब मोबाइल और इंटरनेट नहीं थे, तब उनके अंतिम संस्कार में 15 हज़ार से ज्यादा लोग उमड़ आए थे.
वरिष्ठ कवि और पत्रकार मंगलेश डबराल के मुताबिक, मौजूदा दौर में सफ़दर हाशमी जैसे युवाओं की ज़रूरत कहीं ज़्यादा है. वे कहते हैं, "आम आदमी, ग़रीब मजदूरों के हितों की बात को उठाने के लिए, उन्हें उनका हक दिलाने के लिए सफ़दर ने नुक्कड़ नाटक को हथियार की तरह इस्तेमाल किया था. उन्होंने जिस तरह के नाटक किए, उसके चलते उनकी हत्या तक हो गई, उस तरह के नाटकों की कल्पना आज के दौर में में भी नहीं की जा सकती."
सुहेल को भरोसा है कि मौजूदा समाज में जिस तरह से समाज में अल्पसंख्यकों को हाशिए पर रखने की कोशिश की जा रही है, उसे मिटाने का काम सफ़दर जैसे युवा ही करेंगे. वे कहते हैं, "लोग मुझसे पूछते हैं कि सफ़दर कि कितनी प्रासंगिकता है, मुझे लगता है कि उनकी प्रासंगिकता इस दौर में बढ़ गई है."
सफ़दर हाशमी का परिवार दिल्ली का अर्बन और संपन्न परिवार था, लेकिन वो आम मज़दूरों के मुद्दों को पकड़ते थे. समसामयिक मुद्दों पर गहरे व्यंग्यात्मक अंदाज़ में नुक्कड़ नाटक ना केवल लिखते थे, बल्कि उसे बेहद जीवंत अंदाज़ में पेश करते थे. उनका अंदाज़ कुछ ऐसा था कि वे आम लोगों से सीधा रिश्ता जोड़ लेते थे.
मंगलेश डबराल के मुताबिक, सफ़दर की ये बड़ी ख़ासियत थी, वो आम लोगों के रंग ढंग में जल्दी ही रंग जाते थे.
'किताबें तुम्हारे पास रहना चाहती हैं'
सफ़दर और सुहैल हाशमी के दोस्त दिल्ली के सत्यवती कॉलेज के रिटार्यड प्रोफेसर मदन गोपाल सिंह बताते हैं, "सफ़दर हाशमी के साथ रहते कभी लगा नहीं कि वो कितने तरह का काम कर रहा है, क्योंकि उस दौर में मंजीत बाबा, एमके रैना, सफ़दर, सुहैल सब साथ साथ ही थे. लेकिन सफ़दर करिश्माई था. अपनी लंब कद काठी और मोहक मुस्कान के साथ वो जो भी करता, कहता था उसका अंदाज़ निराला था. लोग सीधे जुड़ जाते थे."
मंगलेश डबराल नुक्कड़ नाटकों के अलावा सफ़दर की दूसरी ख़ासियतों का जिक्र भी करते हुए कहते हैं, "ब्रेख्त की कविताओं का क्या बेहतरीन अनुवाद किया है सफ़दर ने. बच्चों के लिए उन्होंने जितनी कविताएं लिखी हैं, जिस अंदाज़ में लिखी हैं, उससे ज़ाहिर होता कि बाल मनोविज्ञान को भी वे गहरे समझते थे."
सफ़दर ने जो कविताएं लिखी हैं, उसमें कुछ का जादू समय के साथ फीका नहीं हुआ है.
"किताबें करती हैं बातें, बीते ज़माने कीं, दुनिया की इंसानों की''
इसी कविता में वो लिखते हैं, "किताबें कुछ कहना चाहती हैं, तुम्हारे पास रहना चाहती हैं."
लेकिन आम बच्चों की जुबान पर जो कविता आज भी चढ़ी हुई लगती है, वो आम लोगों को पढ़ाई की अहमियत को समझाने वाली कविता-
"पढ़ना लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालों, पढ़ना लिखना सीखो ओ भूख से मरने वालों"
"क ख ग घ को पहचानो, अलिफ़ को पढ़ना सीखो, अ आ इ ई को हथियार बनाकर लड़ना सीखो"
इन सबके अलावा सफ़दर ने बच्चों के लिए स्केच, मुखौटे और सैंकड़ों पोस्टर डिजायन किए थे.
'खुद को लीडर नहीं माना'
सफ़दर की पर्सनालिटी के बारे में मशहूर नाट्य निर्देशक हबीब तनवीर ने लिखा था, " नाटक के साथ साथ ख़ूबसूरत गाने लिखते थे, लेकिन वे खुद को गीतकार शायर नहीं मानते थे. निर्देशन करते थे, मगर हमेशा ऐसे पेश आते कि उन्हें निर्देशन नहीं आता, एक्टिंग अच्छी करते थे मगर खुद को कभी एक्टर नहीं समझा. लीडर थे, लेकिन खुद को लीडर नहीं माना. वे सादी तबीयत के हंसमुख इंसान थे, जहां क़दम रख देते, जिंदगी की लहर दौड़ जाती थी."
दिल्ली के मंडी हाउस के सफदर हाशमी मार्ग से कभी गुजरें तो वहां की हवाओं में ज़िंदगी की लहर को महसूस करने की कोशिश कीजिएगा.
सफ़दर हाशमी को भूलिए नहीं, क्योंकि किसी भी दौर में किसी के लिए भी सफ़दर होना आसान नहीं है.